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meraj e rasool aur ahle sunnat ka aqeeda मेराज जिस्मानी पर कुरआनी दलाइल

मेराज हालत ए बेदारी में हुई 

मोहतरम हज़रात, आज मेरा उनवान "मेराज-ए-मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम और हमारा अक़ीदा" है। अहल-ए-सुन्नत वल जमात का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि मेरे आक़ा करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम हिजरत से पहले रजब शरीफ़ की सत्ताईसवीं रात को, जो कि शब-ए-दोशंबा थी, अपने चचाज़ाद बहन हज़रत उम्म-ए-हानी रज़ीअल्लाहु अन्हा के घर आराम फ़रमा थे।

अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्राईल अलेहिस्सलाम को हुक्म फ़रमाया कि सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की बारात साथ में ले लो और जन्नत को सजा दो। दारोगा-ए-जहन्नम को हुक्म हुआ कि दोज़ख के दरवाज़े बंद कर दे। हूरान-ए-बहिश्त को हुक्म दिया गया कि उम्दा और नफ़ीस लिबास ज़ेब तन कर लें। तमाम फ़रिश्तों को मीराज के दूल्हा की ताज़ीम के लिए कमर बस्ता हो जाने का हुक्म दिया गया। इसराफील अलेहिस्सलाम को सूरत न फूंकने का हुक्म दिया गया और इज़राईल अलेहिस्सलाम से फरमाया गया कि आज की रात किसी की रूह क़ब्ज़ न करें। साथ ही तमाम क़ब्रों से अज़ाब उठा लिया जाए हज़रत आदम अलेहिस्सलाम से ईसा अलेहिस्सलाम तक तमाम अंबिया किराम शब-ए-इसरा के दूल्हा के इस्तकबाल के लिए तैयार हो जाएं।

मीराज जिस्मानी पर कुरआनी दलाइल

सहाबा किराम और ताबेईन एज़ाम की कसीर तादाद और मज़हब-ए-जुमहूर यही है कि मेरे आका करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम की मीराज शरीफ़ आलम-ए-बेदारी और जिस्मानी थी।

जिस्मानी मीराज पर बेहिसाब दलाइल मौजूद हैं, पर यहाँ कुछ दलाइल पेश-ए-खिदमत हैं, मुलाहिज़ा फरमाएं:

(1) अल्लाह तआला का इरशाद-ए-पाक: "असरा बि अब्दिहि"।

लफ्ज़ "अब्द" कुरआन मजीद, हदीस शरीफ़ या अरब की बोली में सिर्फ रूह को नहीं कहा जाता और न ही सिर्फ जिस्म के लिए इस्तेमाल होता है, बल्कि रूह और जिस्म के मजमुए को कहा जाता है। इसीलिए लफ्ज़ "अब्द" का इस्तेमाल करना इस बात की दलील है।कि मीराज शरीफ जिस्मानी थी।

(2) और हदीस शरीफ में है कि हमारे आका करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम के लिए बुराक की सवारी पेश की गई थी, जिस पर मेरे आका करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम सवार होकर मीराज के लिए तशरीफ ले गए। इसका मतलब यह है कि रूह को सवारी की जरूरत नहीं होती, हाँ सवारी के लिए रूह और जिस्म दोनों की जरूरत होती है। इससे पता चला कि मीराज शरीफ जिस्मानी थी।

(3) अल्लाह तआला का फरमान "असरा"।

रात की सैर को कहते हैं। "असरा" का इतलाक उस सैर पर नहीं होता जो ख्वाब में हो, बल्कि "असरा" का इतलाक उस पर होता है जो रात के वक्त आलम-ए-बेदारी में हो। इसलिए "असरा" का इस्तेमाल होना इस बात की दलील है कि मीराज शरीफ जिस्मानी थी।

(4) अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: "मा ज़ागल बसरु वमा तगा" (आँख न किसी तरफ फिरी, न हद से बढ़ी)।

(तरजुमा कंजुल-ईमान)

"बसर" का लफ्ज़ जिस्मानी निगाह के लिए बोला जाता है। ख्वाब में देखने को "बसर" का लफ्ज़ नहीं बोला जाता। इसीलिए "बसर" के लफ्ज़ का इस्तेमाल होना इस बात की दलील है कि मीराज शरीफ जिस्मानी थी।

(5) अल्लाह तआला कुरआन मजीद में इरशाद फरमाता है:

