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अदब और ताज़ीम: quran aur hadees mein kya hukm hai

 

इस्लामी तालीमात कि रौशनी में अदब की अहमियत 

अस्सलामु अलैकुम दोस्तों: इस तहरीर में हम कुरआन और हदीस की रोशनी में अदब की अहमियत और उसकी बरकत को समझेंगे। साथ ही, आज के दौर में मुसलमानों की ज़िंदगी में अदब की कमी की वजह से होने वाले नुक़सानात पर भी रोशनी डालेंगे। आइए जानें कि ताज़ीम और अदब हमारी ज़िंदगी में क्या मकाम रखते हैं और ये हमें किस तरह ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। और किस तरह ताज़ीम और अदब हमारी ज़िन्दगी को संवार सकते हैं और हमें दीन व दुनिया दोनों में कामयाब बना सकते हैं। 
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम 

अदब और ताज़ीम की अहमियत और दौर-ए-हाज़िर का मुसलमान 

अल्लाह कुरान में फरमाता है तर्जमाः और इज़्ज़त अल्लाह के लिए है, उसके रसूल के लिए और मोमिनों के लिए, लेकिन मुनाफिक इसे नहीं जानते। 
(मुनाफिकून, आयत नंबर 8) 
और नबी-ए-करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमायाः 
जो-हमारे छोटे पर रेहम ना करे और बड़े का ऐहतराम ना करे, वो हम में से नहीं। 
दोस्तों! अल्लाह तआला ने इंसानों को तमाम मख़लूक़ात में अशरफ़ व अफ़ज़ल बनाकर पैदा किया है। दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारने के लिए रोज़-ए-अव्वल ही से इन्हें बक़ायदा मुकम्मल निज़ाम-ए-हयात अता किया गया है। इस निज़ाम-ए-हयात का नाम दीन-ए-इस्लाम और अहकाम-ए-शरीअत है। दीन-ए-इस्लाम और उसके अहकाम व क़वानीन में इंसानों के लिए आला तरीन उसूल व आदाब मौजूद है। इंसान इसे अपनाकर ही इंसानियत की मंजिल तक पहुँच सकता है क्योंकि अख़लाक़ व आदाब ही इंसानों को हैवानों से जुदा करते हैं। अगर इंसान आदाब व अख़लाक़ से खाली हो जाए तो उसमें और हैवानों में कोई फर्क नहीं रहता। 
आदाब व अख़लाक़ ही इंसानियत की मिराज और उसकी इर्तिका का ज़रिया हैं। बा-अदब शख़्स हर एक की नज़र में मोअज़्ज़ व मुहतरम और बे-अदब शख्स हर एक की निगाह में कमतर और बे-हैसियत बन जाता है। अदब वो रास्ता है जिस पर चलकर आदमी इज़्ज़त व अज़मत की चोटी पर पहुँच जाता है और बे-अदबी वो खाई है जिसमें गिरकर आदमी ज़िल्लत व रूसवाई की गहराई में चला जाता है। यही वजह है कि इस्लाम में आदाब व अख़लाक़ की बड़ी अहमियत है बल्कि अरबी का एक मशहूर मक्कूलह है: 'दीन-ए-इस्लाम सरापा अदब का नाम है। इस्लाम का हर हुक्म और उसका हर फ़रमान अदब व अख़लाक़ की तस्वीर है। इस्लाम अदब का आईना है बल्कि अदब इसकी पहचान और शिनाख्त है। 
दोस्तों! अब आइए शुरू में दी गई आयत-ए-मुक़द्दसा का तरजुमा और शान-ए-नुजूल पढ़ें। 
अल्लाह तआला ने मुनाफ़िक्रीन के कौल को नक़्ल फरमाकर उनके बातिल दावे को रद्द फ़रमाया, जिसमें उन्होंने अपने रब को इज़्ज़त वाला कहा था। चुनांचे इरशाद-ए-बारी तआला है: 
तरजुमा (कंजुल ईमान): कहते हैं कि हम मदीना फिर कर गए तो ज़रूर जो बड़ी इज़्ज़त वाला है, वो उसमें से निकाल देगा उसे जो निहायत जिल्लत वाला है। (मुनाफ़िक़ीन ने अपने रब को इज़्ज़त वाला कहा) (अल्लाह तआला फरमाता है) और इज़्ज़त तो अल्लाह, उसके रसूल और मुसलमानों के लिए है, मगर मुनाफ़िक़ों को ख़बर नहीं। 

