नशे की लानत और हमारा मुस्लिम नौजवान
अल्लाह तबारक व तआला का बे पायां शुक्र व एहसान है कि उसने हमें इंसान बनाकर इस दुनिया में पैदा फ़रमाया और करम बाला-ए-करम ये कि उसने अपने हबीब-ए-मुकर्रम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उम्मत में पैदा फरमाया और हम गुनाहगारों के हाथों में मुस्तफ़ा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पाक दामन अता फरमाया और साथ ही तंबीह फ़रमाई कि अगर तुमने मुस्तफ़ा का कलमा पढ़ा है तो अब तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी ख़्वाहिशात के मुताबिक़ नहीं गुज़रेगी बल्कि तुम्हारे सामने नबी आख़िर-उज़-ज़मां सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी सीरत-ए-तय्यिबा मौजूद है जो मुकम्मल दस्तूर-ए-हयात भी है और मंशूर-ए-अहदाफ भी।
इसलिए ब-हैसियत-ए-मोमिन व मुस्लिम तुम्हारा नस्ब-उल-ऐन है कि तुम अपनी तबीयत के गुलाम बनकर लमहात-ए-हयात तय न करो बल्कि गुलाम-ए-अहमद-ए-मुख्तार बनकर उनकी इताअत में अपनी तवानाई सरफ़ करो। और कुरआन में इरशाद हुआ:
'ल-क़द काना लकुम फी रसूलिल्लाहि उस्वतुन हसना' (सूरतुल-अहजाब)
ऐ मेरे बंदो! तुम्हारे लिए नबी की जिंदगी बेहतरीन आइडियल है।
ख़्वाह वो समाजियात का शोबा हो या इक़्ते सादियात का, मआशियात का मैदान हो या अखलाक़ियात का, हर मैदान में तुम्हें आफ़ताब-ए-नुबूवत से मुकम्मल रोशनी मिलेगी। अगर तुम्हें अपनी अमली जिंदगी को मुनव्वर व रोशन करना हो तो नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरत-ए-तय्यिबा की ज़िया-बार किरणों से अपने ख़ाना-ए-दिल की तारीकी को दूर करना होगा।
और हां, याद रखना कि फ़क़त नाम लेने या नारा लगाने से तुम कामिल ईमान वाले तसव्वुर नहीं किए जाओगे बल्कि इसके लिए एक मियार है। कुरआन में है कि दुनिया की तमाम तर चीज़ों से ज़्यादा अल्लाह व रसूल से मुहब्बत करनी होगी और अल्लाह व रसूल की रज़ा के लिए अपनी तबीयत का गला घोंटकर मुस्तफा जान-ए-रहमत की शरीअत पर अमल करना होगा। अगर ऐसा नहीं कर सके तो तुम्हें दुनिया में भी ज़िल्लतों का सामना करना होगा और क्रियामत के दिन भी रुस्वाइयों से दो-चार होना पड़ेगा।
चुनांचे इरशाद-ए-रब्बी है:
कुल इन काना आबाउकुम व अबनाउकुम व इख़्वानुकुम व अज्वाजुकुम व असीरतुकुम व अमवालुनिक्तरप्रतुमूहा व तिजारतुन तख़्शौना कसादहा व मसाकिनु तरदवनहा अहब्बा इलैकुम मिनल्लाहि व रसूलिहि व जिहादिन फी सबीलिहि फतरब्बसू हत्ता यअतियल्लाहु बि-अग्रिहि वल्लाहु ला यहदील क़ौमल फ़ासिक़ीन' (सूरतुत-तौबा)
इन आयात-ए-बय्येनात से वाजेह हो गया कि हमें तरीक़ा वही अपनाना है जिसकी रहनुमाई कुरआन कर रहा है। अगर इससे हम सरे मो बाल की नोक के मिक़दार भी मुन्हरिफ़ हुए तो हमारा अमली ज़वाल शुरू हो जाएगा और दारेन में खैबान व खुसरान के मुस्तहिक़ भी होते चले जाएंगे।
इसलिए हम कलमा गो मुसलमानों की अहम तरीन ज़िम्मेदारी है कि हम कायनात की सारी चीज़ों से ज़्यादा ख़ुदा और रसूल से मुहब्बत भी करें और उनके इरशादात व फ़रामीन पर चलकर अपनी आख़िरत को बेहतर भी बनाएं।
आज की इस गुफ़्तगू में हमारा उन्वान है 'नशे की लानत और हमारा मुस्लिम मुआशरा।
इस उन्वान पर जब भी कोई ख़तीब अपना लब खोलता है और कोई मुहर्रिर क़लम को जंबिश देता है तो उसके बयानात व सफ़हा-ए-किर्तास पर नशे के दुनियवी व उखरवी नुक़सानात और मुआशरे में इसके असरात जेब-ए-तहरीर व बयान किए जाते हैं।
नशा दौलतमंद को भिकारी बना देता है
