इस्लाम और अच्छे अखलाक की अहमियत
इस्लाम ने अपने मान-ने वालों को एक ऐसा आला दर्जे का निज़ाम-ए-अख़लाक़ अता किया है जिसकी मिसाल दुनिया के किसी मज़हब या क़ानून में नहीं मिलती। यह निज़ाम हर इंसान के लिए एक मुकम्मल रहनुमाई करता है, जिसमें इंसानों से लेकर जानवरों और यहां तक कि नबातात (पौधों) तक के साथ सुलूक के अहकाम शामिल हैं। नबी-ए-अकरम (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने खुद अपने अमल और अख़लाक़-ए-हसना से ऐसी मिसालें क़ायम की हैं, जिनसे हर दौर और हर ज़माने में इंसानियत को राहनुमाई मिलती है।
इस्लाम ने अच्छे अखलाक दिए
दोस्तों! इस्लाम ने अपने मान-ने वालों को ऐसा आला दर्जे का निज़ाम-ए-अख़लाक़ अता फरमाया है जिसकी मिसाल पूरी तहज़ीबी और तमदुनी तारीख़ लाने से क़ासिर है। साथ ही इस बात में किसी को शक नहीं होना चाहिए कि किसी भी मुआशरे की समाजी और मुआशरती तरक़्क़ी का राज़ बेहतरीन निज़ाम-ए-अख़लाक़ के कियाम ही पर मुनहसिर है। अख़लाक़ी कशिश के बगैर तरक़्क़ी का तसव्वुर अधूरा और नाक्रिस होता है। यही वजह है के इस्लाम-ने अपने दीवानों के लिए सबक-ए-अख़लाक्रियात को मुक़द्दम रखा है।
अखलाक का दायराः इंसानों से लेकर जानवरों तक
दोस्तो! आप ये जान लें कि इस्लाम ने इंसानों को जो निज़ाम-ए-अख़लाक़ अता किया है, उसका दायरा बहुत वसीअ और अरीज़ है। इसमें ख़ुदा-ए-वहदहू ला-शरीक की तमाम मखलूक शामिल है। इसमें इंसान, हैवानात, नबातात और जमादात की कोई क़ैद नहीं है। एक बुजुर्ग फरमाते हैं कि इंसानी मुआशरे का फ़र्द होते हुए मुआशरे के दूसरे अफ़राद के जो हुकूक़ उस पर आइद होते हैं, उन्हें हुम्र-ओ-खूबी से अंजाम देना ही हुस्र-ए-ख़ुल्क कहलाता है। अपने वालिदैन, बीवी, औलाद, पड़ोसी, हमसाया, यतीम, बेवा, साइल, राहगीर, बीमार और मुहताज के साथ मुरव्वत और एहसान करने की ताकीद अहादीस-ए-मुबारका में मौजूद है। और ये तालीम ऐसी जामे और हमागीर है कि इंसान तो इंसान, हैवान और नबातात भी इसमें दाखिल हैं। याद रखें, जानों को जाया करना, फलदार दरख्तों को काटना, लहलहाते खेतों को वीरान करना और बसे हुए घरों को उजाड़ना, अख़लाक़-ए-हसना के ख़िलाफ है।
दोस्तों! तमाम अंबिया-ए-किराम और रसूलान-ए-एज़ाम अलेहिमुस्सलाम ने अपने-अपने दौर में अपनी उम्मतों को अख़लाक़ की तालीम दी है और इस पर क़ायम रहने की ताकीद फ़रमाई है। जैसा कि नबी-ए-आखिर-उज़-ज़मां (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) ने इरशाद फ़रमायाः
बुअिस्तु लिउ-तम्मिमा मक्क़ारिमल-अख़लाक़
दोस्तो। हमारे नबी (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) हमेशा ये दुआ फ़रमाया करते थे
अल्लाहुम्मा हस्सन-ता-ख़ल्की फ़हस्सिन खुलुकी
(मसनून दुआएं)
ऐ अल्लाह! तूने मेरी सूरत को खूबसूरत बनाया, मेरे अख़लाक़ को भी अच्छे कर दे।
दोस्तों। यह दुआ उस पैकर-ए-अख़लाक़ की है जिनके अख़लाक़-ए-हसना की अज़मत का तज़किरा ख़ुद ख़ालिक़-ए-दो आलम ने फरमाया है: وَإِنَّك لعلى خلق عظيم )पारा : (29) यानी ऐ महबूब, आपका अखलाक अज़ीम-उश-शान है।
नबी-ए-करीम (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) का अख़लाक़-ए-करीमाना
अपने इसी खुल्क-ए-अज़ीम का मुज़ाहरा आका-ए-दो जहां (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) ने कुछ इस तरह फ़रमाया कि सन 8 हिजरी में मक्का मुकर्रमा को बिना एक क़तरा खून बहाए, बेहद पुरअमन तरीके से फतह कर लिया। पूरी दुनिया में ऐसी तारीख़ रक़म करने वाला सिर्फ आका-ए-दो जहाँ (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) के सिवा कोई नज़र नहीं आता।
दोस्तों! इस्लाम ने जहां इंसान के साथ उसके हर रंग-ओ-रूप में हुस्र-ए-अख़लाक़ का मुतालबा किया है, वहीं दीगर मख़लूकात के साथ भी अच्छे सुलूक का हुक्म दिया है। यहां तक कि जानवरों के साथ भी प्यार और मोहब्बत से पेश आने को कहा है। रसूल-ए-अकरम (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) ने बिला वजह जानवरों को मारने, तकलीफ़ देने और उनसे उनकी ताक़त से ज़्यादा मेहनत कराने से मना फ़रमाया है। साथ ही, उन्हें वक़्त पर चारा देने और उनकी सेहत का ख़ास ख़याल रखने पर ज़ोर दिया है।
