बेटी अल्लाह की रहमत है
आज के दौर में इस्लामिक तालीम और तरबियत की अहमियत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। ख़ुसूसन बड़ी-बड़ी हाउसिंग सोसायटीज़ में इस्लामिक स्कूल्स के नाम पर बनाए गए इदारों में बद-मज़हब सोच को फैलाने की साज़िशें की जा रही हैं, जो हमारी आने वाली नस्ल के लिए संगीन ख़तरात का सबब बन रही हैं। ऐसे हालात में हमें अपने बच्चों, ख़ुसूसन बेटियों की दुरुस्त तालीम और इस्लामी माहौल की फ़राहमी को यक़ीनी बनाना होगा।
क़ब्ल अज़ इस्लाम
इस्लाम से क़ब्ल अगर दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुआशरों में औरत की हैसियत देखी जाए तो मालूम होगा के औरतें मर्दों की महक़ूम थीं। मर्द ख़्वाह बाप होता या शोहर, बेटा होता या भाई, उन से जैसा चाहता सुलूक रवा रखता। औरतों की हैसियत कुछ भी न थी। उन के साथ जानवरों से भी बदतर सुलूक होता। कहीं विरासत में हिस्सा न था। कहीं औरत को शोहर की वफ़ात के बाद ज़िंदा जला दिया जाता, कहीं औरत को ज़िंदा दफ़्न कर दिया जाता। बसा औक़ात जब किसी शख़्स को ये मालूम होता के उस के हाँ बेटी पैदा हुई है तो वो कई कई रोज़ ज़िल्लत समझते हुए घर से न निकलता के उस की बदनामी होगी। वो सोचता रहता था के आख़िर क्या करे, दफ़्न करे या रूसवाई बर्दाश्त करे, जैसा के क़ुरआन शरीफ़ में सूरह अन-नहल शरीफ़ में इरशाद-ए-बारी तआला है:
तर्जमा"और जब उन में से किसी को बेटी होने की ख़ुशख़बरी दी जाती है तो दिन भर उस का मुँह काला रहता है और वो ग़ुस्सा खाता है, लोगों से छुपता फिरता है इस बशारत की बुराई के सबब। क्या उसे ज़िल्लत से रखेगा या उसे मिट्टी में दबा देगा? अरे ये बहुत ही बुरा हुक्म लगाते हैं।"
बेटियों को ज़िंदा दफ़्न करने की क़बीह रस्म
अहद-ए-जाहिलियत में लोग अपनी बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर देते थे। वो बच्चियों को पालना, उन का निकाह करना अपने ऊपर नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त बोझ तसव्वुर करते थे। जब जंग-ओ-जदल होती तो लड़कियाँ घरों में रहतीं, जबकि लड़के बराबर का साथ दे कर जंग में हिस्सा लेते। इस लिए हर क़बीला चाहता के उस के हाँ लड़कों की पैदाइश हो और क़बाइल में बाहमी क़त्ल-ओ-ख़ून की रस्म जारी रह सके। अरब के लोग इस हरकत को बिलकुल मअयूब न समझते थे। उन के मुताबिक़ बाप अपनी कुल औलाद का मालिक होता था, उसे इख़्तियार था के औलाद को ज़िंदा रखे या मार डाले, इस पर एतराज़ का कोई हक़ नहीं था। एक शख़्स अपनी कई कई बेटियों को मार डालता और उसे कोई अफ़सोस न होता।
बेटियों को मिला इस्लाम का सायबान