यक़ीनन नशा एक ऐसा मर्ज़ है जो तवाना व तंदुरुस्त इंसान को खोखला और अक़्लमंद व ख़िर्दमंद को माऊफ़ व बेअक़्ल और दौलतमंद को भिकारी बना देता है। और इसके हिसार में आने वाले अफ़राद, ख़्वाह मर्द हों या औरत, जवान हों या बूढ़े, सबके सब ज़हनी तौर पर ऐसे माजूर हो जाते हैं कि उनकी फ़िक्र व नज़र वाली सारी तवानाई कलअदम हो जाती है और वो बेआसरा होकर सड़क के किनारे अपनी ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हो जाते हैं।
आज हमारे मुआशरे में बहुत से ऐसे जवान मिल जाएंगे जिनकी ज़िंदगी इंतिहाई खुशगवार थी और वो बावकार ज़िंदगी भी गुज़ार रहे थे, मगर नशे की लत क्या लगी, वो रफ़्ता रफ़्ता तनज्ज़ुली की तरफ़ आने लगे और देखते ही देखते वो इस मक़ाम पर जा पहुंचे जहां न उनकी कोई इज़्ज़त है और न ही वक्रार, न उनके पास इतने पैसे बचे कि वो अपनी ज़िंदगी अच्छे से बसर कर सकें।
नशे की खरीद-ओ-फरोख्त और अफ़सोसनाक हक़ीक़त
पूरी दुनिया में नशा आवर अशिया की खरीद-ओ-फरोख्त भी आला पैमाने पर हो रही है और नशाखोरों की तादाद में गैर मामूली इज़ाफ़ा भी हो रहा है। सबसे ज़्यादा अफ़सोसनाक तो ये है कि हमारे मुस्लिम नौजवान भी इसकी ज़द में आ रहे हैं और नौजवानों का एक बड़ा तबका इसके हिसार में है। जिन मज़ाहिब के लोगों के पास कोई उसूल व ज़ाबिते न हों और वो इस लानत की ज़द में आएं तो इतना तअज्जुब खेज़ नहीं है, मगर हमारे पास तो मुस्तफा करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इरशादात व कुरआनी तालीमात बतौर निज़ाम-ए-हयात मौजूद हैं, जिसमें मुनशियात से इज्तिनाब करने की बार-बार तलक़ीन की गई है और कुरआन व अहादीस में जा-बजा इसकी वईदात भी वारिद हैं।
नशा व शराब की हक़ीक़त
दोस्तों! आइए जानते हैं कि नशा है क्या? तो नशा-आवर चीज़ों का ज़िक्र जब भी आता है, हमारा तबादुर-ए-ज़ेहन शराब, गांजा, भंग, अफीम वगैरह की तरफ़ होता है। मगर इस टेक्नॉलोजी व मादियत ज़दा दौर में नए-नए तरीक़ों की नशीली अशिया तैयार भी की जा रही हैं और नौजवान बड़ी तेज़ी से इसके लपेट में आ रहा है, जैसे हीरोइन, ड्रग्स वगैरह।
इंसान जब नशीली चीज़ों का आदी हो जाता है और उसको जब इन मुखर्रब-ए-अख़लाक़ चीज़ों की लत लग जाती है तो ये उसके चाहने से भी नहीं छूटती बल्कि रफ़्ता रफ़्ता ये उसकी शख़्सियत को बर्बाद कर देती है।
शराब है क्या?
हमारे उलमा ने लिखा है कि शराब यानी ख़म्र को खम्र इसलिए कहा जाता है कि शराब का नाम ख़म्म्र इसलिए रखा गया कि ये अक़्ल पर पर्दा डाल देती है। इंसान सही और गलत की तमीज़ भूल जाता है, जाइज़ व नाजाइज़ के दरमियान फर्क करने के काबिल नहीं रहता।
सिर्फ शराब ही इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से हराम नहीं है, बल्कि सरकार-ए-अबद क़रार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निगाह-ए-नुबुव्वत देख रही थी कि एक दौर ऐसा भी आएगा जब लोग शराब की जगह नई-नई चीज़ों का इस्तेमाल करेंगे और उनका नाम बदल देंगे। आपने इस फ़साद का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।
चुनांचे इरशाद हुआ: हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवा-यत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया हर नशा आवर चीज़ शराब है और हर नशा आवर चीज़ हराम है, ख़्वाह वो थोड़ी हो या ज्यादा।
इससे वाज़ेह हो गया कि आज जो लोग तफ़रीह के नाम पर तरह-तरह की मुनशियात (नशा) इस्तेमाल कर रहे हैं, वो सबके सब हराम और मुनजिर इलन्नार (जहन्नम में ले जाने वाले) हैं।
शराब के मुतअल्लिक कुरआनी वईदात
इस्लाम में शराब सख़्त हराम है। आप इससे अंदाज़ा लगाइए कि कुरआन पाक में मुतअद्दिद मक़ामात पर इसकी हुरमत वारिद है और इससे बचने की तलक्रीन की गई है।