"और हमने फरमाया, ऐ आदम! तू और तेरी बीवी इस जन्नत में रहो"।

(तरजुमा कंजुल-ईमान, पारा 1, रुकू 4)

मफहूम:

अभी मैंने जिन आयत पाक का तरजुमा बयान किया है, उसका मफहूम यह है कि जब अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलेहिस्सलाम को हुक्म दिया कि "तुम और तुम्हारी बीवी जन्नत में रहो," तो दोनों जन्नत में रहे। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। अगर कोई इनकार करे तो काफिर होगा, क्योंकि अल्लाह के कलाम का इनकार करना कुफ्र है।

तो मानना होगा कि हज़रत आदम अलेहिस्सलाम और उनकी बीवी हज़रत हव्वा रज़ियल्लाहु अन्हा जन्नत में रहे। जब इतना मान लिया, तो यह भी मानना होगा कि हज़रत आदम अलेहिस्सलाम जिस्म के साथ जन्नत में रहे। क्योंकि सबसे पहले हज़रत आदम अलेहिस्सलाम का पुतला तैयार किया गया, फिर उसमें रूह डाली गई, और उसके बाद जन्नत में रहने का हुक्म दिया गया।

तो जब हज़रत आदम अलेहिस्सलाम और उनकी बीवी हज़रत हव्वा रज़ियल्लाहु अन्हा जन्नत में जिस्म के साथ रह सकते हैं, तो जिनके सदक़े में ये दोनों पैदा किए गए हैं, उस महबूब-ए-ख़ुदा अलैहिस्सलातु वस्सलाम का आलम क्या होगा। वह जिस्म के साथ क्यों नहीं जा सकते? तो तस्लीम करना होगा कि मेरे आका करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम जिस्म के साथ मीराज के लिए गए।

(6) अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

और किताब में इदरीस को याद करो, बेशक वह सिद्दीक था, ग़ैब की खबरें देता था और हमने उसे बुलंद मक़ाम पर उठा लिया।

(तरजुमा कंजुल-ईमान, पारा 6, रुकू 7)

इस आयत में अल्लाह तआला ने हज़रत इदरीस अलेहिस्सलाम को याद करने का हुक्म दिया है और यह भी इरशाद फ़रमाया कि वह सिद्दीक थे, वह ग़ैब की खबरें देते थे और उन्हें हमने बुलंद मक़ाम पर उठा लिया। तो जब हज़रत इदरीस अलेहिस्सलाम को बुलंद मक़ाम पर उठाने का ज़िक्र क़ुरआन में मौजूद है और हज़रत इदरीस अलेहिस्सलाम जिस्म के साथ आसमानों की तरफ़ तशरीफ़ ले गए और जन्नत में दाख़िल हुए, तो नबियों के सरदार यानी नायब-ए-परवरदिगार, सरकार-ए-मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम को मीराज के लिए अल्लाह तआला ने बुलाया, तो इसमें हैरत की बात क्या है? रब ने बुलाया, मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम गए। बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।

(7) अल्लाह-तआला क़ुरआन पाक में इरशाद फ़रमाता है:

"और बेशक उन्होंने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह तआला ने उसे अपनी तरफ़ उठा लिया और अल्लाह तआला ग़ालिब हिकमत वाला है।

(तरजुमा कंजुल-ईमान, पारा 6, रुकू 2)

यह आयत मुबारक हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम के ताल्लुक से नाज़िल हुई है। आज हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम जिस्म-ए-खाकी के साथ चौथे आसमान पर मौजूद हैं। तो जब हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम चौथे आसमान पर मौजूद हैं और वह दोबारा इस दुनिया में तशरीफ़ लाएंगे, हां मगर नबी बनकर नहीं, बल्कि उम्मत-ए-मोहम्मदिया बनकर इस दुनिया में तशरीफ़ लाएंगे।

तो मेरे आका करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम जिस्म-ए-अक़दस के साथ आसमानों की सैर करते हुए, जन्नत और दोज़ख का मुशाहिदा करते हुए, अर्श-ए-मुअल्ला का नज़ारा करते हुए, ला-मकां पहुंचे, तो बिना चूं-चरा के इस बात को तस्लीम कर लेना चाहिए।