फिर इस्लाम का नूर तुलूअ हुआ, ज़ुल्म-ओ-सितम का अंधेरा ख़त्म हुआ। बेटियों को इस्लाम की बरकत के सबब से रहमत क़रार दिया गया। जो लोग बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर देते थे, इस्लाम के नूर की चमक की वजह से बेटियों को आँख का तारा समझने लगे। ख़ातिम-उल-मुर्सलीन, हज़रत सय्यदना नबी करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम का इरशाद-ए-मुबारक है:
"जब किसी के हाँ बेटी की विलादत होती है तो अल्लाह अज़्ज़ा व जल उस के घर फ़रिश्तों को भेजता है, जो आ कर कहते हैं: ऐ घर वालो! तुम पर सलामती हो। फिर फ़रिश्ते अपने परों से उस लड़की का एहाता कर लेते हैं और फिर उस के सर पर हाथ फेर कर कहते हैं: एक कमज़ोर लड़की, कमज़ोर औरत से पैदा हुई है, जो इस की किफ़ालत करेगा, क़यामत तक उसकी मदद की जाएगी।"
सरकार-ए-कायनात अलैहिस्सलातु-वस्सलाम का फ़रमान-ए-आलीशान
ताजदार-ए-मदीना, सरकार-ए-कायनात, हज़रत नबी-ए-रहमत अलैहिस्सलातु-वस्सलाम का फ़रमान-ए-आलीशान है:
"जिस शख़्स की तीन बेटियाँ हों और वो उन पर सब्र करे, उन्हें खिलाए-पिलाए और अपनी कमाई से कपड़े पहनाए, तो वो लड़कियाँ उस के लिए दोज़ख़ की आग से आड़ बन जाएँगी।"
अल्लाह तबारक व तआला ने जन्नत वाजिब फ़रमा दी
उम्मुल मोमिनीन हज़रत सय्यदा आयशा सिद्दीक़ा तैय्यिबा ताहिरा रज़ी अल्लाह तआला अन्हा फ़रमाती हैं:
"मेरे पास एक मिस्कीन औरत अपनी दो बेटियों के साथ आई। मैंने उस को तीन खजूरें दीं। उस ने एक-एक खजूर दोनों बेटियों को दे दी और एक खजूर खाने के लिए अपने मुँह में ले जा रही थी के उस की बेटियों ने उस से वो खजूर भी माँग ली। उस ने वो खजूर भी तोड़ कर दोनों बेटियों को खिला दी। मुझे इस पर ताज्जुब हुआ और मैंने इमाम-उल-अंबिया, हज़रत सय्येदना रसूल करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम से इस का ज़िक्र किया तो सरकार-ए-कायनात, हुज़ूर सैयदुना नबी करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम ने इरशाद-ए-मुबारक फ़रमाया:
"अल्लाह अज़्ज़ा व जल ने उस के इस फ़ेअल (अमल) के सबब उस औरत के लिए जन्नत वाजिब कर दी।"
बेटियों के लिए मक़ाम-ए-शुकर
बेटियों के लिए ये मक़ाम-ए-शुकर है कि उन्हें रहमत क़रार दिया गया है। एक वो वक़्त था जब उन्हें ज़िल्लत और रूसवाई क़रार दिया जाता था, और फिर इस्लाम की बदौलत उन की परवरिश, विलादत और तरबियत करने पर वालिदैन के लिए जन्नत वाजिब क़रार दे दी गई। चुनांचे यही वजह है कि आज इस दौर में वालिदैन अपनी बेटियों की अच्छी तरह से तरबियत करते हैं, उन्हें दीन-ओ-दुनिया की तालीम दिलवाते हैं, ताकि वो बच्चियाँ उन के लिए निजात का सबब बनें।
बेटी की परवरिश