चुनांचे इरशाद-ए-बारी तआला है:
يسألونك عن الخمر والمشير قُلْ فيهما إِثْمُ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْثَرُ مِنْ نَفْعِهِمَا
(سورة البقرة)
कुछ लोग हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में आए और शराब व जुए के मुतअल्लिक दरियाफ्त कर रहे थे। अल्लाह जल शानूहु ने हज़रत जिब्रईल अलैहिस्लाम को भेजा और ये आयत नाज़िल हुई:
ऐ मेरे हबीब ये लोग आपसे शराब और जुए के बारे में दरियाफ्त कर रहे हैं। आप इनसे फरमाइए कि इन दोनों कामों में बहुत बड़ा-गुनाह है और लोगों के लिए-कुछ फ़ायदे भी हैं, लेकिन इनका गुनाह इनके फायदे से ज़्यादा है। इस दर्ज बाला आयत शरीफ़ा में शराब और जुए की मज़म्मत (निंदा) बयान की गई है, कहा गया है के जुए और शराब का गुनाह उसके नफ़ा (फायदे) से ज़्यादा है। नफ़ा बस यही है कि शराब से कुछ सुरूर (सुकून) पैदा होता है या उसकी खरीद-फरोख्त से तिजारती (व्यापारिक) फायदा होता है। जुए में यह फायदा है कि कभी-कभी मुफ्त का माल हाथ आ जाता है। लेकिन शराब और जुए की वजह से होने वाले गुनाह और फ़सादात (बिगाड़) बेशुमार हैं।
शराब के नुक्सानात
शराब से अक़्ल (बुद्धि) ज़ाएल हो जाती है, गैरत (सम्मान) और हमीयत (आत्म-सम्मान) का जनाज़ा निकल जाता है। मां, बहन, बेटी की तमीज़ खत्म हो जाती है। इबादत से दिल ऊबने लगता है और इबादत का लुत्फ़ (आनंद) दिल से निकल जाता है। जुए की वजह से लोगों से दुश्मनी पैदा हो जाती है। आदमी सबकी नज़र में ज़लील-ओ-ख़्वार (अपमानित) हो जाता है। उसे जुएबाज़ और सट्टेबाज़ के नाम से बदनाम किया जाता है। कभी-कभी इंसान अपना सब माल-ओ-असबाब (संपत्ति) जुए में हार जाता है। जिंदगी तबाह-ओ-बर्बाद हो जाती है। मेहनत से जी चुराने लगता है और मुफ़्तखोर बनने की आदत पड़ जाती है। वगैरह,
एक रिवायत में आता है कि हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम ने हज़रत रसूल-ए-पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में अर्ज़ किया कि अल्लाह तआला को हज़रत जाफ़र तय्यार की चार ख़सलतें पसंद हैं।
सरकार-ए-दो आलम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने हज़रत जाफ़र तय्यार रज़ियल्लाहु अन्हु से दरियाप्त फरमाया। उन्होंने अर्ज़ किया कि एक ख़सलत तो ये है के मैंने कभी शराब नहीं पी, यानी हुरमत का हुक्म नाज़िल होने से पहले भी मैंने शराब नहीं पी। और इसकी वजह यह थी के में जानता था कि इससे अक़्ल ज़ाएल होती है और मैं चाहता था कि मेरी अक़्ल और तेज हो। (तफसीरात-ए-अहमदिया, अल-बक़रा, तहत आयतः 219, सफ़ा: 101)
शराब की नहूसत मौला अली की नज़र में
सुब्हान अल्लाह, क्या सलीम-उल-फितरत थे। शराब के मयस्सर होने के बाद भी कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। यक़ीनन ये तअज्जुबखेज़ है कि एक ऐसा मुआशरा जहाँ हर क़िस्म के लोग शराब के आदी हों और शराब उनके रग-ओ-रेशे में सरायत कर गई हो, ऐसे लोगों के बीच में रह कर असबाब-ओ-वसायल के होते हुए उसके क़रीब न जाना, ये शराफ़त-ए-कल्ब व तहारत-ए-नफ्स का बेहतरीन सबूत है।
इसी तरह हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहुल करीम ने फ़रमाया कि अगर शराब का एक क़तरा कुएँ में गिर जाए, फिर उस जगह मीनार बनाई जाए, तो में उस पर अज़ान न दूँगा और अगर दरिया में शराब का क़तरा पड़ जाए, फिर दरिया खुश्क हो जाए और वहाँ घास पैदा हो, तो मैं उसमें अपने जानवरों को चराना गवारा नहीं करूंगा।
(मदारिक, अल-बकरा, तहत आयतः 219, सफ्रा: 113)
अल्लाहु अकबर! ये थी ख़शियत-ए-इलाही व ख़ौफ़-ए-ख़ुदा और तक़वा, कि शराब पीना तो दूर, इसके क़रीब जाने को भी हराम समझते थे।
