ज़िक्र-ए-इलाही की फज़ीलत, ज़ाकिरीन का बुलंद मुक़ाम, जन्नत की बागबानी का तरीका, और सलाम के सही आदाब पर मबनी इस्लामी तालीमात
दीन-ए-इस्लाम ने अपने मानने वालों को हर पहलू में बेहतरीन रहनुमाई दी है, चाहे वह इबादत का मामला हो, अख़लाक़ का हो, या आपसी मुहब्बत और भाईचारे का। अल्लाह तआला के ज़िक्र से दिलों को सुकून और तमानियत मिलती है, जबकि सलाम आपसी मोहब्बत और इत्तेहाद का ज़रिया है। अल्लाह का ज़िक्र और सलाम, दोनों इंसान को न सिर्फ दुनिया में बल्कि आख़िरत में भी बुलंद मुक़ाम अता करते हैं।
और जन्नत के बागों में दरख़्त लगाने के लिए ज़िक्र-ए-इलाही और बरोज़-ए-महशर ज़ाकिरीन के बुलंद मरतबे और क़ुर्ब-ए-इलाही का ज़रिया है। इसके साथ ही सलाम का सही तरीक़ा और इसके आदाब इस्लामी तहज़ीब का एक अहम हिस्सा हैं, जो मुसलमानों के अख़लाक़ को निखारते और गुनाहों से पाक करते हैं।
इस्लामिक तालीमात के मुतालिक यह तहरीर ज़िक्र-ए-इलाही की फज़ीलत, जन्नत की बागबानी के तरीक़े, ज़ाकिरीन के मरतबे और सलाम के आदाब पर रोशनी डालती है। आइए, इस नायाब रहनुमाई से अपने ईमान को मज़बूत करें और नेक आमाल की तरफ़ रग़बत बढ़ाएं।
ज़ाकिरीन का मुक़ाम
अज़ीज़ान-ए-मोहतरम, इसमें कोई शक नहीं कि ज़िक्र-ए-इलाही दिलों की ज़ुल्मत और तारीकी को मिटाकर हलावत-ए-ईमान और रूह की तस्कीन का बाइस बनता है। जब अल्लाह का ज़िक्र दिलों में उतर जाता है, तो दुनिया की कोई ताक़त इसे मिटा नहीं सकती। जितना ज़्यादा हम अल्लाह का ज़िक्र करेंगे, उतना ही ज़्यादा क़ुर्ब-ए-इलाही हमें हासिल होगा। ज़ाकिरीन का बरोज़-ए-महशर मुक़ाम कितना बुलंद होगा, इसका अंदाज़ा एक रिवायत से बेहतर तौर पर समझा जा सकता है।
हदीस ए मुबारक
हुज़ूर-ए-अकरम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फ़रमाया:
"शब-ए-मे'राज मेरा गुज़र एक ऐसे शख़्स के पास से हुआ जो अर्श के नूर में छुपा हुआ था। मैंने पूछा, 'यह कौन है? क्या यह कोई फ़रिश्ता है?' जवाब मिला, 'नहीं।' फिर मैंने पूछा, 'क्या यह कोई नबी है?' जवाब मिला, 'नहीं।' तब मैंने पूछा, 'फिर यह कौन है?' जवाब मिला, 'यह वह शख़्स है जिसकी ज़बान दुनिया में ज़िक्र-ए-इलाही से तर रहती थी, उसका दिल मस्जिदों में लगा रहता था और उसने कभी अपने वालिदैन को गाली नहीं दी।'"
(इब्न अबी दुनिया, किताबुल औलिया)
सुब्हान-अल्लाह! इस रिवायत से यह मालूम हुआ कि ज़िक्र-ए-इलाही करने वाले, मस्जिदों से दिल लगाने वाले और वालिदैन का अदबो-इज्ज़त करने वालों का मुक़ाम कितना बुलंद और आला है कि क़यामत के दिन वह अर्श के नूर में पोशीदा होंगे।
वालिदैन का मुक़ाम
याद रखें, वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक नफ़्ल इबादात से भी अफ़ज़ल है। हदीस-ए-पाक में है:
"वालिदैन के साथ अच्छा सुलूक करना नफ़्ल नमाज़, नफ़्ल रोज़े और नफ़्ल जिहाद से बेहतर है।" (रूह अल-बयान)
जन्नत के बाग़ का ज़िक्र
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर-ए-पाक अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया:
"जिस रात मुझे मेराज कराई गई, मेरी मुलाक़ात सैय्यदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई। उन्होंने फ़रमाया, 'या मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरी तरफ़ से सलाम कहना और उन्हें बताना कि जन्नत की मिट्टी ज़रख़ेज़ है और उसका पानी मीठा है, लेकिन वह खाली पड़ी है। और उसकी बागबानी यह कलिमात कहना है
سُبْحَانَ اللهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ।'"
(तिर्मिज़ी शरीफ)
सुब्हान-अल्लाह! इस हदीस से मालूम हुआ कि जन्नत के बाग़ों में दरख़्त लगाने का अमल अल्लाह की तस्बीह, तहमीद और तकबीर से वाबस्ता है। जितनी बार यह कलिमात-ए-तय्यिबात का विर्दोद करेंगे , जन्नत में उतने ही दरख़्त खड़े होते चल जाएंगे।
अल्लाह तआला हमें ज़िक्र-ए-इलाही करने, मस्जिदों को आबाद रखने और वालिदैन की इताअत करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
सलाम का सही तरीका
एक-दूसरे को सलाम करना इस्लामी तहज़ीब का अहम हिस्सा है। लेकिन सलाम के अल्फ़ाज़ के तलफ़्फ़ुज़ में एहतियात बरतना ज़रूरी है। गलत तलफ़्फ़ुज़ से मआनी बिगड़ जाते हैं।
सही तरीका
السلام علیکم: तुम पर अल्लाह की सलामती हो।
गलत तरीका
"اسام علیکم: तुम्हें मौत आए।
سلائے علیکم: तुम पर लानत हो।
سام علیکم: तुम तबाह हो जाओ।
علیکم السلام: मुर्दों पर सलाम है।"
सलाम के आदाब
1. चलने वाला बैठे हुए को सलाम करे।
2. सवार पैदल चलने वाले को सलाम करे।
3. छोटा शख़्स बड़े को सलाम करे।
4. कम अफ़राद ज्यादा अफ़राद को सलाम करें।
5. घर में दाख़िल होने और बाहर जाने वाला बाकी अहल-ए-ख़ानदान को सलाम करे।
मुसाफ़हा
सलाम के बाद हाथ मिलाना दिलों में क़ुरबत पैदा करता है और गुनाहों को मिटाता है।
सलाम की अमानत
अगर कोई कहे कि "फ़लां को मेरा सलाम देना," तो इसे पहुंचाना एक अमानत है। इस अमानत में खयानत करना गुनाह है।
खुलासा:
सलाम इस्लामी तहज़ीब का अहम हिस्सा और दुआ का एक खूबसूरत अंदाज़ है। इसे सही तरीके और नीयत के साथ अदा करना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है। अल्लाह से दुआ है के हमें इस्लामी तालीमात पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए , आमीन
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