क्योंकि मेरे रब ने हज़रत आदम अलेहिस्सलाम को जिस्म के साथ जन्नत में रखा, और हज़रत इदरीस अलेहिस्सलाम को आसमानों पर तशरीफ़ ले गए, और हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम आज भी चौथे आसमान पर मौजूद हैं। जब यह सब अंबिया किराम अलेहिस्सलाम अपने जिस्म-ए-खाकी के साथ इन मुकामात पर तशरीफ़ ले जा सकते हैं, तो अल्लाह तआला ने जिनके सदके में दोनों जहानों को पैदा किया, वह नबी, मालिक-ए-मुख्तार, नायब-ए-परवरदिगार, नबियों के सरदार अहमद-ए-मुज्तबा, मोहम्मद मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम अपने जिस्म-ए-अक़दस के साथ क्यों नहीं जा सकते?

बेशक, मेरे आका करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम अपने जिस्म-ए-अक़दस के साथ मीराज के लिए तशरीफ़ ले गए।

सफर-ए-मेराज उम्म-ए-हानी के घर से।

सत्तर हज़ार फरिश्तों की जमात के साथ बुराक लेकर जिब्रील अमीन उम्म-ए-हानी के घर पहुंचे, तो देखा कि रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम आराम फरमा रहे हैं। अब जिब्रील अमीन नूरी ज़हन से सोचते हैं कि अब सरकार दो आलम अलैहिस्सलातु वस्सलाम को कैसे जगाऊं। अगर नहीं जगाया, तो हुक्म-ए-ख़ुदा बजा लाने में ताख़ीर हो जाएगी। रब तआला का हुक्म है: "मेरे महबूब को जल्दी बुलाकर लाओ।" अगर जगाया, तो सरकार दो आलम अलैहिस्सलातु वस्सलाम की शान में बेअदबी होगी।

इसी सोच में जिब्रील अमीन थे कि रब तआला का हुक्म होता है: "ऐ जिब्रील, क्या सोचता है? आपके होंठ काफ़ूर के हैं और मेरे महबूब के तलवे नूर के हैं। काफ़ूर में ठंडक होती है। काफ़ूरी होंठों से मेरे महबूब के तलवे को मस करो। ठंडक पहुंचेगी, तो मेरे महबूब बेदार हो जाएंगे।"

हज़रत जिब्रील अमीन ने अपने काफ़ूरी होंठों से मेरे नबी करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम के तलवे मुबारक को मस किया, यानी चूमा। जब ठंडक पहुंची, तो मेरे आका अलैहिस्सलातु वस्सलाम बेदार हो गए और इरशाद फरमाया: "जिब्रील, कहो, कैसे आना हुआ?"

जिब्रील अमीन बोले: "या रसूल अल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम, ख़ुदा का पैग़ाम लाया हूं। बेशक वह आपसे मुलाक़ात का मुश्ताक़ है। अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है: 'मेरे महबूब को जल्दी लेकर आओ।' या रसूल अल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम, आज आप मीराज के दूल्हा बनने वाले हैं। मीकाईल और इसराफ़ील भी हाज़िर-ए-ख़िदमत हैं और साथ में सत्तर हज़ार फरिश्तों की बारात है और सवारी के लिए जन्नती बुराक हाज़िर है।

सफर-ए-मेराज की तैयारी

शक्क सदर (सीना चीरने) का मोज़िज़ा ज़ाहिर होता है। आब-ए-ज़मज़म से ग़ुस्ल दिया जाता है। मेरे आका करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम जन्नती पोशाक ज़ेब-ए-तन फरमाते हैं। आपको दूल्हा बनाया जाता है। चुनांचे अर्श की तरफ़ सफर की तैयारियां होने लगती हैं। सफर-ए-मीराज का सिलसिला शुरू होने वाला था कि नबी करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम की बारगाह में बुराक हाज़िर किया गया, जिस पर हुज़ूर को सवार होना था।

मगर अल्लाह के प्यारे महबूब अलैहिस्सलातु वस्सलाम को उस वक्त अपनी उम्मत याद आ जाती है और आपकी आँखों से आंसू निकल पड़ते हैं। जिब्रील अमीन ने अरज़ किया, "या रसूलुल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम, क्या इंतज़ामात में कोई कमी रह गई?" तो आपने इरशाद फरमाया, "नहीं, मेरे इस्तक़बाल के लिए तूने सत्तर हज़ार फरिश्तों को लाया, सवारी के लिए बुराक हाज़िर किया।"

तो जिब्रील अमीन बोले, "या रसूलुल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम, फिर रोने की वजह?" आपने इरशाद फरमाया, "अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त की इस कदर इनायतें हैं मुझ पर, मगर रोज़-ए-क़यामत मेरी उम्मत का क्या होगा? मेरी उम्मत पुल-सिरात से कैसे गुज़रेगी?"