शराब के मुतअल्लिक कुरआनी हुक्म
अगर हम शराब के मुतअल्लिक दीगर आयात की तरफ़ नज़र दौड़ाएँ, तो अल्लाह ने फरमाया तर्जमा: ऐ ईमान लाने वालों! शराब, जुआ, बुत और क़िस्मत मालूम करने के तीर नापाक शैतानी काम हैं, तो इनसे बचते रहो ताकि तुम फलाह पाओ। इस आयत करीमा का तेवर मुलाहिज़ा करें कि किस क़दर शिद्दत के साथ शराब से बचने की तलकीन की गई और इससे मुत्तसिल ही बुतपरस्ती वगैरा का ज़िक्र फ़रमाकर इन आमाल को शैतानी काम करार दिया और अहले ईमान को इससे बचने की तलकीन फ़रमाई। साथ ही साथ फलाह व बहबूद की गारंटी भी दी। मगर कब ये कामयाबी मिलेगी? जब हम शराब व दीगर नशीली अशिया से दूर व नफूर रहें। क्यों कि अहले ईमान की ज़िम्मेदारी है कि वो फ़क़्त आमाल-ए-सालेहा पर ही अपनी तवज्जोह न दें, बल्कि आमाल-ए-सय्येह से भी इज्तिनाब करें। क्यों कि कोई भी परिंदा एक पर से नहीं उड़ सकता। अगर उसे उड़ना है, तो दोनों परों का सालिम होना शर्त है।
और खुद नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने एक मक़ाम पर फ़रमायाः इत्तकिल-महारिम तकुन अबदन्नास
यानिः 'तुम अल्लाह के हराम करदा उमूर से बचो, तो तुम सब से बड़े इबादत गुज़ार बन जाओगे।
इस हदीस में ये नहीं फ़रमाया कि नमाज़ पढ़ो, रोज़ा रखो, सारे अच्छे काम करो तो इबादत गुज़ार बन जाओगे। बल्कि फरमायाः इन आमाल के साथ-साथ उमूर-ए-मुहर्रमाह के इर्तिकाब से बचो, तो बारगाह-ए-ख़ालिक़ में तुम इबादत गुज़ार माने जाओगे।
शराबनोशी के नुक़सानात
शराबनोशी के नुक़सानात किस क़दर ज़्यादा है, आप इस से अंदाज़ा लगाएं कि एक आदमी जब नशे में मुब्तिला हो जाता है, तो उसके साथ-साथ कई लोगों की जिंदगियां खराब हो जाती है। अगर किसी घर का मर्द शराब व दीगर मुनशियात का आदी हो गया, तो अब उस घर की बीवी की ज़िंदगी अजीरन हो जाती है। वो नशे में डूबकर जब घर आता है, तो बीवी पर, बच्चों पर बेजा तशदुद करता है, गालियां बकता है, उनके साथ बदसलूकी का मुज़ाहिरा करता है। तो अब ज़ाहिर है, उस घर के बच्चों की न तो अच्छी तर्बियत हो सकती है और न ही उस से मुनसलिक अफ़राद के मुआमलात बेहतर हो सकते हैं।
साथ ही इस नशे की वजह से बंदा अपने रब से भी दूर हो जाता है और बारगाह-ए-रिसालत से भी उसे कोई ताल्लुक नहीं रहता। और लोगों के दिलों में उसकी नफ़रत पैदा हो जाती है। और ये सब काम शैतान के मंशा के मुताबिक़ होता है। चुनांचे, अल्लाह तआला का इरशाद है: तर्जुमा शैतान-तो यही चाहता है कि शराब और जुए के ज़रिए तुम्हारे दरमियान दुश्मनी और बुग्ज़ व कीना डाल दे और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे। तो क्या तुम बाज़ आते हो? दोस्तों देखा आपने अल्लाह कुरआन में फ़रमा रहा है कि शैतान की मर्ज़ी है कि बंदा शराब पिये, ताकि में इस इंसान को अपना आला बना कर अपना काम कर सकूँ यानी जब वह शराब पिएगा तो अपनी ज़बान से हफ़वात बकेगा, गाली-गलोच करेगा, इज़्ज़त व इस्मत पर हाथ डालेगा, इस्लामी शरीअत के तक़द्दुसात को पामाल करेगा फिर जब एक इंसान का अख़लाक़ ऐसा होगा तो लोग उससे मोहब्बत नहीं करेंगे बल्कि उनके दिलों में उसके लिए बुग्ज़ व दुश्मनी पैदा होगी और इसी तरह वह शराब पीने की वजह से अल्लाह के ज़िक्र व नमाज़ व इबादतों से भी दूर रहेगा, अब शैतान का जो मकसद था वह पूरा हो गया उसने इस इंसान को उसके रब से भी दूर कर दिया और बंदों से भी उसका अब एलाक़ा नहीं रहा। अब आगे कुरआन फरमा रहा है: फहल अंतुम मुन्तहून ऐ मेरे बंदो! इतना सब कुछ हो गया तुम्हारे नस्ब-उल-ऐन की अदायगी में अब तक तसाहीली बरतते रहे अब तो तुम बाज़ आजाओ अपने इस गलत फ़ेल व गंदी आदतों से।
