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Quran aur hadees ki roshni mein halal रिज़्क़ की फजीलत और हराम की मज़म्मत


रिज़्क़ ए हलाल की अहमियत व फ़ज़ीलत 

इस्लाम एक मुकम्मल ज़िन्दगी गुज़ारने का तरीका है जिसमें हर पहलू के लिए रहनुमाई मौजूद है। इसी तरह रिज़्क़ ए हलाल की तलाश और रिज़्क़ ए हलाल खाना, इस्लाम की बुनियादी तालीमात में शामिल है कुरान ए मजीद और अहादीस ए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में हलाल और पाकीज़ा रिज़्क़ हासिल करने की बार-बार ताकीद की गई है। यह न सिर्फ हमारी दुनिया बल्कि आख़िरत की कामयाबी के लिए भी बे हद अहम है। जब एक इंसान हलाल कमाई को अपनाता है, तो उसकी इबादतें मक़बूल होती हैं, दुआएं कुबूल होती हैं। इस तहरीर में हम रिज़्क़ ए हलाल की अहमियत और उसकी फज़ीलत पर रौशनी डालेंगे। 
अगर आप कुरान-ए-अज़ीम और अहादीस-ए-मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का मुतालेआ करेंगे तो आप यह 
ए'तिराफ़ करेंगे और महसूस करेंगे के अल्लाह तआला ने अपने बन्दों को जा-ब-जा रिज़्क-ए-हलाल की ताक़ीद फ़रमाई है, और पैग़म्बर-ए-आज़म अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने कसीर मक़ामात पर रिज़्क-ए-हलाल के फज़ाइल-ओ-अहमियत वाज़ेह 
अंदाज़ में बयान फ़रमाया है। 

कुरान ए पाक में हलाल रिज़्क़ की ताकीद

चुनाँचे अल्लाह तआला कुरान-ए-मुक़द्दस के अंदर रिज़्क-ए-हलाल का हुक्म देते हुए इरशाद फ़रमाता है: 
तर्जमाः अल्लाह का दिया हुआ हलाल पाकीज़ा रिज़्क खाओ और अल्लाह की ने' मत का शुक्र अदा करो अगर तुम उसकी इबादत करते हो।) (कन्जुल ईमान) 

हराम से बचने की तालीम 

और सूरह-ए-माइदा में अल्लाह तबारक व तआला फ़रमाता है: 
तर्जमाः और जो कुछ तुम्हें अल्लाह ने हलाल पाकीज़ा रिज़्क दिया है उस में से खाओ, और उस अल्लाह से, डरो जिस पर तुम ईमान रखने वाले हो।) (कन्जुल ईमान) 
इस आयत-ए-करीमा के तहत अल्लाह तआला उम्मत-ए-मुस्लिमा को हलाल और पाकीज़ा रिज़्क खाने और हराम से दूर रहकर अल्लाह तआला से डरने का हुक्म दे रहा है क्योंकि ईमान बिल्लाह और ईमान बिर्रसूल के बाद रिज़्क-ए-हलाल की बड़ी अहमियत है कि एक मुसलमान का कोई भी अमल उस वक़्त तक बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में क़बूल नहीं होता जब तक उसका खाना और पीना हलाल और पाकीज़ा न हो। इस लिए एक मुसलमान के लिए ज़िंदगी को ख़ुशगवार और पाकीज़ा बनाने की ख़ातिर ज़रूरी है कि वह अव्वलन हलाल और पाकीज़ा ज़रिया-ए-मआश को इख़्तियार करे। सानियन उन्हीं चीज़ों को अपनी ग़िज़ा बनाएँ, जो ख़ुद हलाल और तय्यिब-ओ-ताहिर हों। नीज़ पाकीज़ा व जाएज़ तरीक़े से हासिल हों। 