इस वक्त अल्लाह तआला ने जिब्रील अमीन से कहा, "ऐ जिब्रील, मेरे महबूब से कह दो कि आप उम्मत की फिक्र न करें। हम आपकी उम्मत को पुल-सिरात से इस तरह गुज़ार देंगे कि उन्हें ख़बर भी नहीं होगी।"

जब यह बशारत सरकार-ए-दो-आलम अलैहिस्सलातु वस्सलाम सुनते हैं, तो बुराक पर सवार हो गए। जिब्रील अमीन ने रकाब थामी, मीकाईल ने लगाम पकड़ी, और इसराफ़ील ने ज़ीन संभाली। इसके साथ ही सत्तर हज़ार फरिश्तों के सलाम की सदाओं से आसमान गूंज उठा। हदीस में आया है...बुराक की तेज़ रफ्तारी का ये आलम था कि जहां तक नज़र की हद थी, वहां वह कदम रखता था। बुराक का सफर इस कदर तेज़ी के साथ हुआ जिस तक इंसान की अक़्ल पहुंच ही नहीं सकती। ऐसा लगता था कि हर तरफ मौसम-ए-बहार आ गया है। चारों तरफ नूर ही नूर फैलता चला गया और रहमत-ए-अनवार की झमाझम बारिश हो रही थी।

मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक

अल्लाह कुरान में इरशाद फरमाता है 

तरजुमा:

पाकी है उसे जो अपने बंदे को रातों-रात मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक ले गया, जिसके गिर्द-ओ-गिर्द हमने बरकत रखी, ताकि हम उसे अपनी अज़ीम निशानियां दिखाएं। बेशक वह सुनने वाला और देखने वाला है। (कंजुल-ईमान)

आका करीम रहमतुल्लिलआलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम का मस्जिद-ए-हराम से सफर शुरू होता है। थोड़ी देर बाद हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का गुजर उस ज़मीन पर हुआ जिसमें खजूर के दरख़्त कसरत से थे। हज़रत जिबरील अमीन ने अर्ज़ किया, "या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, यह मदीना शरीफ है, आपकी सुकूनत की जगह यहाँ नमाज़ पढ़िए।" आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बुराक से उतर कर नमाज़ अदा की। फिर हज़रत शुऐब अलाईहिस्सलाम का शहर मदयन आया, फिर हज़रत ईसा अलाईहिस्सलाम की विलादत की जगह बैत लहम और फिर जबल तूर आया। हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन मक़ामात पर नमाज़ पढ़ी।

हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं, "मैं मूसा अलाईहिस्सलाम की क़ब्र के पास से गुज़रा, वो खड़े होकर अपनी क़ब्र में नमाज़ पढ़ रहे थे।" (मुस्लिम शरीफ़)

एक बात बताता चलूँ कि हमारे आका सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ज़मीन के ऊपर भी देख रहे हैं और ज़मीन के नीचे भी देख रहे हैं। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम किस हाल में हैं और नमाज़ पढ़ने की हालत भी मुआयना कर रहे हैं। फिर मेरे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मस्जिद-ए-अक्सा पहुंचे हैं

मस्जिद-ए-अक्सा से सिद्रतुल मुनतहा तक

सफ़र करते हुए जब हमारे नबी सरकार मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा पहुंचे तो पहले से ही मस्जिद-ए-अक्सा में तमाम अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस्तेकबाल के लिए मौजूद थे। सब अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम ने आपको देखते ही हम्दो सना बयान की और आपकी बारगाह ए अक्दस में सलातो सलाम पेश किया। फिर अज़ान दी गई और तक़बीर कही गई। अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम ने सफ़ें दुरुस्त कीं। हज़रत जिबरील अलैहिस्सलाम ने इमामुल अंबिया सरकार मदिना सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत आलिया में अर्ज़ किया कि हुज़ूर मुसल्ला ए इमामत पर रौनक़ अफ़रोज़ हों और नमाज़ पढ़ाएँ, फिर हमारे आका करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने तमाम अंबिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) की इमामत फरमाई। क्या शान है मेरे आका करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की, कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) तक तमाम अंबिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) मुक़्तदी बनकर खड़े थे और नबी-ए-आख़िरुज़्ज़मां, काबे का काबा, सरवरे क़ौन-ओ-मकां, मालिक-ए-मुख्तार, नायब-ए-परवरदिगार, नबियों के सरदार, अहमद मुज्तबा, मोहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इमामत फरमा रहे थे।