ये तो कुरआनी आयतें थीं जिनमें शराब की नहूसत और उसके मंफी असरात का ज़िक्र हुआ अब आइए उन अहादीस का जाइज़ा लेते हैं जिनमें सरकार-ए-दो आलम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने मुनशियात व नशीली अशिया से दूर व नफूर रहने की तल्कीन फरमाई है और उसके सख्त इबरतनाक अंजाम से आगाह फ़रमाया है।
अहादीस में शराबनोशी के भयानक अंजाम का ज़िक्र
नबी करीम अलैहिस्सलाम ने शराब व दीगर मुनशियात को साफ़ लफ़्ज़ों में हराम क़रार दिया और उसके मुरतकिब को लइन व मरदूद बताया और सिर्फ़ पीने वाले को नहीं बल्कि शराब से मुनसलिक दस क़िस्म के अफ़राद को मुस्तहिके लअनत क़रार दिया चनांचे हदीस शरीफ़ में है:
अनस बिन मालिक रज़ी अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दस क़िस्म के लोगों पर शराब की वजह से लअनत फ़रमाई: इसके निचोड़ने वाले पर, निचड़वाने वाले पर, और उस पर जिसके लिए निचोड़ी जाए, उसे ले-जाने वाले पर, और उस शख्स पर जिसके लिए ले जाई जाए, बेचने वाले-पर, और उस पर जो इसे खरीदे, पिलाने वाले-पर और उस पर जिसे पिलाई जाए, यहाँ तक कि दसों को आपने गिन कर इस तरह बताया। (रवाह तिर्मिज़ी)
इस हदीस पाक में नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने गिन गिन कर दस क़िस्म के लोगों को लअनती क़रार दिया जो फेल शराबनोशी में किसी तरह भी शामिल हों।
और एक दूसरी हदीस में वईद का यूँ ज़िक्र है
जिसने शराब पी उसकी चालीस दिन तक नमाज़ कुबूल नहीं होती। फिर अगर वह तौबा करे तो अल्लाह तआला उसकी तौबा कुबूल कर लेता है। फिर अगर वह दुबारा शराब पीए तो उसकी नमाज़ें चालीस दिन तक कुबूल नहीं होतीं। फिर अगर वह तौबा करे तो अल्लाह तआला उसकी तौबा कुबूल करता है, फिर शराब पीए तो उसकी चालीस दिन की नमाज़ें कुबूल नहीं होतीं और वह तौबा करे तो अल्लाह तआला तौबा कुबूल कर लेता है। अगर वह चौथी बार फिर पीए तो उसकी नमाज़ें चालीस दिन तक कुबूल नहीं होतीं, और अगर वह तौबा कर ले तो अल्लाह तआला उसकी-तौबा को कुबूल भी नहीं करता और उसे नहर-ए-ख़याल से सराब करता है, यानी दोज़ख़ियों का पीप उसे पिलाया जाता है। (तिरमिजी, अबू दाऊद, नसाई)
नाअउजू बिल्लाह मिं ज़ालिक।
दोस्तों! देखा आपने किस क़दर संगीन अमल है शराब नोशी और मुंशीयात का इस्तेमाल अल्लाहु अकबर, इस क़दर सख्त तरीन सज़ा कि जो दुनिया में शराब पीएगा उसे जहन्नमियों का पीप पिलाया जाएगा।
यह शराब नोशी उस वक़्त आम थी जब इस्लाम का सूरज तुलू नहीं हुआ था मगर जब हमारे मुस्तफ़ा आफ़ताबे रिसालत व नुबुव्वत बनकर उफक काइनात पर जलवागर हुए और कुरआनी अहकामात का नुज़ूल शुरू हुआ तो कुरआन हकीम ने इस पर पाबंदी लगाई और नबी करीम अलैहिस्सलाम ने आम ऐलान फरमाया कि मुसलमानों के लिए हर नशा आवर शै हराम है, अगर कोई एक क़तरा भी पीएगा तो उसे इसकी सज़ा मिलेगी, तो जिन जिन खुश नसीब अफ़राद तक यह हुक्म पहुंचा उन्होंने अमर इलाही के सामने अपना सरे तसलीम ख़म कर दिया और मुकम्मल तौर पर इस चीज़ से इज्तिनाब करने लगे मगर अहल-ए-अरब चूंकि शराब के दिल दादा थे और उनकी तबीयत में यह चीज़ सरायत कर चुकी थी और यही वजह थी कि जब भी किसी की ज़ियाफत के लिए दस्तरख्वान सजाया जाता तो उस पर शराब लाज़मी थी बगैर शराब के किसी की ज़ियाफत ना मुकम्मल तसव्वुर की जाती थी इस लिए कुछ लोगों को इस पर अमल करने में थोड़ा वक़्त लगा जब कुछ लोग इस हवाले से तज़ब्जुब का शिकार हुए तो हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने इन तमाम बरतनों के इस्तिमाल से भी मना फ़रमाया और एक रिवायत के मुताबिक इन सारे बरतनों को तोड़ने का हुकम दे दिया ताकि न ये बरतन रहें और न ही उन्हें शराब की याद आए। जैसा कि मुसनद इमाम अहमद बिन हम्बल की एक रिवायत है:
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है फरमाते हैं कि नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने मुझे हुक्म दिया कि मैं एक छुरी ले कर आऊं। तो मैं उसे ले कर बारगाह रिसालत में हाज़िर हुआ, फिर आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उसे तेज़ कराने के लिए भेजा, फिर हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने वो छुरी मुझे दी और फरमाया कि कल में उसे ले कर आपकी बारगाह में आऊं चुनाँचे मैंने ऐसा ही किया, फिर हुज़ूर अलैहिस्सलाम अपने सहाबा के साथ शहर के बाज़ारों की तरफ़ निकले तो क्या देखा कि वहाँ शराब की बोतलें थीं जो शाम से लाई गई थीं, हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने मुझसे छुरी ली और अपनी मौजूदगी में जितने बरतन थे सबको काट दिया / चीर दिया।, फिर आप ने मुझे वह छुरी इनायत फरमाई और इसने अपने साथ वालों को हुक्म दिया कि वो लोग मेरे साथ चलें और मेरी मदद करें, और मुझे हुक्म दिया कि तमाम बाज़ारों में जाऊं और जहाँ कहीं भी शराब की बोतलें नज़र आएं मैं किसी को सलामत न छोडूं सबको काट दूं और मैंने ऐसा ही किया पूरे बाज़ार में जहाँ कहीं भी शराब का बरतन नज़र आया मैंने उसे चीर / काट दिया।
दोस्तों साथ ही वह हदीस भी आप की बारगाह में पेश करता हूँ जिनमें सराहत के साथ शराब के बरतनों को तोड़ने का हुक्म दिया गया और सहाबा ने इस पर अमल करते हुए तोड़ दिया चुनाँचे,
अनस बिन मालीक कहते हैं: मैं अबू उबैदा और अबू तलहा को खजूर की शराब पिलाया करता था, अचानक एक आने वाला आया, उसने खबर दी कि शराब अब हराम हो चुकी है। अबू तलहा ने कहा: ऐ अनस उठो और इन मटकों को तोड़ दो। अनस कहते हैं: मैंने एक औज़ार पकड़ा और उसके साथ मटकों के निचले हिस्से पर मारना शुरू किया, यहाँ तक कि सभी मटके टूट गए। (रिवायतः बुखारी 7253, मुस्लिम 1980)
और हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने जिन हदीसों में इन बरतनों के इस्तमाल से मना फ़रमाया, वह ये है:
عن زينب بنت ابی سلمي قالت : نهى رَسُولُ الله صلى الله عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَن الآباء والحَلْمِ وَالنَّقِيرِ وَالْمُرْقَتِ
यह ज़ैनब बिन्त अबी सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा हैं, उन्होंने बयान किया कि नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने दुब्बा, हनतम, नकीर और मुज़फ्फत के इस्तमाल से मना फ़रमाया था। दुब्बा कद्दू के बने हुए बरतन, हनतम हरे रंग के मिट्टी के बरतन, नकीर लकड़ी के खोदे हुए बरतन और मुज़फ्फत तेल से लिपे हुए बरतन थे। ये चारों शराब के बरतन थे जिनमें अरब शराब बनाया करते थे। जब शराब की मुमनिअत हुई, तो इन बरतनों के इस्तमाल से भी लोगों को रोक दिया गया। (सहीह अल-बुखारी)
दोस्तों! आपने ऊपर लिखी हदीसों और आयतों में देखा कि शराब और नशीली चीज़ें, जो सकर और फितन का वजह हैं, उनका इस्तेमाल कितना संगीन है। आज अगर हमारे नौजवान इस बुरी लत के शिकार हैं, तो कहीं न कहीं उनकी दीनी और इल्मी कमज़ोरी है, क्योंकि जब कोई मुसलमान नौजवान इस्लामी तालीमात का पेरोकार होता है और फरमूदात-ए-नबवी का जानकार होता है, तो वह शराब पीना तो दूर, शराब के करीब भी नहीं जाता है, क्योंकि वह जानता है कि शराब का एक-एक क़तरा पेशाब की तरह गंदा और नापाक है।