बेटा हो या बेटी, हर हाल में शुकर अदा करना चाहिए। अगर अल्लाह तबारक व तआला ने बेटा अता फ़रमाया है तो नेअमत और अगर बेटी अता फ़रमाई है तो रहमत। दोनों ही मोहब्बत के मुस्तहिक़ हैं क्योंकि वो दोनों ही औलाद हैं। मुशाहिदा से ये मालूम होता है कि बेटा हो तो बड़ी ख़ुशी होती है लेकिन बेटी पर ये ख़ुशी कुछ मांद पड़ जाती है। ऐसा रवैया ग़लत है। जो भी हो, वो हमारी औलाद होती है। इस बात का शुकर बजा लाना चाहिए कि अल्लाह तबारक व तआला ने साहिब-ए-औलाद किया। बेटी की विलादत पर शुकर-ए-ख़ुदावंदी अदा करने के बाद कानों में अज़ान देनी चाहिए। ऐसा करना सुन्नत से साबित और मुस्तहब है। बच्ची हो या बच्चा, दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कही जाए। अज़ान देने के बाद तहनीक की जाए, यानी घुट्टी दी जाए।
तहनीक का तरीक़ा
हज़रत सैयदुना अबू ज़करिया याह्या बिन शरफ़ नूदी रहमतुल्लाह अलैह, शरह मुस्लिम शरीफ़ में बयान फ़रमाते हैं:
"तमाम उलमा-ए-किराम का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि बच्चा पैदा होने के बाद खजूर (या मीठी चीज़) की घुट्टी देना मुस्तहब है। अगर खजूर न हो तो जो भी मीठी चीज़ मयस्सर हो, उस से घुट्टी दी जा सकती है। इस का तरीक़ा ये है कि घुट्टी देने वाला खजूर को अपने मुँह में ख़ूब चबा कर नरम कर दे, ताकि उसे चूसा जा सके। फिर वो बच्चे का मुँह खोल दे और उस में रख दे। मुस्तहब ये है कि घुट्टी देने वाला नेक, मुत्तक़ी और परहेज़गार इंसान हो, ख़्वाह मर्द हो या औरत। अगर ऐसा कोई शख़्स मौजूद नहीं है तो नौ-मौलूद को तहनीक की ख़ातिर किसी नेक शख़्स के पास भी ले जाया जा सकता है।"
बेटी का पहला तोहफ़ा: अच्छा नाम
माँ-बाप की तरफ़ से सबसे पहला तोहफ़ा ये होता है कि वो उस का ख़ूबसूरत नाम रखते हैं।
हज़रत सैयदुना अबू दर्डा रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि सैयद-उल-अंबिया, हुज़ूर सैयदुना रसूल करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम ने इरशाद-ए-मुबारक फ़रमाया:
"क़यामतके दिन-तुम अपने बापों-के-नामोंसे पुकारे जाओगे, लिहाज़ा अच्छे नाम रखा-करो। बेटियों के नाम उम्महात-उल-मोमिनीन, सहाबियात और सालिहात रज़ी अल्लाहु तआला अन्हुमा के अस्मा-ए-मुबारका पर ही रखे जाएं। इस में एक फ़ायदा ये होगा कि बेटी का उन बरगुज़ीदा ख़्वातीन से रूहानी ताल्लुक़ क़ायम हो जाएगा, और दूसरा ये कि उन हस्तियों से मंसूब होने की बरकत से ज़िंदगी पर अच्छे असरात मुरत्तब होते हैं।
अक़ीक़ा और बाल मुंडवाने की अहमियत
बेहतरीन नाम रखने के बाद सातवें दिन बाल मुंडवा कर, बालों के वज़न के बराबर चांदी सदक़ा करनी चाहिए, और अक़ीक़ा भी उसी दिन कर देना चाहिए। बेटे के लिए दो और बेटी के लिए एक बकरा ज़िब्ह किया जाएगा। इन तमाम आदाब बजा लाने के बाद वालिदैन को चाहिए कि अपनी औलाद को रिज़्क़-ए-हलाल खिलाएं।
इस्लामी तरबियती माहौल