हलाल रिज़्क़ और दुआ की मक़बूलियत

दोस्तों! पैग़म्बर-ए-आज़म, मुअल्लिम-ए-काइनात, मुहसिन-ए-इंसानियत जनाब अहमद मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत को रिज़्क-ए-हलाल की अहमियत और फज़ीलत बताते हुए इरशाद फ़रमाते हैं: 
तर्जमाः बे-शक अल्लाह तबारक व तआला पाक है और वह पाक चीज़ ही क़बूल फ़रमाता है। अल्लाह ने उस चीज़ का मोमिनीन को हुक्म दिया जिस का हुक्म अपने रसूलों को दिया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "ऐ रसूलों पाकीज़ा और साफ़ सुथरी चीजें खाओ और नेक अमल करो बेशक मैं तुम्हारे अमल को जानता हूँ।" और फ़रमायाः "ऐ ईमान वालों उन पाकीज़ा और हलाल चीज़ों को खाओ जो उसने तुम्हें दिया।" फिर अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उस शख़्स का ज़िक्र किया जो एक तवील सफ़र करता है यहाँ तक कि उसका सर परागंदा और जिस्म गुबार आलूद हो जाता है और, अपने हाथों को, आसमान की तरफ़ उठा कर दुआ करता है ऐ मेरे रब! ऐ मेरे रब ! और हाल उस का यह है कि उस का खाना हराम, पीना हराम, उस का लिबास हराम और हराम ही से उस की परवरिश हुई है तो भला कैसे उस हालत में उस की दुआ क़बूल हो सकती है।) (मुस्लिम शरीफ़ जिल्द 336) 
दोस्तों! आप इस हदीस-ए-पाक का मुतालेआ फ़रमाएँ और देखें कि किस अंदाज़ में मुअल्लिम-ए-काइनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को रिज़्क-ए-हलाल और अमल-ए-सालेह की तरगीब दे रहे हैं और यह बता रहे हैं कि रिज़्क-ए-हलाल की क्या क़द्र-ओ-अहमियत है? रसूल-ए-अरबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हलाल और पाकीज़ा रिज़्क की अहमियत और अज़मत-ओ-फज़ीलत उस मुसाफ़िर से मिसाल दे कर वाजेह फ़रमा रहे हैं जो एक लम्बी मसाफ़त तय करता है और उस की वजह से उस का हाल यह हो जाता है के बाल भी परागंदा है, जिस्म भी गुबार-आलूद है और इन्तिहाई इन्किसारी व आज्ज़ी के आलम में अपने दोनों हाथों को आसमान की जानिब बुलंद करता है और रब-ए-क़दीर की बारगाह में दुआ करता है, फ़रियाद करता है कि मौला! तू ही मेरा ख़ालिक़ व मालिक है तेरी ही वह ज़ात है जो अपने बन्दों की हाजत-रवाई फ़रमाता है। तेरा वअदा है 'कि जब पुकारने वाला मुझे पुकारता है, दुआ करने वाला दुआ करता है, फ़रियाद करने वाला फ़रियाद करता है तो उस की पुकार को सुनता हूँ, उस की दुआ को क़बूल करता हूँ, उस की फ़रियाद-रसी करता हूँ और उस की हाजत-रवाई करता हूँ। आज तेरा यह बन्दा इन्तिहाई मजबूरी के आलम में है और तेरे हुजूर अपनी हाजत-रवाई का सवाल करता है। मौला! मेरी हाजत-रवाई फ़रमा, लेकिन उस मुसाफ़िर का हाल यह है कि उसने जो खाया, पिया है और जो लिबास अपने जिस्म में ज़ेब-ए-तन किया हुआ है वह सब हराम हैं या हराम तरीके से हासिल हुए हैं, तो इन हराम चीज़ों की वजह से उस इन्किसारी व आज्ज़ी और ख़ुलूस के साथ दुआ करने और खुद उस मुसाफ़िर के अंदर दुआ की मक़्बूलियत की सारी सिफ़ात मौजूद होने के बावजूद उस की दुआ बारगाह-ए-इलाही में क़बूल नहीं होती बल्कि रद्द कर दी जाती है। 
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने इरशाद फ़रमायाः (तिन दुआएँ बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में मक़बूल हैं: मज़लूम की दुआ, मुसाफ़िर की दुआ,और वालिद का अपने लड़के के लिए।)आप इस मुसाफ़िर को देखें कि उस के अंदर दुआ की मक़्बूलियत की सारी सिफ़ात मौजूद हैं वह मुसाफ़िर भी है, दुआ में इन्किसारी और आज्ज़ी बदरजा-ए-अतम बजा ला रहा है कि सर भी परागंदा है,जिस्म भी गुबार-आलूद है और वह अपने हाथों को आसमान की जानिब बुलंद करते हुए दुआ भी कर रहा है फिर भी उस की दुआ बारगाह-ए-इलाही में मुस्तजाब नहीं हो रही है,मक़्क़बूल नहीं हो रही है और उस की वजह अल्लाह के नबी अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फ़रमायाः "कि उस का खाना भी हराम है उस का पीना भी हराम है और उस का लिबास भी हराम है और हराम ग़िज़ा से उस की परवरिश भी हुई है यानी उसने हराम को अपनी ग़िज़ा में शामिल कर लिया है"। अल्लाहु अक्बर!उस मुसाफ़िर की दुआ का उस हाल में रद्द हो जाना कोई मामूली नहीं है। दुआ तो मोमिन का एक अज़ीम हथियार है, दुआ दिल की जन्नत है,रूह की उन्सियत है, बन्दा और उस के रब के दरमियान वास्ता है,दुआ के ज़रिए रहमत-ए-इलाही हासिल होती है,और ज़ालिम के जुल्म से बचने का एक अज़ीम हथियार है,यही वजह है कि सरवर-ए-काइनात अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने दुआ को इबादत का मग़ज़ करार दिया है। 