दोस्तों! आज के इस भयानक दौर में, जब हर तरफ से मुसलमान दुश्मन ताकतें हम पर हमलावर हैं और नए-नए तरीकों से मुसलमान समाज को नापाक करने की साज़िशें की जा रही हैं, खासकर मुसलमान नौजवानों को मुखर्रिब-ए-अख़लाक़ चीज़ों का आदी बनाकर उनकी सोच और उनके इनक़लाबी ख्यालात को दबाने की कोशिश की जा रही है, तो ऐसे मुश्किल हालात में हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? हमारी ज़िम्मेदारियां उस वक्त और बढ़ जाती हैं, जब कोई भी फितना हमारे घर में दाखिल होने लगे, और आज यही हो रहा है कि नशे का फितना हमारे घरों तक बड़ी तेज़ी से पहुंच रहा है और मुसलमान नौजवान बड़ी तेज़ी से इसके शिकार हो रहे हैं।
उम्मुल खबाइस
वह शराब, जिसे मेरे पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उम्मुल ख़बाइस (बुराईयों की मां) कहकर इसके करीब जाने से भी मना किया, अब अगर मुसलमान कौम के नौजवान ही शराब को अपनी आदत बना लें, तो फिर इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है।
शराब व नशीली अशिया के इस्तेमाल के असबाब
अब ज़रा हम इन असबाब के ऊपर तायाराना नज़र डालें जिनकी वजह से हमारी कौम के अफराद अपनी दुनिया और आख़िरत खराब कर रहे हैं, तो इसके बहुत से असबाब हो सकते हैं, मगर चंद वजूहात व इलल को आप के सामने पेश करता हूँ।
(1) शराब जैसी मनहूस व मुखर्रिब अख़लाक़ शै को गले लगाने का जो सबसे अहम सबब है वह है दीन से दूरी और वालिदेन का अपने बच्चों की तर्बीयत के हवाले से गैर हस्सास होना। क्यों कि बच्चों को अगर कुरानी तालीमात व अहादीस-ए-नबविया के फरमुदात के ज़ेवर से आरास्ता कर दिया जाएगा, तो यकीनन उनके क़दम राह-ए-रास्त से भटकेंगे नहीं, बल्कि वह सिरात-ए-मुस्तकीम का मुसाफिर बनकर तरक़्क़ी के मनाज़िल तय करता नज़र आएगा।
(2) अंजाम से गाफिल होना नशे की आदत में पड़ने का एक सबब इसके भयानक अंजाम से ग़फलत और दीनी, दुनियवी और तिब्बी नुक्सानात से बेखबरी भी है। ज़ाहिर है कि जब किसी चीज़ के नुक्सानात का इल्म न हो तो इंसान उससे बचने की कोशिश क्यों करेगा। इन शराब पीने वालों और नशीली अशिया के इस्तेमाल करने वालों को इस बात का इल्म ही नहीं है कि आख़िरत में इसके भयानक अंजाम हैं और कितनी बड़ी ज़िल्लत व रुसवाई का सामना करना होगा। अगर इन बच्चों को इनसे आगाह कर दिया जाए और इसके मुताल्लिक़ वारिद शुदा वईदात सुनाई जाए, तो उम्मीद है उनके भटके हुए क़दम राह-ए-रास्त पर आ जाएंगे।
(3) तफरीह के तौर पर नशा करनाः नशे का आगाज़ तफरीहन भी किया जाता है। शुरू-शुरू में इंसान किसी की देखा-देखी मौज-मस्ती के लिए थोड़ा-बहुत नशा करता है, मगर कुछ ही अर्से बाद उसका जिस्म नशे की कम मिक़दार पर तस्कीन नहीं पाता। लिहाजा वह मजबूरन नशे की मिक़दार को बढ़ा देता है और बिला आखिर नशे बाज़ तबाही के दहाने पर जा खड़ा होता है।
(4) बुरी सोहबत व संगत मुनशियात के आदियों की बड़ी तादाद बुरी सोहबत की वजह से नशे में मुब्तिला होती है। जिन लोगों के साथ उसका उठना-बैठना होता है, वह ऐसे आवारा किस्म के लोग होते हैं जिनकी आदत होती है मुनशियात का इस्तेमाल। इसलिए उनकी मईयत में जब कोई शरीफ-उन-नफ्स व अच्छे घराने का बच्चा भी वक्त गुज़ारने लगता है, तो इब्तिदा में तो उसे नशा मुफ़्त फराहम किया जाता है कि आज़मा कर तो देखो, गम दूर हो जाएंगे, दुख-दर्द भूल जाओगे, हवाओं में उड़ने लगोगे वगैरह-वगैरह। उनकी बातों में आकर जब एक मर्तबा नशा-आवर चीज़ इस्तेमाल कर लेता है, तो नशे के जाल में ऐसा फंसता है कि बाअज़ औक़ात मरते दम तक रिहाई नसीब नहीं होती।