शान-ए-नुजूल 

ग़ज़वा-ए-यसीअ से फ़ारिग होकर जब नबी करीम अलैहिस्सालतु वस्सलाम ने सरे चाह (एक कुएँ के पास) नुज़ूल फ़रमाया तो वहाँ यह वाकिया पेश आया कि हज़रत उमर रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु के अजीर जहजाह गिफ़ारी और इब्न अबी के हलीफ़ सनान बिन दुबर जहनी के दरमियान झगड़ा हुआ। जहजाह ने मुहाजिरीन को और सनान ने अंसार को पुकारा।
इस वक़्त इन अबी मुनाफ़िक़ ने हुज़ूर अलैहिस्सालतु वस्सलाम की शान में बहुत गुस्ताख़ाना और बेहूदा बातें कीं और यह कहा कि मदीना तैय्यबा पहुँच कर हम में से इज़्ज़त वाले ज़लीलों को निकाल देंगे। और अपनी क़ौम से कहने लगा कि अगर तुम इन्हें अपना झूठा खाना न दो तो ये तुम्हारी गर्दनों पर सवार न हों। अब इन पर कुछ खर्च न करो ताकि ये मदीना से भाग जाएँ। 
इसकी यह नाशाइस्ता गुफ़्तगू सुनकर ज़ैद बिन अरक़म को ताब न रही। उन्होंने उससे फरमाया कि ख़ुदा की क़सम, तू ही जलील है, अपनी क़ौम में बुग्ज़ डालने वाला और सैयद-ए-आलम अलैहिस्सालतु वस्सलाम के सर-ए-मुबारक पर मेराज का ताज है। हज़रत रहमान ने उन्हें इज़्ज़त व कुव्वत दी है। इन अबी कहने लगा चुप! मैं तो हँसी में कह रहा था। 
ज़ैद बिन अरक़म ने यह ख़बर हुज़ूर अलैहिस्सालतु वस्सलाम तक पहुंचाई। हज़रत उमर रजी अल्लाहु तआला अन्हु ने इन अबी के कत्ल की इजाज़त चाही। सैयद-ए-आलम अलैहिस्सालतु वस्सलाम ने मना फ़रमाया और इरशाद फ़रमाया कि लोग कहेंगे कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने असहाब को क़त्ल करते हैं। 
हुज़ूर-ए-अनवर अलैहिस्सालतु वस्सलाम ने इन अबी से दरयाफ़्त फ़रमाया कि तूने यह बातें कही थीं? वह मुकर गया और क़सम खा गया कि मैंने कुछ भी नहीं कहा। उसके साथ जो मजलिस शरीफ में हाज़िर थे, वह अर्ज़ करने लगे कि इब्न अबी बूढ़ा बड़ा शख़्स है, यह जो कहता है, ठीक ही कहता है। ज़ैद बिन अरक़म को शायद धोखा हुआ हो और बात याद न रही हो। फिर जब ऊपर की आयतें नाज़िल हुईं और इब्न अबी का झूठ ज़ाहिर हो गया तो उससे कहा गया कि जा, सैय्यद-ए-आलम अलैहिस्सालतु वस्सलाम से दरख्वास्त कर, हुज़ूर अलैहिस्सालतु वस्सलाम तेरे लिए अल्लाह से माफ़ी चाहें। तो गर्दन फेरी और कहने लगा कि तुमने कहा, ईमान लाओ, तो हमने ईमान ले आया। कहा, ज़कात दे दो, तो मैंने ज़कात दी। अब यही बाकी रह गया है कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सजदा करूं? इस पर यह और इस से ऊपर वाली आयतें नाज़िल हुई। (खज़ाइनुल इरफ़ान) 
दोस्तों: 
इस आयत-ए-मुक़द्दसा में जहाँ मुनाफ़िक्रीन का झूठ खुलकर सामने आया, वहीं मोमिनीन की इज़्ज़त और एहतराम का हुक्म भी वाज़ेह हो गया। लिहाज़ा जब कुरआन ने वाज़ेह ऐलान फ़रमा दिया कि इज़्ज़त और तकरीम मुसलमानों के लिए है, तो मुसलमानों पर ज़रूरी है कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान की इज़्ज़त करे, एक-दूसरे की ताज़ीम बजा लाए, और एक-दूसरे का अदब व एहतराम मलहूज़-ए-ख़ातिर रखे। क्या मेरे आका करीम अलैहिस्सालतु वस्सलाम का फरमान-ए-आलीशान यह नहीं है कि यानि जो हमारे छोटों पर रहम न करे और बड़ों की ताज़ीम न करे, वह हम में से नहीं। 

