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Dushman ko maaf karna: islam mein maafi और रहम की अहमियत - सुमामा बिन असाल का वाक़िया

दुश्मन को माफ़ करने की ताक़त

इस्लाम एक ऐसा दीन है जो न सिर्फ़ इंसान को अख़लाकी बुलंदियों पर पहुंचाता है, बल्कि उसे दुश्मन के साथ भी इंसाफ और रहम का सलूक करना सिखाता है। यह वाकिया सुमामा बिन असाल का है, जो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दुश्मन था, लेकिन आप सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के अफ़्व (माफ़ी) और रहम ने उसके दिल को इस्लाम की रोशनी से मुनव्वर कर दिया। इस वाकिया से हमें यह सबक़ मिलता है कि ताक़त होने के बावजूद माफ़ करना और दरगुज़र करना कितना बड़ा काम है।

सुमामा बिन असाल का वाकिया 

इंतिकाम की क़ुदरत होने और इस्तताअत रखने के बावजूद दुश्मन को माफ़ कर देना बहुत बड़ी बुलंद हिम्मत का काम है। सहीह बुख़ारी में है कि सुमामा बिन असाल जो अहल-ए-यमामा का सरदार था, रसूल करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शहीद करना चाहता था। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सवारों का एक दस्ता नज्द की तरफ भेजा कि वह सुमामा बिन असाल को पकड़कर लाएं। सहाबा-ए-किराम उसे गिरफ्तार करके ले आए और उसे मस्जिद के स्तंभ से बांध दिया। इस पर कोई तशद्दुद या सख़्ती नहीं की गई। नबी करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके पास तशरीफ लाए और फरमाया: "सुमामा, क्या कहते हो?" सुमामा ने कहा: या मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, अगर मुझे क़त्ल करेंगे तो एक ख़ूनी को क़त्ल करेंगे। अगर एहसान फरमाएंगे तो एहसानमंद और शुक्रगुज़ार होंगा। अगर माल (ज़र) चाहते हैं तो जितना मांगेंगे, पेश करूंगा।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का रहम और अफ़्व

नबी करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह सुनकर कोई जवाब नहीं दिया। यही गुफ़्तगू लगातार तीन दिन होती रही। तीसरे दिन हुज़ूर रहमतुल्लिल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुमामा को रिहा करने का हुक्म फरमाया। 

इस्लाम की रोशनी से दिल का मुनव्वर होना

नबी रहमत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह इनायत देखकर उसने एक पेड़ की आड़ में ग़ुस्ल किया और मस्जिद में आकर कलमा-ए-शहादत पढ़ लिया। वह शख़्स जो दीन-ए-इस्लाम, शहर मदीना मुनव्वरा, और इस्म-ए-मुबारक मुहम्मद मुस्तफा करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुरा समझता था, निगाह-ए-मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अफ़्व व दरगुज़र के नूर से उसका दिल ऐसा मुनव्वर हुआ कि वह बोल उठा: "इस वक़्त अगर कोई मक़बूलतरीन नाम है तो वह नाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है, और अगर कोई दीन प्यारा है तो वह इस्लाम है, और अगर कोई शहर प्यारा है तो शहर मदीना मुनव्वरा है।" आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इंतिकाम की क़ुदरत के बावजूद माफ़ फरमा दिया। सब्र, बर्दाश्त, तहम्मुल, और अफ़्व व दरगुज़र बड़ी हिम्मत और अख़लाकी बहादुरी के काम हैं। मुसलमानों को इस पर अमल करने की दावत दी गई है। 
وَلِيَعْفُوا وَلْيَصْفَحُوا أَلَا تُحِبُّونَ أَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (सूरह अन-नूर:22) तर्जमा: और चाहिए कि माफ़ करें और दरगुज़र करें। क्या तुम यह पसंद नहीं करते कि अल्लाह तुम्हारी बख़्शिश फरमाए? और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है।  

आज के दौर में माफ़ी और दरगुज़र की अहमियत

आज शक की बुनियाद पर मुख़ालिफ़ को क़त्ल कर दिया जा ता है या फिर बेहद ख़ौफ़नाक अंदाज़ में एज़ा पहुंचाई जाती है, जैसे यहूद व नसारा कर रहे हैं। और बेन-अल-अक़्वामी तशद्दुद और ज़ुल्म व बर्बरियत की लहर कुछ कलमा पढ़ने वालों पर भी असरअंदाज़ हो रही है। कई लोग इस्लाम के दावी होने के बावजूद अपने भाई-बंदों को ख़ौफ़नाक तशद्दुद का शिकार बना रहे हैं। बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमें नबी करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुक़द्दस, पाक, तैय्यब और ताहिर ज़िंदगी को अपने लिए नमूना बनाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
इस वाकिया में हमने पढ़ा कि कैसे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दुश्मन सुमामा बिन असाल को माफ़ करके उसे इस्लाम की राह पर ला दिया। इस  वाकिया से हमें सबक़ मिलता है कि ताक़त होने के बावजूद माफ़ करना और दरगुज़र करना बुलंद हिम्मत और अख़लाकी बहादुरी का काम है। आज के दौर में जहां शक और नफ़रत की बुनियाद पर लोगों को एज़ा दी जाती है,इस्लाम हमें माफ़ी और रहम का पैग़ाम देता है। अल्लाह हमें भी नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरह अफ़्व व दरगुज़र करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

आख़िरी दुआ:

ऐ अल्लाह! हमें नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाक ज़िंदगी को अपने लिए नमूना बनाने की तौफ़ीक़ अता फरमा। हमें माफ़ करने और दरगुज़र करने की हिम्मत अता फरमा। आमीन।
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