इसी वजह से शरीअत-ए-इस्लामिया ने वालिदैन के ऊपर यह ज़िम्मेदारी भी आइद की है कि वह बच्चों के नशिस्त व बर्खास्त पर भी नज़र रखें और देखें कि वह किसके साथ वक्त गुज़ारता है और कैसे आदात व अतवार के लोग उसके दोस्तों में शामिल हैं। अगर शुरू से ही इस बंद को बांध दिया जाए, तो उस बच्चे का मुस्तकबिल खराब होने से महफूज़ हो जाएगा।
(5) कसरत-ए-मालः एक ऐसा शख्स जो कसरत-ए-माल की वजह से फारिग-उल-बाल हो, उसके पास माल की फरावानी हो, दौलत की रेल-पेल हो और उसे खाने-पीने की बेफिक्री हो, हर तरह की आसाइश उसे हासिल हो, करने के लिए कोई काम न हो, तो वह फिर अपने माल को आग लगाने के लिए कभी सिगरेट नोशी करता है और फिर उससे आगे बढ़कर शराब व दीगर मंशीयात का आदी होकर अपनी ज़िंदगी को तबाही के दहाने पर ले जाता है। फिर धीरे-धीरे बतौर फैशन नशे को शुरू करने वाला ऐसा शख्स न सिर्फ अपनी सेहत (Health) को बर्बाद करता है बल्कि घर-बार और कारोबार से भी तवज्जो हटा लेता है।
अपने जवानों को नशे के दलदल से कैसे निकालें?
यह चंद वजूहात थीं जिनकी बुनियाद पर हमारे बच्चे गलत सिम्त में चल पड़ते हैं और उनकी दुनिया व आखिरत तबाह हो जाती है। अब ज़रा अपनी तवज्जो इस अम्न की तरफ भी मब्जूल करें कि आखिर इसका इलाज क्या है? कैसे हम अपने बच्चों को इस दलदल से बाहर निकालें और उनकी ज़िन्दगी खुशगवार हो? तो इस बारे में समाज के बा-असर व ज़िम्मेदारान हज़रात बाहमी इत्तेफाक से कोई लाईहा-ए-अमल तैयार करें और अपने-अपने तौर पर इसको लागू करने की कोशिश भी की जाए। जो बच्चे इसके आदी हो गए हैं, उन्हें बुलाया जाए और उन्हें बिठाकर निहायत ही प्यार व मोहब्बत से मंशीयात के नुक्सानात व अंजाम-ए-बद के मुताल्लिक जानकारी दें। ऐसा नहीं जैसा हमारा मिज़ाज बन गया है कि जो लड़का शराब का आदी हो गया, उसको बायकॉट कर दिया जाए, उससे कोई बात न करे, उसको उसके हाल पर छोड़ दिया जाए वगैरह वगैरह। और हमारे एक बुज़ुर्ग ने बड़ी प्यारी बात कही फरमाते हैं, अगर तुम्हारा पैसा गटर यानी गंदी नाली में गिर जाए तो उसे निकाल लो और अपना हाथ धो लो, इसका फायदा यह होगा कि वह ज़ाया होने से बच जाएगा और तुम्हारी किसी ज़रूरत में काम आ जाएगा। ठीक उसी तरह जब हमारा कोई जवान किसी बुरी लत का शिकार हो गया तो वैसे ही उसको ज़िल्लत आमेज़ ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ न दिया जाए, बल्कि उसको वहां से निकालने की हद-ए-मक़दूर सई करनी चाहिए, क्यों कि अगर वह इस दलदल से निकल गया तो किसी के काम आए न आए, अपने घर वालों के काम ज़रूर आएगा।
इसलिए होना तो यह चाहिए कि हम उसको तलब करें और उसके भयानक अंजाम व नताइज से उसको आगाह करें, क्यों कि नफरत तो गुनाह से करनी है, गुनाहगार से नहीं। और यहीं नबवी व कुरआनी असलूब-ए-दावत है। अगर हर इलाके और गांव के चंद अफराद इस पर अमल दरआमद शुरू कर दें तो यक़ीनन इखलास में बड़ी ताकत है। इसके मुसबत नताइज आने शुरू हो जाएंगे और रफ्ता-रफ्ता समाज से शराब व नशे की लानत खत्म होती चली जाएगी।
और अब तो जगह-जगह मुनशियात के इनसिदाद के सेंटर्स व मराकिज़ भी कायम हो गए हैं, दवाइयां दी जाती है, इलाज होता है बाज़ाब्ता। इस लिए वालिदैन की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने बच्चों को समझाएं और उन्हें इस लानत से दूर करने की हर मुमकिन कोशिश करें, ताकि अल्लाह जल व अला उसके दिल में शराब व नशीली अशिया की नफरत डाल दे और वह इस मनहूस अमल से खुद को बचा सके।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त सबको इस्लामी तालीमात पर अमल की तौफीक मरहमत फरमाए।
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