अदब किसे कहते हैं 

अदब की तारीफ़ में कई अक़वाल मिलते हैं। 
1. अपनी ज़ात की नफ़ी करके दूसरों को राहत पहुँचाने और ताज़ीम व तकरीम बजा लाने का नाम अदब है। और अपने कौल व फेल के ज़रिए दूसरों की दिल आज़ारी का बाइस बनना बेअदबी है। 
2. (सूफिया के नज़दीक अदब यह है कि) किसी पर अपना हक़ न जताए, किसी से हक़ न माँगे, बल्कि अपने ज़िम्मे हर एक का हक़ समझे और उनका हक़ अदा करने में कोताही न करे। (गुनियातुत-तालेबीन, सफ़ा: 727) 
3. (जो दरहक़ीक़त कई अक़वाल का मजमूआ है) हसीन लहजे, खूबसूरत अंदाज़ में बात करने, मुतानत व संजीदगी, इज़्ज़त व एहतराम, अख़लाक़ व तहज़ीब, अज्ज़ व इन्केसारी और शर्म व हया वगैरह को अदब में शुमार किया जाता है। 
इन तआरिफ़ात से यह मालूम हुआ कि महज़ अपने मफ़ादात के हुसूल के लिए लोगों से उम्दा गुफ़्तगू करना, शीरी ज़बान इस्तेमाल करना, झुककर मुलाक़ात करना और मुस्कुराकर आने वाले का इस्तक़बाल करना या सिर्फ चंद ख़ास उमूर अंजाम देने का नाम अदब नहीं है। बल्कि सीरत-ए-तैय्यबा का मुतालिआ बताता है कि चापलूसी और तमल्लुक़ से बालातर होकर हर वह कौल व फेल जिससे इंसानियत राहत महसूस करे, दूसरों के नफा को अपनी ज़ात पर तरजीह दे, और उनको खुद से बेहतर जानकर उनके साथ हुस्र-ए-ख़ुल्क से पेश आए। उर्दू में एक कहावत बहुत मशहूर है: 'बा अदब बा नसीब, बे अदब वे नसीब। अलबत्ता जब यह सवाल पैदा होता है कि दुनिया में 'बा नसीब कौन है? तो इसका जवाब हर शख़्स अपनी सोच-समझ और अपने नज़दीक चीज़ों की क़दर-ओ-क़ीमत को पेशे नज़र रखकर देता है। 
ताजिर (व्यापारी) की नज़र में कम वक्त में ज़्यादा नफा कमाने वाला बा नसीब' है। दौलत की हवस रखने वाले के नज़दीक अमीर शख़्स बा नसीब और मुफलिस (ग़रीब) बे नसीब है। जाह-ओ-मंसब (पद और प्रतिष्ठा) की आरज़ू रखने वाले के नज़दीक इक्तिदार (सत्ता) और कुर्सी रखने वाला बा नसीब और इज़्ज़त, ओहदा और मंसब से ख़ाली शख़्स बे नसीब है। जिस्मानी ताक़त-ओ-कुव्वत वाले की नज़र में सेहतमंद, तंदरुस्त और पहलवान 'बा नसीब' और कमज़ोर, नातवां और ताक़त-ओ-कुव्वत से महरूम शख्स बे नसीब है।
अहले इल्म के नज़दीक इल्म की दौलत से मालामाल शख़्स 'बा नसीब' और अनपढ़ 'बे नसीब है। 
मगर तारीख़ बताती है कि जिनके पास अदब जैसी अज़ीम दौलत थी, वे 'बा नसीब' थे, और अदब-ओ-अख़लाक़ से ख़ाली शख्स बे नसीब था। 
चुनाँचे हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्तु इरशाद फ़रमाते हैं: 
तरजुमाः यतीम वह नहीं है जिसके वालिद का इंतिक़ाल हो गया, बल्कि यतीम वह है जो इल्म-ओ-अदब से ख़ाली है। 
और आगे इरशाद फ़रमाते हैं: 
तरजुमाः खूबसूरती उन कपड़ों से नहीं है जिन्हें हम पहनते हैं, बल्कि असली खूबसूरती इल्म-ओ-अदब की खूबसूरती है। 
लिहाज़ा बा नसीब न सरमायादार (पूंजीपति) है, न दौलतमंद, न बादशाह और वज़ीर-ओ-मशीर (सलाहकार) हैं, न बड़े-बड़े अफसरान। बल्कि दरहक़ीक़त बा नसीब वे खुश नसीब अफ़राद हैं जो अख़लाक़-ओ-आदाब से मुज़य्यन हैं। 
