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joota pahankar khana khana kaisa janiye हदीस की रौशनी में

जूता पहन कर खाने का हुक्म 

इस्लाम ने ज़िंदगी के हर पहलू में रहनुमाई फ़राहम की है, यहाँ तक कि खाने-पीने के छोटे-छोटे आदाब भी सुन्नत-ए-नबवी की रोशनी में मुतअय्यन किए हैं। आज के दौर में जहाँ मग़रिबी तहज़ीब की नक़ाली और बे-राह-रवी आम हो रही है। जहाँ सुन्नत के मुताबिक़ खाने-पीने के तरीके न सिर्फ़ सेहत के लिए मुफीद हैं, बल्कि रूहानी बरकत का ज़रिया भी हैं। ज़ेर-ए-नज़र मज़मून में हदीस-ए-मुबारका, फ़िक़्ही अहकाम और उलेमा के अक़्वाल की रोशनी में खाने-पीने के आदाब को तफ़सील से पेश किया गया है। 

जूता पहन कर खाने की मुमानिअत 

हज़रत अनस बिन मालिक रदी अल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला-अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः 'जब खाना खाने बैठो तो जूते उतार लो, क्योंकि इसमें तुम्हारे पैरों के लिए ज़्यादा राहत है और यह अच्छी सुन्नत है। सरकार आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा कुद्दस सिर्रहु इस हदीस के तहत फ़रमाते हैं जूता पहने खाना अगर इस उज़्र से हो कि ज़मीन पर बैठा खा रहा है और फ़र्श नहीं, तो सिर्फ एक सुन्नत-ए-मुस्तहिबा का तर्क है। इसके लिए बेहतर यही था कि जूता उतारे। और अगर मेज़ पर खाता है और यह कुर्सी पर जूता पहने है तो यह वज़ा-ए-ख़ास नसारा की है। इससे दूर भागे और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का वह इरशाद याद करे (जो किसी क़ौम से मुशाबहत पैदा करे, वह उन्हीं में से है) । (फ़तावा अफ्रीका) 
मगर आज तो हाल इतना ख़राब है कि शादी-ब्याह वगैरा दूसरी तकारीब में खड़े-खड़े और चलते-फिरते खाने-पीने का चलन आम होता जा रहा है। न शरीअत का लिहाज़, और न ख़ुदा और रसूल का ख़ौफ़। 
अल्लाह हिदायत अता फरमाए, आमीन। 

ज़मीन पर खाने की सुन्नत 

हज़रत हसन बसरी रज़ी अल्लाह तआला अन्हु से मुरसलन रिवायत है के हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के लिए जब खाना हाज़िर किया जाता तो ज़मीन पर रखकर तनावुल फ़रमाते। हज़रत अबू हुरेरा रदी अल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं के हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम खाने को फर्श पर रखते और फ़रमाते मैं इताअत शिआर बंदों की तरह खाता-पीता हूँ। 

तख़्त पर टेक लगाकर खाना 

हज़रत साइब बिन यज़ीद रदीअल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं के मैंने हुजूर नबी करीम हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम को तख़्त पर टेक लगाए 'सरीद' तनावुल फ़रमाते देखा, फिर कोज़ा से पानी नोश फ़रमाया। 

बरकत के हुसूल के लिए उँगलियाँ और बर्तन चाटना 

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रदीअल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं के हुज़ूर नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उँगलियाँ और प्लेट चाटने का हुक्म फ़रमाया और साथ ही इरशाद फ़रमाया तुम्हें क्या मालूम कि खाने के किस हिस्से में बरकत है।हज़रत अनस रदी अल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं के हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने हमें खाना खाकर प्याला खूब साफ़ करने का हुक्म फ़रमाया और फ़रमाया तुम क्या जानो कि तुम्हारे किस क़िस्म के खाने में बरकत है। 
दोसतों: इस्लाम ने खाने-पीने के जो अदब बताए हैं, वे न सिर्फ़ हमारी ज़िंदगी में बरकत और सुकून लाते हैं बल्कि हमारी सेहत और अख़लाक़ का भी हिस्सा बनते हैं। खाना खाते वक्त जूते उतार देना पैरों के लिए राहत का सबब बनता है और यह एक खूबसूरत सुन्नत भी है। इसी तरह, ज़मीन पर बैठकर इत्मीनान से खाना, खाने के बाद उंगलियाँ और बर्तन साफ़ करने, और नबी-ए-करीम हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के बताए हुए तरीक़ों को अपनाने में बड़ी हिकमत और भलाई है।