हलाल और हराम का फर्क 

मुस्लिम शरीफ़ की एक और हदीस है जिसे नो'मान बिन बशीर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु रिवायत करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम से फ़रमाते हुए सुनाः 
(बे-शक हलाल भी वाज़ेह है और हराम भी वाज़ेह है और इन दोनों के दरमियान कुछ मुश्तबह चीजें हैं। पस जो मुश्तबिहात चीज़ों से बचा उसने अपने दीन और अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त की।) 

मुसलमानों के लिए हिदायत 

आप क़ाराईन इस हदीस पाक का मुताला फरमाएं और देखें कि अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलामउम्मत-ए-मुस्लिमा को तीन चीज़ों की तालीम दे रहे हैं:। 
1. हराम से बचने की, 
2. हलाल को अपनाने की, 
3. और मुश्तबह (शक वाले) चीज़ों से भी दूर रहने की। 
रसूलुल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम हमें यह तालीम दे रहे हैं कि हलाल खाना और हलाल कमाई को अपनी ज़िंदगी का मकसद बनाओ। जो चीजें वाज़ेह तौर पर हराम हैं, उनसे दूर रहो और जो चीजें शक में डालने वाली हैं,उनसे भी बचो। रिज़्क़ ए हलाल एक मुसलमान की ज़िन्दगी का अहम जुज़ है जिससे न सिर्फ उसके आमाल पाक-साफ़ होते हैं, बल्कि उसकी दुआएं भी कुबूल होती हैं। इस्लाम हमें हुक्म देता है कि हम सिर्फ हलाल और पाकीज़ा कमाई को अपनाएं और हराम से बचें। हलाल रिज़्क़ से इंसान के दिल को सुकून नसीब होता है,घर में बरकत आती है और समाज में नेक और पाकीज़ा रवैया पैदा होता है। लिहाज़ा,हमें चाहिए कि हम हर हाल में हलाल कमाई को अपनाएं और इसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ, हराम और मुशतबह चीज़ों से बचें ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सकें।
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