जिनके नाम को तारीख के औराक़ (पन्नों) ने हमेशा-हमेशा के लिए महफूज़ करके उन्हें अमर कर दिया। इस फ़ज़ा-ए-नीलगू (नीले आसमान) में फैले सुनहरे उजाले की तरह वे सफ़्हा-ए-दहर (दुनिया के पन्नों) में यूँ फैल गए कि आज उनकी ईजादात, तालीमात, मलफूज़ात और तख़्लीकात के बिना यह दुनिया अधूरी ही नहीं, बल्कि बे-ज़ायक्रा और बे-मकसद हो जाती है। 
इस्लामी तारीख की रोशनी में यह बात अयां होती है कि अदब ही की बिना पर हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम सय्यदुल मलाइका बने और बेअदबी की वजह से अजाज़ील इब्लीस व लईन व शैतान बना। अदब की मिसालों में मशहूर तरीन मिसाल हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की है, जिन्होंने अपने वालिद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के हुक्म पर अपनी अज़ीज़ जान का तोहफा मौत की तश्तरी में सजा कर पेश कर दिया। जिनके अदब से मआमूर जुमले को कुरआन मजीद ने यूँ बयान फरमाया हज़रत इस्माईल ने हज़रत इब्राहीम से अर्ज़ किया, ऐ मेरे वालिद बुजुर्गवार आप वह काम करें जिसका आपको हुक्म दिया गया है। इंशाअल्लाह, आप मुझे साबिरिन में से पाएँगे। 
किसी शायर ने यूँ नक्शा खींचाः 
यह फैज़ान ए नज़र था या के मकतब की करामत थी सिखाए किसने इस्माईल को आदाब ए फर्ज़िन्दी
अदब और अखलाक़ मुआशरे की बुनियादी हैसियत का दर्जा रखता है, जो मुआशरे को बुलंद करने में निहायत अहम किरदार अदा करता है। अदब से आरि इंसान अपना मुकाम नहीं बना सकता है। 

बा अदब बा नसीब बे अदब बे नसीब 

मन्कूल है कि एक बार हज़रत बहलूल दाना किसी नखलिस्तान में तशरीफ रखते थे। एक ताजिर का वहाँ से गुज़र हुआ। वह आपके पास आया, सलाम कर के अदब से सामने बैठ गया और इंतेहाई अदब से गुज़ारिश की: हुज़ूर। तिजारत की कौन सी ऐसी जिन्स ख़रीदूँ जिस में बहुत मुनाफा हो? हज़रत बहलूल दाना ने फरमाया: काला कपड़ा ले लो। ताजिर ने शुक्रिया अदा किया और उलटे क़दमों वापस चला गया। जाकर उसने इलाके में दस्तयाब तमाम सियाह कपड़े ख़रीद लिए। कुछ दिनों बाद शहर का बहुत बड़ा आदमी इंतकाल कर गया। मातमी लिबास के लिए सारा शहर सियाह कपड़े की तलाश में निकल पड़ा। सारे सियाह कपड़े इस ताजिर के पास ज़ख़ीरा थे। अब उसने मुँह मांगे दामों में फरोख्त किया और इतना मुनाफा कमाया जितना सारी ज़िन्दगी न कमाया था और बहुत ही अमीर कबीर हो गया। कुछ अरसे बाद वह घोड़े पर सवार कहीं से गुज़रा, हज़रत बहलूल दाना वहाँ तशरीफ रखते थे। वह ताजिर घोड़े पर बैठा रहा और बोला: ओ दीवाने! अब की बार क्या लूँ? हज़रत बहलूल दाना ने फरमायाः तरबूज़ ले लो। वह भागा भागा गया और सारी दौलत से पूरे मुल्क से तरबूज़ ख़रीद लिया। एक ही हफ़्ते में सब ख़राब हो गए और वह कोड़ी कोड़ी का मुहताज हो गया। इसी ख़स्ता हाल में घूमते फिरते उसकी मुलाकात हज़रत बहलूल दाना से हो गई तो उसने कहा: ये आपने मेरे साथ क्या किया? हज़रत बहलूल दाना ने फरमायाः मैंने तेरे साथ कुछ नहीं किया। तेरे मुतकब्बराना लहजों और गुस्ताख़ाना अल्फाज़ ने ये सब किया। जब तू बा-अदब होकर आया तो बानसीब होकर गया और माला माल हो गया और जब तू बेअदब और गुस्ताख़ होकर आया तो बेनसीब होकर गया और कंगाल हो गया। 