दौर-ए-हाज़िर में अगर मुआशरे की तरफ़ नज़र दौड़ाई जाए तो हर तरफ़ दो ही चीज़ें नज़र आती हैं: "जदीद तालीम व तरक़्क़ी" "नाम-निहाद रौशन मुस्तक़बिल के नाम पर मग़रिबी तहज़ीब" मग़रिबी तहज़ीब से मअमूर मुख़्तलिफ़ ख़ूबसूरत और दिल-आवेज़ नामों के साथ, गली-गली स्कूल नज़र आते हैं, जिन का मक़सद नई नस्ल को दीन से दूर करना है। बड़ी बड़ी हाउसिंग सोसायटीज़ में इस्लामिक स्कूल्स के नाम पर बनाए गए बद मज़हबों के इदारे आने वाली नौजवान नस्ल के ख़यालात को बदल रहे हैं और ख़तरात का सबब बन रहे हैं। ज़रूरत इस अम्र की है कि इश्क़-ए-रसूल अलैहिस्सलातु-वस्सलाम से सरशार मुआशरे की तशकील के लिए ऐसे इदारे बनाए जाएं जहाँ इस्लाम का बोल बाला हो। हमें अपनी आइंदा नस्लों ख़ुसूसन बेटियों को इफ़्फ़त व इस्मत का पैकर बनाने, तौहीद व रिसालत से आशना कराने और इस्लाम के नाम पर ज़िंदगी गुज़ारने के लिए इश्क़-ए-रसूल अलैहिस्सलातु-वस्सलाम से भरपूर मदरसे में तालीम दिलवानी चाहिए ताकि आइंदा आने वाली नस्ल कामयाब हो। बच्चे की पहली दर्सगाह माँ की गोद होती है, अगर माँ नेक होगी तो औलाद भी नेक ही होगी। जो लोग बेटी की तालीम व तरबियत में कोताही के मुर्तकिब होंगे दर हक़ीक़त वो आइंदा आने वाली नस्ल की तालीम व तरबियत में कोताही के मुर्तकिब होंगे और इसका नुक़सान ना क़ाबिल-ए-तलाफ़ी होगा।
बेटी की तरबियत
अपनी बेटियों को शुरू से ही नाज़िरा कुरआन मजीद दीनि उलूम की तरबियत दिलानी चाहिए। माँओं को चाहिए कि वो बेटियों को बचपन से ही ऐसा माहौल दें जो कि इस्लाम के ऐन मुताबिक़ हो। बच्चों और बच्चियों को नमाज़ का हुक्म दें, तहारत के क़वानीन सिखाएँ, सफ़ाई की तालीम दें। ख़ानदान में रहने वाले लोगों से गुफ़्तगू के आदाब सिखाएँ, ताकि वो अपने वालिदैन के लिए ख़ुशी का सबब बनें।
मौजूदा दौर
आज एक बाप अपनी आठ-दस साला बेटी को जिस बे-परदगी के साथ अपने हमराह एक ऐसी तक़रीब में ले जाता है जहाँ मर्दों और औरतों का इख़्तिलात होता है, मौसिक़ी और म्यूज़िक का एहतेमाम होता है। बे-ख़ौफ़, ना-समझ औरतें ढोल की था'प पर रक़्स करती हैं और उनके जवान भाई और शौहर वग़ैरह उन्हें नाचते हुए देखते हैं। जब फूल जैसी बच्ची ये सब देखती है तो उसके छोटे से दिमाग़ में ये बात आती है कि ये सब ठीक है क्यूँकि उसका बाप उसको यहाँ ले कर आया है। अगर ये सब ग़लत होता तो वो मुझे यहाँ ना लाता। ये वो पहला क़दम होता है जहाँ से बर्बादी या आबादी की इब्तिदा होती है, फिर वो भी वही कुछ करना चाहती है जो उसने बचपन में देखा होता है।
बेटी रहमत है
क़ारईन-ए-किराम! हमें ना सिर्फ़ अपनी इस्लाह करनी होगी बल्कि मुआशरे को भी बदलने में अपना किरदार अदा करना होगा। हमें अपनी औलादों को ख़ुसूसन बेटियों को ऐसी महाफ़िल में नहीं ले जाना चाहिए जहाँ ख़िलाफ़-ए-शर'अ उमूर हों। बेटियों को भी ऐसी महाफ़िल से दूर रखना चाहिए। इब्तिदा से ही अपनी बेटी को जो माहौल फ़राहम कर रहे होते हैं, सन-ए-शऊर को पहुंचकर वो इन्हीं आदतों को इख़्तियार करती है। उसकी अच्छी आदतों का सबब उसके वालिदैन ही बनते हैं।