qtESQxAhs26FSwGBuHHczRGOCdrb3Uf78NjGuILK
Bookmark

Geebat ki muzammat quran aur hadees ki roshni mein

गीबत: मुआशरे का  एक खतरनाक नासूर 

इस्लाम ऐसा पाकीज़ा मज़हब है जो अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल का महबूब और पसंदीदा है और यह अपने मानने वालों को फलाह व कामयाबी की राह पर चलने की ताकीद करता है, सिरात-ए-मुस्तकीम पर गामज़न रहने की हिदायत देता है। इस्लाम के अहकाम के मुताबिक ज़िंदगी बसर करने से ज़िंदगी ख़ुशगवार और पुरसुकून गुज़रती है। इसमें निज़ाम-ए-हयात का बेहतरीन दस्तूर अता किया गया है,जिसके मुताबिक चलना मोमिनों पर ज़रूरी है। दौर-ए-हाज़िर में समाज में जिस तरह बुराइयाँ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं,यक़ीनन यह बहुत अफ़सोसनाक पहलू है। मज़हब-ए-इस्लाम में तमाम बुराइयों से बाज़ रहने के साथ-साथ उनके इरतिकाब पर अशद सज़ा का मुस्तहिक़ वारिद है। सर-ए-दस्त  हम ग़ीबत जैसे नासूर की मुज़म्मत में क़ुरआन करीम और अहादीस शरीफ़ा की रौशनी में कुछ तहरीर करने की कोशिश इस उम्मीद के साथ करेंगे कि "ऐ काश कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात"। इरशाद-ए-बारी तआला है:  (सूरत अल-हुजुरात, 49:12) में
तर्जुमा:"ऐ ईमान वालो! बहुत-से गुमानों-से-बचो, बेशक कोई गुमान गुनाह हो जाता है। और ऐब न ढूँढो और एक-दूसरे की ग़ीबत न करो। क्या तुम में कोई पसंद रखेगा  कि अपने-मरे भाई का गोश्त-खाए? तो यह तुम्हें गवारा न होगा। और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह बहुत तौबा क़बूल करने वाला, मेहरबान है। मज़कूरा आयत करीमा की तफ़्सीर में सदर-उल-अफ़ाज़िल हज़रत मौलाना सय्यद शाह नईमुद्दीन मुरादाबादी क़ुद्दस सिर्रुहु लिखते हैं:हदीस शरीफ़ में है कि ग़ीबत यह है कि मुसलमान भाई की पीठ पीछे ऐसी बात कही जाए जो उसे नागवार गुज़रे,अगर वह बात सच्ची है तो ग़ीबत वरना बुहतान। तो मुसलमान भाई की ग़ीबत भी गवारा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उसकी पीठ पीछे बुरा कहना उसके मरने के बाद उसका गोश्त खाने के मिस्ल (समान) है। क्योंकि जिस तरह किसी का गोश्त काटने से उसे ईज़ा (तकलीफ़) होती है, इसी तरह उसको बदगोई से क़ल्बी तकलीफ़ होती है। और दर-हक़ीक़त आबरू (इज़्ज़त) गोश्त से ज़्यादा प्यारी है।

शान-ए-नुज़ूल:  

सय्यिद-ए-आलम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम जब जिहाद के लिए रवाना होते और सफ़र फ़रमाते, तो हर दो मालदारों के साथ एक ग़रीब मुसलमान को कर देते कि वह ग़रीब उनकी ख़िदमत करे। वह उसे खिलाएं-पिलाएं, हर एक का काम चले। इसी तरह हज़रत सलमान रज़ियल्लाहु अन्हु दो आदमियों के साथ किए गए थे। एक रोज़ वह सो गए और खाना तैयार न कर सके, तो उन दोनों ने उन्हें खाना तलब करने के लिए रसूल-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम की ख़िदमत में भेजा। हुज़ूर के ख़ादिम-ए-मत्बख़ हज़रत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु थे। उनके पास कुछ रहा ना था, उन्होंने फ़रमाया कि मेरे पास कुछ नहीं। हज़रत सलमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने यही आकर कह दिया। तो उन दोनों रफ़ीक़ों (साथियों) ने कहा कि हज़रत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु नेबुख़्ल (कंजूसी) की। जब वह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो हुज़ूर ने फ़रमाया: "मैं तुम्हारे मुंह में गोश्त की रंगत देखता हूं। उन्होंने अर्ज़ किया: "हमने गोश्त खाया ही नहीं। फ़रमाया: "तुमने ग़ीबत की, और जो मुसलमान की ग़ीबत करे, उसने मुसलमान का गोश्त खाया।  

