सदक़ात-ओ-खैरात और अतियात-ओ-ज़कात के मौज़ू पर कुरान-ओ-अहादीस की रौशनी में मालूमात से लबरेज़ उलमा-ए-अहले सुन्नत, मशायख-ए-तरीक़त और ख़ुतबा-ए-क़ौम-ओ-मिल्लत की ज़बान से आप ने बारहा सुना होगा। आज मैं इस नूरानी और इरफ़ानी माहौल में सदक़ा की क़िस्मों और उसकी शाख़ों पर कुछ रौशनी डालूँगा ताकि आप के मालूमात में एक नई चीज़ का इज़ाफ़ा हो। ऐसी बहुत सी बातें और चीज़ें और काम हैं जिन्हें शरीअत-ए-मुतहरा ने सदक़ा का नाम दिया और कुरान-ओ-अहादीस में उन पर अज्र-ओ-सवाब और मग़फ़िरत-ओ-बख़्शिश का वादा है। सिर्फ़ माल-ओ-ज़र और सोने-चाँदी ही ख़र्च करना ही सदक़ा नहीं कहलाता बल्कि इस के अलावा बे-शुमार ऐसे अमल हैं जो सदक़ा का दर्जा रखते हैं और जिन से अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त बहुत खुश होता है और इन अमलों को करने वालों को जन्नत-ओ-रहमत की बशारत से नवाज़ा गया है। आक़ा-ए-नामदार मदनी ताजदार, मुहम्मद अरबी रूही फ़िदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तो यहाँ तक कि फ़रमाया है कि 'कुल मअरूफ़ सदक़ा' (हर भलाई सदक़ा है)
सदक़ा के बारे में हुज़ूर ने फरमाया
भलाई का हर काम सदक़ा है, और भलाई से यह भी है कि तू अपने भाई से खुश होकर मुस्कुरा कर मिलो और अपने डोल से पानी अपने भाई के बर्तन में डाल दो तो यह भी सदक़ा है। (मजमा उज़-ज़वाइद)
इस हदीस की रौशनी में यह बात वाज़ेह हो गई कि हर नेक काम और हर भलाई सदक़ा है। खाना खिलाना, पानी पिलाना, कपड़ा पहनाना, रास्ते से तकलीफ़ देह चीजें (काँटा, पत्थर, ईट, कील, शीशे का टुकड़ा) हटा देना... मोमिन भाई से मुस्कुरा कर मिलना, मुसलमान भाई के ग़म को दूर करके उसे खुशी देना, रास्ता बता देना, दीन की बातें सीखना सिखाना, भाई की मदद करना, बीमारों की तीमारदारी... मुसलमान की नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत... और अहल-ओ-ऐयाल पर ख़र्च करना यह सारी बातें सदक़ा की क़िस्में और शाखें हैं।
सदक़ा की क़िस्में
तर्जुमाः हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि पैग़म्बर-ए-इस्लाम, मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 'अगर तुम अपने मोमिन भाई को देखकर मुस्कुराओ तो अल्लाह तआला इस की वजह से तुम्हें सदक़ा करने का अज्र अता फ़रमाएगा। अपने डोल का पानी अपने भाई के डोल में डालोगे तो इस पर भी सदक़ा का सवाब अता किया जाएगा। रास्ते से तकलीफ़देह चीजें हटा देना भी सदक़ा है। भलाई का हुक्म देना, बुराईसे रोकनाभी सदक़ा है।
भटके हुए शख़्स की रहनुमाई करना और उसे सीधा रास्ता बता देना भी सदक़ा है।
(मजमा उज़-ज़वाइद; मुअजम-उल-अवसत; कश्फ़-उल-अस्तार)
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा तैय्यिबा ताहिरा रज़ियल्लाहु अन्हा से मर्वी है कि प्यारे नबी मुस्तफ़ा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, तर्जुमाः 'ऐ हुमैरा (यह हज़रत आयशा सिद्दीक़ा का लक़ब है)! जिसने किसी को आग दी, तो उस आग से जो कुछ पकाया गया, गोया उसने वह सब सदक़ा कर दिया। और जिसने नमक किसी को दिया, तो उस नमक से जो कुछ लज़ीज़ खाना बना, उन सब को सदक़ा करने का सवाब उसे अता किया जाएगा। और जिसने किसी मुसलमान को ऐसी जगह पानी पिलाया जहाँ पानी मिलता हो, तो उसे एक गुलाम आज़ाद करने का सवाब दिया जाएगा। और अगर ऐसी जगह पानी पिलाया जहाँ पानी नहीं मिलता हो, तो गोया पानी पिलाने वाले ने उस आदमी को ज़िंदगी बख़्श दी। (इब्न माजा; कंजुल-उम्माल; मजमा उज़-ज़वाइद)