फिर मस्जिद-ए-अक़्सा से आसमानों की सैर करते हुए, जन्नत-दोज़ख का नज़ारा करते हुए मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आगे बढ़ते हैं। जब सिदरतुल-मुन्तहा पहुँचते हैं, तो जिब्रील अमीन और बुर्राक़ दोनों रुक गए। जिब्रील अमीन अर्ज़ करते हैं, "या रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम), यह सिदरतुल-मुन्तहा है। मेरा सफ़र आप के साथ का यहीँ तक था। अब अगर मैं यहाँ से एक बाल के बराबर भी आगे बढ़ा, तो अल्लाह तआला के अनवार-ए-तजल्ली मेरे परों को जला कर राख कर देंगे। या रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम), मेरी आख़िरी हद यही है। अब आप यहाँ से आगे तशरीफ़ ले जाएँ।" (नोट) दोस्तों, एक पते की बात बताता चलूं जब हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सिदरतुल-मुन्तहा पहुंचते हैं तो जिब्रील अमीन सिदरतुल-मुन्तहा में रुक गए और सरकार-ए-दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा, "या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, आप आगे जाएं, मैं आपकी तरह नहीं हूं।" और मेरे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तनहा आगे गए क्योंकि मेरे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिब्रील की तरह नहीं।

सिदरतुल-मुन्तहा से अर्श-ए-आज़म

जब सिदरतुल-मुन्तहा पर जिब्रील अमीन और बुर्राक रुक गए तो वहां से सफर के लिए मेरे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में रफ-रफ पेश किया जाता है जो सब्ज़ रंग का था, उसका नूर सूरज की रोशनी पर ग़ालिब था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस रफ-रफ पर सवार होकर अर्श-ए-आज़म पर जलवा-अफरोज़ होते हैं।

अर्श-ए-आज़म से ला-मकां

जब हमारे आका करीम रहमतुल्लिल-आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अर्श-ए-आज़म पर पहुंचते हैं, जो सिदरतुल-मुन्तहा से अर्श-ए-आज़म तक सत्तर हजार परदे हैं और हर परदे के दरमियान पांच सौ बरस का फासला है, अर्श-ए-आज़म के ऊपर न कोई मकां है न सामान, सब अर्श के नीचे हैं। जब हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अर्श-ए-आज़म पर जलवा-अफरोज़ होते हैं तो उस वक्त ये कैफियत थी कि सिदरतुल-मुन्तहा नीचे, सातों आसमान नीचे, सातों जमीन नीचे, जमीन और आसमान में रहने वाले नीचे, बैतुल्लाह नीचे, बैतुल-मक्दिस नीचे, फरिश्तों का काबा बैतुल-मामूर नीचे, जन्नत नीचे, अल्लाह तआला का अर्श नीचे था और कदम-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सबके ऊपर।

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाज़िल-ए-बरेलवी अलैहिर्रहमा इरशाद फरमाते हैं:

वही ला-मकां के मक़ीं हुए

सर-ए-अर्श तख्त नशीं हुए

वो नबी हैं जिनके हैं ये मकां

वो खुदा है जिसका मकां नहीं

हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रफ-रफ पर सवार थे, सफर जारी था। हमारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आगे बढ़ते रहे। बहुत से नूरानी हिजाबात तय करने के बाद रफ-रफ भी रुख़्सत हो गया। अब हमारे आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तनहा जाने वाले थे, साथ कोई नहीं था। बुलाने वाली ज़ात खुदा की और जाने वाली ज़ात रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की। अब जिधर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुलाया जा रहा है, मेरे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उधर जा रहे हैं। रब तआला ने अपने महबूब को अपने पास बुलाया और दीद (दीदार) का शरफ बख्शा।