आका (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) के जानवरों के साथ हुस्र-ए-सुलुक की मिसाल इस वाक्रेआ से ली जा सकती है कि जब आपका क़ाफ़िला फातेहाना तौर पर मक्का मुकर्रमा में दाखिल हो रहा था, उस वक़्त मक्का के रास्ते में एक ऊंटनी ने बच्चा जना हुआ था। आका (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) की नज़र जब उस बच्चे पर पड़ी, तो आपने वहां एक आदमी को उस वक़्त तक बिठाए रखा, जब तक कि क़ाफ़िले का आखिरी शख्स न गुज़र गया। ताकि वह नौ ज़ाएदा बच्चा क़ाफ़िले वालों के पैरों में न आ जाए। देखा आपने, हुजूर के अख़लाक़-ए-करीमाना और मोहब्बत भरे सुलुक को।
इसीलिए इमाम-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत फ़रमाते हैं:
अपने मौला की है बस शान अज़ीम
जानवर भी करें जिनकी तअज़ीम
संग करते हैं अदब से तस्लीम
पेड़ सज्दे में गिरा करते हैं।
इसी तरह एक यहूदी का आप (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) पर कुछ कर्ज़ था। क़र्ज़ की अदायगी का वक़्त भी तय था, लेकिन वह यहूदी वक़्त-ए-मौऊद से पहले ही मुतालबा करने लगा और सख्ती बरतने लगा। जितनी सख़्ती वह करता, आका-ए-करीम (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) उतने ही नर्म होते जाते। यहां तक कि वह यहूदी खानदान-ए-नुबुव्वत को कोसने लगा। इस हाल को देख कर हज़रत उमर (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने उस यहूदी को जा-ओ-तौबीख (डॉट-फटकार) की और कहा अगर तू इस मजलिस में न होता तो मैं तेरी गर्दन उड़ा देता। यह सुनकर सरकार-ए-दो-आलम (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) ने इरशाद फ़रमाया, 'ऐ उमर! तुम्हें चाहिए था कि मुझसे क़र्ज़ की अदायगी के लिए कहते और उससे यह कहते कि वह नर्मी से तक़ाज़ा करे। तुम्हें उसे डांटना नहीं चाहिए था। जाओ, उसका क़र्ज़ अदा करो और इसके साथ झगड़े के बदले उसे बीस दिरहम ज़्यादा दो। जब उस यहूदी ने आका (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) के इस बे-मिसाल अख़लाक़-ए-करीमाना को देखा तो वह अपने किए पर शर्मिंदा हुआ और फौरन तौबा करते हुए इस्लाम में दाखिल हो गया।
(माखूज़: इस्लाम का निज़ाम-ए-अख़लाक़, तहरीरः मौलाना साबिर रज़ा रहबर मिसबाही)
मौजूदा दौर की अख़लाक़ी सूरतेहाल
दोस्तों!
आज के इस तरक़्क़ी-याफ़्ता दौर में जब चारों तरफ़ निगाह दौड़ाई जाती है, तो अक्सर क्रौमें तामीर-ओ-तरक्की के मैदान में सरगर्म और दुनिया के हर शोबे पर अपनी पकड़ बनाए हुए नज़र आती हैं। लेकिन इसके बावजूद मौजूदा दौर में अमन-ओ-शांति का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं है। आपसी भाईचारा क़ौमों से, ख़ास तौर पर मुसलमानों से, रुख़्सत हो चुका है और अफरा-तफरी का माहौल कायम हो गया है।
दोस्तो! जब हम इन हालात के असबाब पर गौर करते हैं तो जो सबसे बड़ी वजह सामने आती है, वह हमारी गैर-अख़लाक़ी सूरतेहाल की कसरत है। यही वजह है कि आज हमारा मुस्लिम मुआशरा आपसी रस्सा-कशी का शिकार हो चुका है। हद तो यह है कि बड़े अपने छोटों पर दस्त-ए-शफ़क़त फेरना छोड़ चुके हैं और छोटे भी अपने बड़ों की तअज़ीम से दूर हो गए हैं। अख़लाक़ी सूरतेहाल इस क़दर बदतर हो चुकी है कि एक भाई दूसरे भाई को मुसीबत में फंसा देखकर ख़ुशी के शादयाने बजाता नज़र आता है।
तरक्की का असल रास्ता
दोस्तो! अफ़सोस की बात तो यह है कि जो लोग रहबर और क़ाइद कहलाते हैं, चंद अफ़राद को छोड़कर, वह भी इस्लाम के अख़लाक़ी फ़लसफे को भुला बैठे हैं। जबकि यह एक मुसल्लम हक़ीक़त है कि जब तक हम अपने अंदर अख़लाक्रियात के चरारा नहीं जला लेते, उस वक़्त तक तरक़्क़ी और कामयाबी का ख़्वाब देखना रेत की दीवार बनाने के बराबर है।
नतीजा
इस्लाम का निज़ाम-ए-अख़लाक़ पूरी इंसानियत के लिए रहनुमाई का बेहतरीन ज़रिया है। नबी-ए-करीम (अलैहिस्सालतु वस्सलाम) ने अख़लाक़-ए-करीमाना का जो अमली नमूना पेश किया, वह आज भी हर इंसान और मुआशरे के लिए काबिल-ए-अमल है। मौजूदा दौर में मुसलमानों को चाहिए कि वह अपने अंदर इस्लामी अख़लाक्रियात को ज़िन्दा करें, ताकि मुआशरे में अमन-ओ-शांति कायम हो और मुसलमान दुबारा तरक़्क़ी और कामयाबी की राह पर गामज़न हो सकें।
अल्लाह तआला हम सबको अख़लाक़-ए-हसना अपनाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन!
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