गैर इस्लामी तहज़ीब

मौजूदा दौर में खाने-पीने के नाम-निहाद 'जदीद तरीके' न सिर्फ़ सुन्नत से दूरी का सबब बन रहे हैं, बल्कि गैर-इस्लामी तहज़ीब की मुशाबहत को भी फ़रोग दे रहे हैं। शादी-ब्याह की तक़ारीब में खड़े हो कर या चलते-फिरते खाने का रिवाज़, मेज़ कुर्सी पर जूते पहन कर बैठना, और बर्तनों को अधूरा छोड़ देना ये सब सुन्नत के ख़िलाफ़ और बरकत से महरूमी के असबाब हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हम नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत और सुन्नत के मुताबिक़ अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ढालें और गैरों की मुशाबहत से बचें। 
दुआ: ऐ अल्लाह! हमें सुन्नत-ए-नबवी अलैहिस्सलातु वस्सलाम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमा, और हर गैर-इस्लामी रस्म-ओ-रिवाज से हमारी हिफ़ाज़त फरमा। आमीन!

एक और हदीस 

आइए, हुजूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत और उसके फ़ज़ाइल से जुड़ी एक और हदीस को पढ़ें, जो हमारे दिलों को रौशन कर देगी और हमारा ईमान भी मज़बूत होगा। 

हुजूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत ही अस्ल ईमान है 

मरवी है कि रसूल-ए-अकरम नूर-ए-मुजस्सम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में किसी ने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, मैं सच्चा पक्का मोमिन कब बनूँगा? हुज़ूर-ए-अकरम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया: तू जब अल्लाह तआला से मुहब्बत करेगा। उसने अर्ज़ किया: मेरे आक़ा! मेरी मुहब्बत अल्लाह तआला से कब होगी? फरमाया: जब तू उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत करेगा। फिर अर्ज़ किया: अल्लाह तआला के हबीब से मेरी मुहब्बत कब होगी? फरमाया: जब तू उनके तरीक़े पर चलेगा और उनकी सुन्नत की पैरवी करेगा और उनसे मुहब्बत करने वालों के साथ मुहब्बत करेगा और उनसे बुग्ज़ रखने वालों के साथ बुग्ज़ रखेगा और किसी से मुहब्बत करे तो उनकी वजह से करे और अगर किसी से अदावत रखे तो उनकी वजह से रखे। फिर फरमाया: लोगों का ईमान एक जैसा नहीं, बल्कि जिसके दिल में मेरी मुहब्बत जितनी ज़्यादा हुई, उतना ही उसका ईमान क़वी होगा। यूँ ही लोगों का कुफ़ एक जैसा नहीं, बल्कि जिसके दिल में मेरे मुतअल्लिक़ ग़ज़ब जितना ज़्यादा होगा, उसका कुफ़ भी उतना ही बड़ा होगा। फिर फरमाया: ख़बरदार! जिसके दिल में मेरी मुहब्बत नहीं, उसका ईमान नहीं। ख़बरदार ! जिसके दिल में मेरी मुहब्बत नहीं, उसका ईमान नहीं। ख़बरदार ! जिसके दिल में मेरी मुहब्बत नहीं, उसका ईमान ही नहीं। (दलाइलुल-खैरात) 

मेरे मुसलमान भाइयों 

महबूब-ए-किब्रिया सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत दोज़ख़ से बचने का ज़रिया है। जैसा कि हज़रत शाह गुलाम अली दहलवी क़ुद्स सिर्रुहु फरमाते हैं: एक दफ़ा दोज़ख़ का ख़ौफ़ मुझ पर ग़ालिब हुआ। मैं आलम-ए-बाला में सरकार-ए-दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ियारत से मुशर्रफ़ हुआ। हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया: जो हम से मुहब्बत रखता है, वह दोज़ख़ में न जाएगा। (तज़किरा-ए-मशाइख-ए-नक्शबंदिया) दोस्तों: हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम का हर हुक्म, हर सुन्नत, और हर नसीहत पर अमल करना हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत की निशानी है। आओ, हम उनके तरीके को अपनाएँ, उनकी सीरत पर चलें, और उनकी मुहब्बत को अपने दिलों में बसाएँ ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल हो।
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