बेटी रब-ए-तबारक व तआला की तरफ़ से रहमत है। माँ-बाप के लिए बख़्शिश का सबब बनती है। बेटियों की क़दर करनी चाहिए। उनको ख़ास तौर पर घर में रखना चाहिए। बाहर जाने से रोकना चाहिए ताकि उनकी इज़्ज़त व इस्मत बरक़रार रहे। बेटियों को अजनबियों से घुलने-मिलने से मना करना चाहिए। नमाज़ पढ़ने की तल्क़ीन करनी चाहिए क्यूँकि जिस्म और रूह की पाकी के लिए नमाज़ ज़रूरी है। बेटियों को रिज़्क़ की कमी के सबब मार देना ही क़त्ल के ज़ुम्रे में नहीं आता, बल्कि उनकी नाक़िस तरबियत करके उनको जहन्नम का ईंधन बनने के लिए बे-लगाम छोड़ देना भी उनको क़त्ल कर देने के बराबर है। वालिदैन बनना फुल-टाइम जॉब है। वालिदैन को अपनी औलाद पर ख़ुसूसी नज़र रखनी चाहिए। ख़ुसूसन बेटियों की हिफ़ाज़त करनी चाहिए, बेटियों की सहेलियों पर भी ख़ूब नज़र रखनी चाहिए ताकि उसके मेल-जोल का भी अंदाज़ा हो सके। बेटियों पर ख़ूब तवज्जो दें, उनकी ख़्वाहिशात का ख़याल रखें, उनसे ख़ूब मोहब्बत करें। दीन व दुनिया के तमाम उसूल व क़वानीन सिखाएँ। इस्लामी तर्ज़ पर उनकी परवरिश करें ताकि वो रहमत बनें, ज़हमत ना बन जाएँ। अल्लाह तबारक व तआला से दुआ है कि सब बेटियों की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करे और उनके नेक नसीब फ़रमाए। आमीन।
नतीजा:
इस पूरे मज़मून से यह वाज़ेह होता है कि हमारी नस्लों की बेहतरीन तरबियत और इस्लामी तालीम की अहमियत से नज़र अंदाज़ी करना ना-क़ाबिल-ए-माफ़ी गलती है। मौजूदा दौर में जहाँ बे-परदगी, गैर-इस्लामी रस्मों और माद्दी तरक़्क़ी के नाम पर दीन से दूर करने की साज़िशें हो रही हैं, वहीं हमें अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना होगा। ख़ास तौर पर बेटियों की सही परवरिश, इस्लामी माहौल की फ़राहमी और उन्हें इश्क़-ए-रसूल अलैहिस्सलातु-वस्सलाम से सरशार करने की सख़्त ज़रूरत है। अगर माँ-बाप अपनी बेटियों को बचपन से ही इस्लामी तालीम, तहज़ीब और पाकीज़ा माहौल देंगे, तो वो आने वाले वक़्त में दीनदार, हया-दर और बख़्तावार साबित होंगी। इसके बरअक्स, अगर उन पर तवज्जो न दी गई और उन्हें गैर-इस्लामी रवैयों में ढलने दिया गया, तो ये न सिर्फ़ उनकी ज़िंदगी बल्कि पूरे मुआशरे के लिए भी तबाही का सबब बन सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों, ख़ुसूसन बेटियों की हिफ़ाज़त करें, उन्हें इस्लामी उसूलों पर परवान चढ़ाएं, और ऐसे इदारे क़ायम करें जहाँ दीन की सही तालीम दी जा सके। इससे न सिर्फ़ हमारा मुआशरा संवर जाएगा, बल्कि आख़िरत में भी ये हमारी निजात का ज़रिया बनेगा। अल्लाह तआला हम सबको अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
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