तीन अहम मसाइल का शरई हुक्म
अस्सलामु अलैकुम:
इस्लाम एक मुकम्मल ज़िंदगी का निज़ाम है जो हर छोटे-बड़े मसले का हल क़ुरआन और हदीस की रोशनी में पेश करता है। कुछ लोगों के ज़हन में अक्सर इन मसाइल पर सवालात उठते हैं, जैसे अज़ान के दौरान अँगूठा चूमने का अमल, अज़ान-ए-सानी की सही जगह और "हय्या अलस्सलाह" व "हय्या अलफलाह" पर खड़े होने का मसला।
इस मज़मून में इन तमाम सवालात के जवाब क़ुरआन व हदीस की रौशनी में पेश किए गए हैं, ताकि मुसलमान सही रहनुमाई हासिल करके अपने आमाल को शरई उसूलों के मुताबिक़ अदा कर सकें।
मसला:
क्या फरमाते हैं मुफ्तियाने किराम इस मसले के बारे में:
1. अंगूठा चूमने का सबूत क़ुरआन और हदीस की रोशनी में?
2. अज़ाने सानी कहाँ से देनी चाहिए, क़ुरआन और हदीस की रोशनी में?
3. "حی على الصلاة" और "حی علی الفلاح" पर कब खड़ा होना चाहिए, क़ुरआन और हदीस की रोशनी में?
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
जवाब:
1. रसूल ए पाक सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के नाम ए मुकद्दस को सुनने और अपनी ज़बान से लेने पर अंगूठे को आँखों से लगाकर चूमना न केवल जायज़ बल्कि मुस्तहसन अमल है। चुनांचे "सलाते मसऊदी" बांगे नमाज़ के बाब में है:
रिवायत है नबी सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम से कि आपने फरमाया: "जो शख़्स अज़ान में मेरा नाम सुने और अपने अंगूठों को अपनी आँखों पर रखे, मैं उसे क़यामत की सफ़ों में तलाश करूँगा और उसे जन्नत तक ले जाऊँगा।" (सलाते मसऊदी, जिल्द 2, सफा 350)
और "फतावा रिज़विया" में फतावा जमाल बिन अब्दुल्लाह बिन उमर मक्की के हवाले से है:
"अज़ान में आपके नाम का ज़िक्र होने पर अंगूठों को चूमना और उन्हें आँखों पर रखना जायज़ है, बल्कि मुस्तहब है। हमारे मशाइख ने इसकी तस्दीक़ की है।" (जदीद 5/436, लाहौर प्रिंट)
मालूम हुआ कि अंगूठा चूमने का सबूत खुद हदीस के अल्फ़ाज़ से है। इसका इन्कार वही करता है जो नबी पाक सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम से दुश्मनी रखता है। अल्लाह तआला ईमान वालों को बाग़ियाने मुस्तफा सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम और शैतान के मक्र और फरेब से बचाए।
2. जुमा की अज़ाने सानी हो या पंजगाना नमाज़ों की अज़ान, हर एक मस्जिद के बाहरी हिस्से में दी जानी चाहिए। सुनने अबू दाऊद शरीफ़ की हदीस है:
हज़रत साइब बिन यज़ीद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम जब जुमा के दिन मिंबर पर तशरीफ़ फरमाते तो आपके सामने मस्जिद-के दरवाज़े-पर अज़ान दी जाती थी, और यूँ ही हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हुमा के ज़माने में भी मस्जिद-के दरवाज़े-पर अज़ान दी जाती थी। (सुनन अबू दाऊद, जिल्द 1, सफा 155)
हज़रत अल्लामा सुलेमान जमल रज़ियल्लाहु अन्हु "اذا نودی للصلوة" की तफ़्सीर में लिखते हैं:
"जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम मिंबर पर तशरीफ़ फरमाते तो मस्जिद के दरवाज़े पर अज़ान कही जाती थी।" (तफ़्सीर जमल शरीफ़, जिल्द 4, सफा 234)
मालूम हुआ कि अज़ान मस्जिद की हद से बाहर देना सुन्नत और मशरू है, जबकि मस्जिद के अंदर अज़ान देना महज़ बिदअत है। वल्लाहु तआला आलम।
3. जब इमाम और मुक़्तदी दोनों मस्जिद में मौजूद हों, तो जब मुअज़्ज़िन "حی على الصلاة" कहे तब लोग नमाज़ के लिए उठें और "حی علی الفلاح" पर पूरी तरह खड़े हो जाएँ।
हदीस और फ़िक़्ह की ज़्यादातर किताबों से यह ज़ाहिर और साबित है। चुनांचे "मुसन्नफ इब्ने अब्दुर्रज़्ज़ाक़" में है:
हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम हुजरा ए मुबारक में तशरीफ़ फरमा थे। और मुअज़्ज़िन के कलमाते अज़ान का जवाब इसी तरह दिया जैसा के वह कहता था और जब मुअज़्ज़िन ने "حی على الصلاة" कहा तो आप नमाज़ के लिए खड़े हो गए। (मुसन्नफ इब्ने अब्दुर्रज़्ज़ाक़, जिल्द 1, सफा 481, हदीस नंबर 1851)
और "अल-बहरुज़्ख़ार" (मसनदे बज़्ज़ार) और "सुनने बयहक़ी" में है:
हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु जब "قد قامت الصلاة" कहते तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तकबीर के साथ खड़े हो जाते थे। (सुनन कुबरा लिल-बयहक़ी, जिल्द 2, जिल्द 35, हदीस नंबर 2297)
मालूम हुआ कि तकबीर के वक़्त शुरू में ही खड़ा हो जाना सुन्नते रसूल सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के खिलाफ़ है, और "حی على الصلاة" पर नमाज़ के लिए उठना जायज़, सुन्नत और मतलूब अमल है। वल्लाहु तआला आलम।
नतीजा खुलासा:
इस मज़मून में पेश किए गए तीन अहम मसाइल क़ुरआन व हदीस की रोशनी में बारीकी से बयान किए गए हैं। इनका नतीजा यह है:
1. अंगूठा चूमने का मसला: नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम ए मुबारक पर अंगूठा चूमना जायज़ और मुस्तहसन अमल है। यह हदीस से साबित है और इस अमल का मकसद अदब और मोहब्बत का इज़हार है।
2. अज़ान-ए-सानी की जगह: जुमा और पांच वक्त की अज़ान मस्जिद के बाहरी हिस्से में दी जानी चाहिए। यह सुन्नत-ए-रसूल और सहाबा ए किराम के अमल से साबित है। मस्जिद के अंदर अज़ान देना बिदअत है।
3. "حی على الصلاة" पर खड़े होने का मसला: "حی على الصلاة" के वक्त खड़ा होना सुन्नत और दुरुस्त है, जबकि तकबीर के शुरू में खड़े होना सुन्नत के खिलाफ़ है।
इन मसाइल का सही हल क़ुरआन, हदीस और फुक़्हा की तशरीहात की रोशनी में पेश किया गया है। मुसलमानों के लिए यह रहनुमाई का ज़रिया है ताकि वे अपने आमाल को शरई उसूलों के मुताबिक अदा कर सकें। अल्लाह तआला हम सबको सही राह पर चलने की तौफीक़ अता फरमाए। आमीन।
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