दीदार-ए-इलाही

हमारे नबी करीम रहमतुल्लिल-आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिस्म-ए-अकदस के साथ खुदा की बारगाह में हाज़िर हुए और अपने सर की…आँखों से ख़ुदा का दीदार किया यह मर्तबा किसी और नबी को नहीं मिला सिवाए मेरे नबी के। मेरे आका करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने बे-हिजाब अपनी आँखों से दीदार किए और हमकलाम भी हुए।

दीदार-ए-इलाही का सुबूत अहादीस-ए-करीमा में

(1) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ी अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं।

तर्जुमा: बेशक मोहम्मद अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने अपने रब को देखा (तिरमिज़ी शरीफ़)

(2) रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया:

"मैंने अपने रब को हसीन सूरत में देखा, फिर उसने मेरे दोनों कंधों पर अपना दस्ते-कुदरत रखा। इससे मैंने अपने सीने में ठंडक पाई और ज़मीन और आसमान की हर चीज़ को मैंने जान लिया।" (मिश्कात शरीफ़)

(3) हदीस शरीफ़ में है:

"रअइतु रब्बी" यानी "मैंने अपने रब को देखा।" (फतह अल-बारी)

(4) इब्न इस्हाक़ बयान फरमाते हैं कि हज़रत अबू हुरैरा रज़ी अल्लाहु अन्हु से पूछा गया:

"هل رأى محمد ربه؟"

तो हज़रत अबू हुरैरा रज़ी अल्लाहु अन्हु ने फरमाया: "نعم" यानी "हाँ, देखा।" (शिफा शरीफ़)

हदीस की किताबों में और दीगर किताबों में उलमा अहले-सुन्नत वल-जमाअत के नज़दीक मेरे आका करीम रहमतुल्लिल-आलमीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने रब का दीदार फरमाया।

शब-ए-मेराज की इबादतें

अल्लामा सफूरी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं:

रजब उल -मुरज्जब बीज बोने का, शाबान अल-मुअज़्ज़म आबपाशी का, और रमज़ान अल-मुबारक फसल काटने का महीना है। लिहाज़ा जो रजब उल-.. मुरज्जब में इबादत का बीज नहीं बोता और शाबान अल-मुअज़्ज़म में आँसुओं से सैराब नहीं करता, वह रमज़ान अल-मुबारक में फसल-ए-रहमत कैसे काट सकेगा? मज़ीद फरमाते हैं: रजब उल -मुरज्जब जिस्म को, शाबान अल-मुअज़्ज़म दिल को, और रमज़ान अल-मुबारक रूह को पाक करता है। (नुज़्हत अल-मजालिस)

हज़रत अनस रज़ी अल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने इरशाद फरमाया:

"रजब की सत्ताईसवीं रात में इबादत करने वालों को 100 साल की इबादत का सवाब मिलता है। जो शख्स सत्ताईसवीं रजब उल-मुरज्जब की रात 12 रकअत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकअत में सूरह फातिहा पढ़कर कुरान करीम की कोई सूरह पढ़े और हर 2 रकअत पर तशह्हुद (अत्तहियातु लिल्लाह) आखिर तक पढ़कर (बाद दुरूद) सलाम फेरे। और 12 रकअत पढ़ने के बाद 100 मर्तबा यह तस्बीह पढ़े:

سُبْحَانَ اللّٰهِ وَالْحَمْدُ لِلّٰهِ وَلَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاللّٰهُ اَكْبَرُ

फिर 100 मर्तबा اَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ

और 100 मरतबा दुरूद शरीफ पढ़े तो दुनिया और आखिरत के उमूर के मुताल्लिक जो चाहे दुआ करे और सुबह में रोज़ा रखे तो यक़ीनन अल्लाह तआला उसकी तमाम दुआएं क़बूल फ़रमाएगा मगर ये कि वो कोई ऐसी दुआ न करे जो गुनाह में शुमार होती हो क्योंकि ऐसी दुआ क़बूल न होगी (शुअब उल ईमान, इहया उल उलूम सफ़ा ۳۷۲ जिल्द ۱)

अल्लाह रब्ब उल इज़्ज़त से दुआ गो हूं कि अल्लाह पाक मुझे भी और तमाम मोमिनीन को सिरात-ए-मुस्तक़ीम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और इस माहे मुबारक में कसरत से इबादत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। अल्लाह रब्ब उल इज़्ज़त हमारे मुल्क, जान और माल की हिफ़ाज़त फ़रमाए। आमीन।

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