दोस्तों! तो देखा आपने कि इंसान जब बाअदब होता है तभी बानसीब होता है, इसके बरअक्स बेअदब और गुस्ताख़ शख्स बेनसीब और हर जगह ज़लील व रुसवा होता है। इसी लिए मज़हब-ए-इस्लाम ने अदब व ताज़ीम पर बड़ा ज़ोर दिया है और हर रिश्ते के हुकूक व आदाब को वज़ाहत के साथ बयान फरमाए हैं। जिन में सरे फेहरिस्त वालदैन के हुकूक़ और उनके आदाब है, इसी तरह उस्तादों के आदाब, बड़े-बूढ़ों के आदाब, बुजुर्गों के आदाब, पड़ोसियों के हुकूक व आदाब तफ़सील के साथ इस्लामी तालीमात में मौजूद हैं। 
माँ-बाप का अदब  आज बूढ़े वालदैन के साथ नौजवान जो सुलूक करते हैं वह किसी से छुपा नहीं, आज के बच्चे और नौजवान वालदैन को बात-बात पर डांटने, झिड़कने और बुलंद आवाज़ से बात करने में थोड़ी भी शर्म महसूस नहीं करते, माँ-बाप किसी चीज़ के बारे में पूछ लें तो भौहें तन जाती है। मगर यही नौजवान बचपन में वालदैन से जो कुछ पूछते वालदैन खुशी-खुशी बताते थे। माँ-बाप के आगे सिर्फ दो वक्त की रोटी रखना ही सब कुछ नहीं है, बल्कि वालदैन की इताअत, फरमांबर्दारी, अदब व ताअज़ीम इंसान को कामयाब बनाती है, वालदैन की दुआएँ कामयाबी का ज़रीया हैं, जिसकी बदौलत आप एक कामयाब इंसान बनकर मुल्क व कौम का नाम रोशन कर सकते हैं।
अभी ज़्यादा ज़माना न गुज़रा कि लोग माँ-बाप के बराबर बैठना, उनके आगे चलना और उनसे ऊँचा बोलना बुरा समझते थे और उनके हुक्म पर अमल करना अपने लिए फ़ख़ जानते थे। इसके सदक़े अल्लाह उन्हें नवाज़ता भी था। इस्लामी समाज में यह बात मशहूर थी कि जो यह चाहता है कि अल्लाह उसके रिज़्क़ में इज़ाफ़ा करे वह वालदैन के अदब व एहतराम का हक़ अदा करे और जो यह चाहता है कि अल्लाह उसके इल्म में इज़ाफ़ा करे वह उस्ताद का अदब करे।
एक वाक्रिया मेरी समाअत से गुज़रा कि एक शख्स ने बड़ी मशक़्क़त से पैसे इकट्ठा करके प्लॉट लिया तो वालिद साहब ने कहा कि बेटा। तुम्हारा फलां भाई कमज़ोर है। ये प्लॉट अगर तुम उसे दे दो तो मैं तुम्हें दुआएँ दूँगा, हालाँकि वह भाई वालदैन का नाफरमान था। इस शख्स ने कहा कि अक़्ल ने बहुत समझाया कि यह काम करना हिमाक़त है मगर मैंने अक़्ल से कहा कि डॉक्टर इक़बाल ने कहा है: 
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान अक़्ल 
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़िए। 
चुनाँचे अक़्ल को तन्हा छोड़ा और वह प्लॉट भाई को दे दिया। वह शख़्स कहता है कि वालिद साहब बहुत खुश हुए और उन्हीं की दुआ का स‌दका है कि आज मेरे कई मकान और प्लॉट हैं, जबकि भाई का बस उसी प्लॉट पर एक मकान है। 
उस्ताद का अदब माँ-बाप के बाद सबसे अहम मक़ाम उस्ताद का है, उस्ताद रूहानी वालदैन का दरजा रखता है। इस लिए शागिर्द अपने उस्ताद का जितना भी इज़्ज़त करें कम है, क्यों कि यह उस्ताद ही का जिगर है जो खुद को जला कर अपने शागिर्दों के मुस्तक़बिल को रोशन और ताबनाक करता है। लिहाज़ा शागिर्दों पर यह लाज़िम है कि अपने उस्ताद के हक़ को पहचानें, उसका हुक्म अदब से सुनें और इज़्ज़त व एहतिराम के साथ उस हुक्म की तामील करें। बेशक जो शागिर्द अपने उस्ताद को खुश रख लेता है, खुश नसीबी उसके क़दम चूम लेती है। वालदैन की तरह उस्ताद