यह है इस्लाम की तालीमात कि आग, पानी और नमक देने पर भी सदक़ा करने का अज्र-ओ-सवाब अता किया जाता है। और इन तीन चीज़ों की अहमियत इतनी है कि इस का बयान लफ़्ज़ों में कमा हक्क़हू नहीं किया जा सकता। हर कोई जानता है कि इन तीन चीज़ों की कितनी ज़रूरत होती है। और यही वजह है कि इस्लाम ने हुक्म दिया है कि इन तीन चीज़ों से किसी को मना न किया जाए। चुनांचे हदीस में है कि जब हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा ने हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा 'या रसूलल्लाह ! वह कौन-सी चीज़ है जिससे मना करना जाइज़ नहीं? तो हुज़ूर ने फ़रमाया (1) पानी (2) नमक (3) और आग। इन तीन चीज़ों से किसी को मना न किया जाए। (मजमा उज़-ज़वाइद)
रास्ते से तकलीफदेह चीजें भी हटाना सदक़ा है
इस्लामी तालीमात का गहराई से मुताला करने के बाद यह बात ज़ाहिर है कि जिस तरह अल्लाह की राह में माल-ओ-ज़र ख़र्च करना सदक़ा है, उसी तरह रास्ते से तकलीफदेह चीज़ों को हटा देना भी सदक़ा है। मसलन रास्ते में काँटा, पत्थर, ईंट, कील वगैरह पैरों में चुभने वाली चीजें पड़ी हों, जिनसे चलने वालों को तकलीफ़ हो, पैर ज़ख़्मी हो जाए, तो ऐसी तकलीफदेह चीज़ों को हटा देना भी सदक़ा है और इस्लाम की नज़र में मक़बूल सदक़ा है। और ऐसा अमल जिसे अल्लाह तआला पसंद फ़रमाता है कि इस अमल पर नेकियाँ अता फरमाता है और जन्नत का हक़दार भी बना देता है।
हज़रत अबू दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हुसे रिवायत हैकि नबी करीम रऊफ़-ओ-रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 'जिसने मुसलमानों के रास्ते से ऐसी चीज़ हटा दी जिससे उन्हें तकलीफ़ होती हो, तो अल्लाह तआला उसके लिए एक नेकी लिख देता है। और जिसके लिए ऐसी एक नेकी लिख दी जाए, तो वह उसी एक नेकी की बदौलत जन्नत में दाखिल कर दिया जाएगा। हज़रत अबू बर्ज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्वी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 'ऐ अबू बर्ज़ा! रास्ते से तकलीफदेह चीज़ों को हटाओ, क्योंकि इस के बदले तुम्हें सदक़ा करने का सवाब अता किया जाएगा।' (कंजुल-उम्माल)
और हज़रत अबू शैबा मोहरी रज़ियल्लाहु अन्हुसे रिवायत हैकि हज़रत मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु रास्ते चल रहे थे और आप के साथ एक और शख़्स था। उस शख़्स ने रास्ते में पड़े एक पत्थर को हटा दिया। तो हज़रत मुआज़ ने पूछा 'यह क्या कर रहे हो?' उस शख़्स ने कहा 'मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते सुना है 'मन रफ़अ हजरन मिन अत-तरीक़ कुतिब लहु हसनत, व मन कानत लहु हसनत दखल-उल-जन्नत' (जिसने रास्ते से पत्थर हटाया, उसके लिए नेकी लिखी जाएगी। और जिसके पास नेकी होगी, वह जन्नत में दाखिल होगा)। (मजमा उज़-ज़वाइद; मुअजम-उल-कबीर)
जन्नत में
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्वी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 'मैंने जन्नत में देखा तो मुझे एक ऐसा शख़्स नज़र आया जिसने कभी कोई भलाई का काम नहीं किया। मैंने दिल ही दिल में कहा 'अल्लाह ने इसे किस अमल-ए-खैर के सिलसिले में जन्नत अता फ़रमाई है?' तो आवाज़ आई 'या मुहम्मद ! यह शख़्स मुसलमानों के रास्ते से तकलीफ़ पहुँचाने वाली चीजें अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए हटाया करता था। अल्लाह ने उसके इस अमल को क़बूल फ़रमा लिया और उसे जन्नत में दाखिल फ़रमा दिया।'
परेशान हाल की मदद भी सदक़ा है
मुसीबतज़दा, परेशान हाल और ज़रूरतमंदों की मुसीबतों और परेशानियों को दूर कर देना, और उनकी ज़रूरतें पूरी करना भी इस्लाम की नज़र में सदक़ा है, और इस की बड़ी फ़ज़ीलत व सवाब है। हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्वी है कि रसूल-ए-अकरम नूर-ए-मुजस्सम, सैय्यिद-ए-अरब-ओ-अजम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 'हर मुसलमान पर सदक़ा है। अर्ज़ किया 'या रसूलल्लाह ! अगर सदक़ा की ताक़त न हो तो? इरशाद फ़रमाया 'मेहनत कर के कमाए और खुद भी फ़ायदा उठाए और सदक़ा भी करे। अर्ज़ किया 'या रसूलल्लाह ! अगर उस की भी ताक़त न हो तो?
