शफ़ाअत-ए-औलिया अल्लाह-वालों की शफ़ाअत का तज़्किरा
इस तहरीर में औलिया अल्लाह (अल्लाह के नेक बंदों) की शफाअत का तज़्किरा किया गया है, जो क़यामत के रोज़ अहले-दोज़ख़ के लिए रहमत और निजात का ज़रिया बनेगी। अहादीस-ए-मुबारका से यह साबित है कि किस तरह औलिया-ए-किराम अपने रुहानी मक़ाम और अल्लाह की बारगाह में अपनी मक़बूलियत के बाइस गुनहगारों की शफाअत करेंगे और उन्हें जहन्नम से निजात दिलाएंगे।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुबारक तालीमात इस बात की दलील है कि नेक बंदों की मुहब्बत और ख़िदमत सिर्फ़ दुनिया में ही नहीं, बल्कि आख़िरत में भी फ़ायदा देगी। इस तहरीर में मिश्कात शरीफ़ और सुन्नन नसाई शरीफ़ की अहादीस की रोशनी में शफ़ाअत-ए-औलिया की हक़ीक़त, उनकी अहमियत और उन ख़ुश-नसीब गुनहगारों का तज़्किरा किया गया है, जो अपनी थोड़ी-सी नेकी के सबब औलिया-ए-किराम की शफाअत से सरफ़राज़ होंगे जन्नत में दाखिल होंगे।
शफ़ाअत-ए-औलिया (औलिया ए किराम की शफ़ाअत)
हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमायाः क़यामत के रोज़ हिसाब-किताब के बाद जब अहले जन्नत जन्नत की जानिब रवाना होंगे, तो अहले-दोज़ख़ एक तरफ़ सफ़ बांधे हुए खड़े होकर उनको देख रहे होंगे। जब उनके क़रीब से कोई नेक बंदा (वली) गुज़रेगा, तो अहले-दोज़ख उसे पहचान कर अर्ज़ करेगा।
क्या आपने मुझे पहचाना नहीं? मैंने दुनिया में एक मर्तबा आपको पानी पिलाया था! इसी तरह, उनमें से कोई दूसरा किसी और जन्नती को देखकर अर्ज़ करेगा। क्या आपने मुझे पहचाना नहीं? मैंने एक मर्तबा आपको वुज़ू करवाया था ! इस तरह और भी बहुत से अहले-दोज़ख अल्लाह के नेक बंदों से अर्ज़ करेंगे। فَيَشْفَعْ لَهُ فَيُدْخِلُهُ الْجَنَّةَ
(मिश्कात शरीफ)
यानी, वो नेक लोग इन गुनहगारों की शफ़ाअत करेंगे, जिससे उनकी मग़फ़िरत हो जाएगी और उन्हें जन्नत में दाखिल कर दिया जाएगा।
नेक बंदों की शफाअत
हज़रत सय्यिदुना अबू सईद अल-खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) रिवायत फ़रमाते हैं कि रसूल करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया।
तुम्हारे किसी शख्स का झगड़ा दुनिया में इससे ज़्यादा नहीं जो वह अपने परवरदिगार अर्हमुर्राहिमीन (जल्ल जलालुहु) से अपने किसी मुसलमान गुनहगार भाई के लिए करेगा, जो दोज़ख़ में जाएंगे।
ये नेक बंदे अल्लाह ग़फ़रुर्रहीम से अर्ज़ करेंगे:
ऐ अल्लाह ! तूने हमारे भाइयों को, जो हमारे साथ नमाज़ पढ़ते थे, रोज़े रखते थे और हज करते थे, जहन्नम में डाल दिया!
अल्लाह (जल्ल जलालुहु) इरशाद फ़रमाएगाः
अच्छा, तुम जाओ और जिन्हें पहचानते हो, उन्हें दोज़ख से निकाल लो !
फिर वो वहां जाकर अहले-दोज़ख़ की शक्लें देखकर पहचानेंगे और उन्हें निकालेंगे। उनमें से कुछ को आग ने पिंडलियों तक जकड़ा होगा और कुछ को टखनों तक।
फिर नेक लोग अर्ज़ करेंगे
ऐ अल्लाह ! जिनका, तूने हमें हुक्म दिया था, उन्हें हमने निकाल लिया।
अल्लाह इरशाद फ़रमाएगा:
अब उन्हें भी निकालो जिनके दिल में 1 दीनार के बराबर ईमान है!
फिर हुक्म होगाः
अब उन्हें भी निकालो जिनमें निस्फ दीनार के बराबर ईमान है!
फिर हुक्म होगाः
अब उन्हें भी निकालो जिनके दिल में रत्ती बराबर भी ईमान है!
हज़रत अबू सईद अल-खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं कि अब जो शख़्स यक़ीन न करे, वो ये आयत तिलावत कर ले, आखिर तकः
إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ
तर्जमाः बेशक अल्लाह शिर्क को माफ़ नहीं करेगा, और जिसे चाहेगा माफ़ कर देगा।
(सुनन नसाई शरीफ)
दोस्तोंः शफ़ाअत-ए-औलिया का तसव्वुर इस्लाम की रहमत-ओ-मग़फ़िरत से भरपूर तालीमात का अहम हिस्सा है।
औलिया-ए-किराम की शफाअत क़यामत के रोज़ उन गुनहगार बंदों के लिए निजात का ज़रिया बनेगी, जिनके दिलों में ईमान की हल्की-सी रौशनी मौजूद होगी। ये अहादीस इस हक़ीक़त को वाज़ेह करती हैं कि अल्लाह के नेक बंदों की मोहब्बत और उनसे तअल्लुक़ सिर्फ़ दुनिया में ही नहीं, बल्कि आख़िरत में भी फ़ायदा देगा।
दोस्तों हमें चाहिए के हम नेक बंदों की मुहब्बत और उनकी खिदमत को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं, ताकि हमारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में रहमत और निजात का सबब बन सके।
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