का अदब भी इस्तामी मुआशरे की एक इम्तियाज़ी ख़ुसूसियत है और इसका तसल्सुल भी सहाबा-ए-किराम के ज़माने से चला आ रहा है। हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास रज़ी अल्लाह तआला अन्हुमा किसी सहाबी से कोई हदीस हासिल करने जाते तो जाकर उसके दरवाज़े पर बैठे रहते, उसका दरवाज़ा खटखटाना भी अदब के खिलाफ़ समझते और जब वह सहाबी खुद ही किसी काम से बाहर निकलते तो उनसे हदीस पूछते और इस दौरान सख़्त गर्मी में पसीना बहता रहता, लू चलती रहती और यह बर्दाश्त करते रहते। वह सहाबी कहते कि आप तो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि-वसल्लम के चचाज़ाद भाई हैं, आप मुझे ही बुला लेते। तो यह कहते, में शागिर्द बनकर आया हूँ, आपका यह हक़ था कि मैं आपका अदब करूँ और अपने काम के लिए आपको तंग न करूँ। 

अदब और अहतराम का मिसाली वाक़िया

अदब व अहतराम का एक मिसाली वाक्रिया मुलाहिजा करें जो बहुत मशहूर है। एक मर्तबा रसूल-ए-काइनात ने हज़रत अब्बास रजी अल्लाह तआला अन्हु से पूछा गया कि आप बड़े हैं या मैं? (उम्र शरीफ पूछना मकसूद था मगर कुर्बान जाएं हज़रत अब्बास रज़ी अल्लाह तआला अन्हु के जवाब पर)। अर्ज़ करते हैं: या-रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! बड़े तो आप ही हैं, लेकिन उम्र मेरी ज़्यादा है।
उस्ताद के अदब का एक और जलवा मुलाहिज़ा करें। हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल रज़ी अल्लाह तआला अन्हु नहर पर वुज़ू फरमा रहे थे कि उनका शागिर्द भी वुज़ू करने आ पहुँचा। लेकिन फौरन ही उठ खड़ा हुआ और इमाम साहब से आगे जाकर बैठ गया। पूछने पर कहा कि दिल में ख़्याल आया कि मेरी तरफ से पानी बहकर आपकी तरफ आ रहा है। मुझे शर्म आती है कि उस्ताद मेरे मुस्तअमल पानी से वजू करें। 
मुजद्दिद-ए-अल्फ-सानी रहमतुल्लाह तआला अलेह रात को सोते हुए ये एहतियात भी करते कि पाँव उस्ताद के घर की तरफ़ न हों और बेतुल खला जाते वक़्त ये एहतियात करते कि जिस क़लम से लिख रहे हों, उसकी सियाही हाथ पर लगी न रह जाए। यह भी इस्लामी तहज़ीब का तुर्रा ए इम्तियाज़ रहा है कि हमारे अस्लाफ उस्ताद के अदब व अहतराम के साथ-साथ आला-ए-इल्म का भी अदब करते थे। 
बड़े-बुज़ुर्गों का अदब हर शख्स के साथ अदब से पेश आने वाला बानसीब और अदब से पेश न आने वाला बेनसीब ठहरता है, लिहाज़ा कोई भी बड़ा-बज़ुर्ग हो, उसकी ताज़ीम व तौकीर और अदब व अहतराम नौजवानों पर लाज़िम है। बड़े-बज़ुर्गों की सोहबत में बैठने से दिल में अल्लाह की मोहब्बत, आख़िरत की फिक्र और आमाल व अख़लाक़ दुरुस्त होने लगते हैं। और इंसानियत से प्यार होने लगता है। बड़े-बज़ुर्गों के बिना इस्लाह-ए-मुआशरा निहायत मुश्किल है। नीज़ बड़े-बज़ुर्गों की दुआओं में बड़ा असर होता है। इस लिए बड़े-बज़ुर्गों के साथ ताज़ीम व तौकीर का मामला करना चाहिए। 