फ़रमाया 'फ़युईनु ज़-अल-हाजत-अल-मल्हूफ़' (ज़रूरतमंद और परेशान हाल की मदद करे)। (कंजुल-उम्माल)
भूख से निढाल सैय्यदा का वाक़िया
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक जो बहुत बड़े आलिम, मुहद्दिस, फ़क़ीह और वली कामिल बुजुर्ग थे। उन का मामूल था के एक साल हजकरते और एक साल जिहाद किया करते थे। वह फ़रमाते हैं कि एक साल जबकि मेरा हज का साल था, मैं पाँच सौ अशरफ़ियाँ लेकर हज के इरादे से चला और कूफ़ा में जिस जगह ऊँट फ़रोख़्त होते हैं पहुँचा। ता कि ऊँट खरीदूँ। वहाँ मैंने देखा कि गड्ढे पर एक मरी हुई बतख पड़ी है और एक औरत उस के पास बैठी हुई उस के पर नोच रही है। मैं उस औरत के क़रीब गया और उस से पूछा कि यह क्या हरकत कर रही है? वह कहने लगी जिस काम से तुम्हें कोई वास्ता नहीं उस की तहक़ीक़ की क्या ज़रूरत है? मुझे उस के कहने से कुछ फ़िक्र हुई तो मैंने पूछने पर इसरार किया। वह कहने लगी तुम्हारे इसरार ने मुझे अपना हाल ज़ाहिर करने पर मजबूर कर दिया, मैं सैय्यदनी हूँ, मेरी चार लड़कियाँ हैं, उन के बाप का इंतिक़ाल हो गया है। आज चौथा दिन है हम ने कुछ नहीं चख़ा। ऐसी हालत में मुर्दार हलाल है। यह बतख़ ले जा कर उन लड़कियों को खिलाऊँगी। इब्न-ए-मुबारक कहते हैं मुझे अपने दिल में नदामत हुई और मैंने उस औरत से कहा कि अपनी गोद फैलाओ, उस ने फैलाई मैंने वह पाँच सौ अशरफ़ियाँ डाल कर मैं अपने घर चला आया। और हज का इरादा मुल्तवी कर दिया। जब हुज्जाज फ़िराग़त के बाद वापस आए तो मैं उन से मिला। जिस से मिलता और यह कहता कि हक़ तआला तुम्हारा हज कुबूल करे, वही यह कहता कि अल्लाह तआला तुम्हारा भी हज कुबूल करे। और जब मैं कोई बात करता तो वह कहते हाँ हाँ फलाँ जगह तुम से मुलाक़ात हुई थी। मैं बड़ी हैरत में था कि यह क्या मामला है। मैंने एक रात हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़्वाब में ज़ियारत की। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि अब्दुल्लाह तअज्जुब की बात नहीं है तू ने मेरी औलाद में से एक मुसीबतज़दा की मदद की थी मैंने अल्लाह तआला से दुआ की कि तेरी तरफ़ से एक फ़रिश्ता मुक़र्रर कर दे जो हर साल तेरी तरफ़ से क़ियामत तक हज करता रहे। अब तुझे इख़्तियार है चाहे हज कराना या न कराना। (फ़ज़ाइल-ए-हज अज़ ज़करिया कांधलवी ब हवाला-गुस्ताख़ों का बुरा अंजाम सफ़ा)
ईमान वालों की निशानी
इस वाक़िए से मालूम हुआ कि मुसीबतज़दा की मुसीबत दूर करना, परेशान हाल और ज़रूरतमंदों की मदद करना ऐसा अमल है जो अल्लाह तआला और उस के रसूल अकरम की बारगाह में बेहद मक़बूल है और इस पर अल्लाह तआला अज़ीम अज्र-ओ-सवाब और बड़ा इनाम-ओ-इकराम से नवाज़ता है। और यह भी मालूम हुआ कि औलाद-ए-रसूल की मुहब्बत और उन की तअज़ीम-ओ-तौक़ीर करना अहल-ए-ईमान की निशानी है। ख़ुद आक़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया है 'कोई ईमान वाला उस वक़्त तक नहीं हो सकता जब तक कि वह मुझ से और मेरे अहल-ए-बैत से मुहब्बत न करे। (सवाइक़-ए-मुहर्रिक़ा)
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