ग़ीबत बाला तिफाक़ कबाइर (कबीरा गुनाहों) में से है।

ग़ीबत करने वाले को तौबा लाज़िम है। एक हदीस शरीफ़ में यह है कि ग़ीबत का कफ़्फ़ारा यह है कि जिसकी ग़ीबत की है, उसके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करे।  
मसला: फ़ासिक़ मुआल्लिन (खुल्लम-खुल्ला गुनहगार) के ऐब का बयान ग़ीबत नहीं है। हदीस शरीफ़ में है कि फ़ाजिर (बदकार) के ऐब बयान करो, ताकि लोग उससे बचें।  
मसला: हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु-से मरवी-है के तीन शख़्सियतों की हुरमत (इज़्ज़त) नहीं है:  
1. साहिब-ए-हवा (बदमज़हब),  
2. फ़ासिक़ मुआल्लिन (खुल्लम-खुल्ला गुनहगार),  
3. बादशाह ज़ालिम।  
यानी इनके ऐब बयान करना ग़ीबत नहीं है।  
(खज़ाइनुल इरफ़ान)  
अहादीस शरीफ़ा में ग़ीबत की मुज़म्मत में बहुत वईद वारिद हुई हैं।  सरे दस्त एक हदीस शरीफ़ नज़र-ए-क़ारिअीन है:  
रिवायत है हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से  कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु -अलैहि व आलिहि-वसल्लम ने फ़रमाया:  
"क्या जानते हो ग़ीबत क्या है?" 
सबने अर्ज़ किया: "अल्लाह और रसूल ही ख़ूब जानें।  
फ़रमाया: "तुम्हारा अपने भाई का नापसंदीदा ज़िक्र करना (यानी किसी के ख़ुफ़िया ऐब उसकी पीठ पीछे बयान करना, चाहे वह ऐब जिस्मानी हों या नफ़्सानी, दुनियावी या दीनी, या उसकी औलाद या बीवी के घर के)। चाहे ज़बान से बयान करो या क़लम से या इशारे से, ग़रज़ किसी तरह से लोगों को समझा दो। जैसे किसी लंगड़े या हकलाने वाले की पीठ पीछे नक़्ल करना, लंगड़ा कर चलना या हकला कर बोलना, सब कुछ ग़ीबत है। अर्ज़ किया गया:"फ़रमाइए, तो अगर मेरे भाई में वह ऐब हो जो मैं कहता हूँ? (साइल ग़ीबत और बुहतान में फ़र्क़ न कर सका, वह समझा कि किसी को झूठा बुहतान लगाना ग़ीबत है, इसलिए उन्होंने यह सवाल किया।) फ़रमाया: "अगर उसमें वह हो जो तू कहता है, तो तूने उसकी ग़ीबत की। और अगर उसमें वह न हो जो तू कहता है, तो तूने उसे बुहतान लगाया।" सुब्हानअल्लाह! क्या नफ़ीस जवाब है कि ग़ीबत सच्चे ऐब बयान करने को कहते हैं, और बुहतान झूठे ऐब बयान करने को। ग़ीबत होता है सच्चा, मगर है हराम। अक्सर गालियाँ सच्ची होती हैं, मगर वह बेहयाई और हराम है। हर सच हलाल नहीं होता। 

ख़ुलासा यह है कि ग़ीबत एक गुनाह है, बुहतान दो गुनाह। 

और-एक रिवा-यत में है के "जब तू अपने भाई का वह ऐब बयान करे जो उसमें है, तो तूने उसकी ग़ीबत की। और अगर तू वह कहे जो उसने न किया हो, तो तूने उस पर बुहतान लगाया।"  
(मिरातुल मनाजिह, जिल्द-ए-शाशम)  
ख़ुलासा-ए-कलाम यह है कि ग़ीबत निहायत बुरी है और यह जहन्नम की तरफ़ ले जाने वाला फ़ेल (काम) है। इससे घर का घर तबाह व बर्बाद हो जाता है। लिहाज़ा, इससे बचना अज़-हद ज़रूरी है। आज का यह अलमिया (दुखद पहलू) है कि जहाँ कुछ लोग इकट्ठा हो गए, वहाँ दूसरों की ग़ीबत शुरू हो जाती है। होना तो यह चाहिए कि अज़-कार-ए-ख़ैर (अच्छे काम) के ज़रिए दुनिया व आख़िरत रोशन करें, मगर आख़िरत को भूल कर सब कुछ दुनिया ही को समझने वाले दुनियादार इस फ़ेल-ए-क़बीह (बुरे काम) में मग्न हैं। मआज़ अल्लाह! अफ़सोस मज़ीद (और ज़्यादा) उस वक़्त होता है, जब अहल-ए-इल्म भी इस गुनाह-ए-अज़ीम (बड़े गुनाह) में मुलव्विस पाए जाते हैं। 

एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें

please do not enter any spam link in the comment box.