रिश्तेदारों और दूसरे अहबाब का अदब आज इस मादा परस्त दौर में रिश्तेदारों का भी पास व लिहाज़ कमा हक़्क़हु बाक़ी न रहा, मोहब्बत की जगह ज़रूरत ने ले ली है, भाई-चारे और दोस्ती की जगह मतलब परस्ती को परवान चढ़ाया जा रहा है। पहले अपनों से मुलाकात मक़्सूद होती थी और मिलने के बहाने कोई काम निकल आता था। और अब काम रहता है तो मुलाकात होती है, वरना नहीं। जबकि इस्लाम ने हर एक के हुकूक व आदाब को वाज़ेह तौर पर बयान फरमा दिया। ख़्वाह वो आपके मुताल्लिक्रीन हों या आपके वालदैन के मुताल्लिक्रीन। हर एक के साथ ताज़ीम व अदब का मामला करना ही इस्लामी तहज़ीब है और ना रवां सुलूक को कहीं भी इस्लाम ने जाइज़ नहीं रखा। इस्लामी मुआशरे की तारीख़ तो यह रही है कि वहाँ छोटा छोटा था और बड़ा बड़ा। छोटा उम्र बढ़ने के साथ अपने बड़े से बड़ा नहीं बन जाता बल्कि अपने बड़े से छोटा ही रहता है। चूंकि रवादारी की एक बेहतरीन मिसाल मन्कूल है कि हज़रत इब्न उमर जा रहे थे कि एक बददु को देखा, सवारी से उतरकर, बड़े अदब से पेश आए और उसे बहुत सा हदीया दिया। किसी ने कहा यह बददु है, थोड़े से भी राज़ी हो जाता, आपने उसे इतना ज़्यादा अता कर दिया। फरमाया यह मेरे वालिद साहब के पास आता था, तो मुझे शर्म आई कि मैं इसका इहतराम न करूँ। 
इस्लामी तहज़ीब कमज़ोर हुई तो बहुत सी बातों की तरह हिफ़्ज़ मरातिब की क्रीमत भी अपनी क़ीमत खो बैठी। अब बराबरी का ढींढोरा पीटा गया और बच्चे माँ-बाप के बराबर खड़े होने लगे और शागिर्द उस्ताद के बराबर। जिस से वह सारी खराबियाँ आ गईं जो पश्चिमी तहज़ीब में मौजूद है। इस्लाम इस मसावात का हरगिज़ क़ाइल नहीं। हालाँकि इस्लाम का दावा यही मसावात का है मगर वह मसावात जिसमें हर एक के अदब का मुकम्मल ख़्याल रखा जाए।
मगर अफ़सोस! आज लफ्ज़ मसावात का गलत इस्तिमाल हो रहा है, लोग अपनी तबीयत के मुताबिक मसावात और बराबरी की तारीफ़ और तौज़ीह पेश करते हैं, अक्लियती एतबार से मुसलमान तो इस क़दर गिर चुके हैं कि गैरों को भी पीछे छोड़ रखे हैं। आज तो मुसलमान मुसलमानों से भी महफूज़ नहीं है। कोई ज़बान से सताया जा रहा है, कोई हाथ से, कोई अमल से सताया जा रहा है। गर्ज़ कि तअज़ीम मुस्लिमीन का सबक़ जो हमें दिया गया था हम भुला बैठे हैं। आपसी अख़लाक़ और आदाब का जब जनाज़ा निकला और बड़े-बज़ुर्गों की गुस्ताख़ियाँ और बे-अदबियाँ आम हो गईं तो लोग इतने बे-राह-रू हो गए कि अंबिया और अवलिया की भी तौहीन की जाने लगी। हालाँकि अंबिया की तअज़ीम फ़र्ज़ ऐन है और इन मुअज़्ज़म हिस्तियों की जनाब में अदना तौहीन भी कुफ्र है। बल्के तवारीख़ उमम के मुताअला के बाद में इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि अगर कोई बे-ईमान भी किसी नबी की तअज़ीम व अदब बजा लाता है तो अल्लाह तआला उसकी बरकतों से उसे ईमान जैसी अज़ीम दौलत से माला-माल कर देता है। चनांचे कुरआन मुकद्दस में एक बहुत ही मशहूर वाक्रिया मज़कूर है जिसमें अस्दहाए मूसवी की बात बहुत ही शानदार तरीके से आई है। पूरा वाक्रिया आपके ज़हन और फिक्र में मौजूद ही होगा कि जब जादूगर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के मुकाबिल खड़े हो गए तो जादूगरों ने आते ही जादुई हमला न किया बल्कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बारगाह में अर्ज़ गुज़ार हुए, जिसे कुरआन ने इस तरह बयान किया है: 
तर्जुमा जादूगर बोले: ऐ मूसा! या तो तुम डालो या हम पहले डालें। मूसा बोले, तुम डालो... 
गौर करें कि सारे जादूगर फिरऔन की तरफ से जादुई अमल के ज़रिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ज़ेर करने की कोशिश में आए थे, और जंग और मुकाबले में ऐसा होता है कि जब मुक़ाबिल ताकतवर हो तो अचानक हमला करने की कोशिश की जाती है, ताकि ग़फ़लत में हमला करके फ़तेह हासिल की जा सके। मगर जादूगरों ने ऐसा नहीं किया, बल्कि उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से इजाज़त मांगी, जैसे ही इजाज़त मांगी, उन्हें तअज़ीम हासिल हुई और इस तअज़ीम की बरकत जादूगरों को फ़ौरन मिल गई, और उसी वक्त वो सभी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के रब पर ईमान लाकर मोमिन हो गए और फिरऔन की तरफ से सब शहीद भी कर दिए गए। 
कुछ देर पहले वो सब कुफ्र के दल दल में फंसे हुए थे, मगर यह तअज़ीम-ए-नबी की बरकत कहिए कि फौरन दौलत-ए-ईमान से नवाज़े गए और साथ ही शहादत-ए-उज़्मा के अज़ीम मंसब पर फाईज़ होकर हमेशा के लिए ज़िंदा और जावेद हो गए। 
दोस्तों, तअज़ीम-ए-नबी का जलवा एक और जगह पर देखिए। 
एक दिन हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने हुद-हुद को गाइब पाया, इसका ज़िक्र कुरआन में इस तरह है: 
तर्जुमाः और परिंदों का जायज़ा लिया तो कहा, मुझे क्या हुआ कि में हुद-हुद को नहीं देखता या वह वाक़ई गाइब है? ज़रूर में उसे सख़्त अज़ाब करूंगा या उसे ज़िबह कर दूँगा या कोई रोशन सनद मेरे पास लाए। तो हुद-हुद कुछ ज़्यादा देर न ठहरा और आकर अर्ज़ की, मैं वह बात देख आया हूँ जो आप ने नहीं देखी और में शहर-ए-सबा से आपके पास एक यकीनी खबर लाया हूँ। और उसने पूरी खबर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में पेश की, पूरी खबर सुनने और तस्दीक़ करने के बाद हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने एक खत मलिका बिलक़ीस के नाम भेजा और जब वह खत बिलकीस के पास पहुँचा तो उन्होंने खत पा कर क्या किया, कुरआन की जबान में सुनिए। 
तर्जुमा वह औरत बोली: ऐ सरदारों! बे शक मेरी तरफ एक इज़्ज़त वाला खत डाला गया। 
बिलक्रीस के इस क़ौल में तअज़ीम-ए-नबी का गोशा खूब नुमायां है कि खत उस वक्त क़ाबिल-ए-तअज़ीम हो सकता है जब भेजने वाला क़ाबिल-ए-तअज़ीम हो। गोया गायबाना तौर पर ही बिलकीस तअज़ीम-ए-नबी बजाती है। और फिर बरकतों का ज़ुहुर शुरू होता है और हज़रत बिलक्रीस हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम की बारगाह में पहुँचकर मुशर्रफ बा ईमान हो जाती है। 
इस किस्म के वाक्रियात से तारीख के औराक पुर हैं। दो वाक्रिए ही यह समझने के लिए काफी हैं कि तअज़ीम-ए-नबी और आदाब ही हुसूल-ए-दौलत-ए-ईमान और हिफाज़त-ए-ईमान का सबब हैं। और जहाँ कहीं भी जिस किसी की तरफ से अज़मत-ए-अम्बिया में कमी वाक्रे होगी, उसका ईमानी दावा खोखला होगा और कसरत-ए-इबादत व रियाज़त उसके किसी काम नहीं आ सकते। 
न ताअत पर, ना तकवा पर, न ज़ुह्द व इतका पर है। 
हमारा नाज़ जो कुछ है मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर है। 
और ऐसे गुस्ताख़ शख्स से अपना कोई ताल्लुक़ भी नहीं है। 
बकौल-ए-शायर
बहुत सादा सा है अपना उसूल दोस्ती कौसर, 
जो उनसे ला-तलुक़ हो हमारा हो नहीं सकता। 
और आला हजरत फरमाते हैं:
मोमिन वह जो उनकी इज़्ज़त पर मरे दिल से, 
तअज़ीम भी करता है, नज्दी तो मरे दिल से। 
और मौलाना जफर अली ख़ान लिखते हैं: 
न जब तक कट मरू में ख़्वाजा-ए-बला की हुरमत पर, 
ख़ुदा शाहिद है क्रामिल मेरा ईमान हो नहीं सकता। 
दोस्तों। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इस्लाम के इस अहम सबक़ को फिर से ज़माने भर में दोहराएं ताकि वह बरकतें जो हमारे असलाफ़ को मयस्सर थीं, हमें भी मिल सकें। अल्लाह तआला हमें तौफीक़-ए-खैर से नवाज़े।
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