अस्सलामु अलैकुम दोस्तों : इस पोस्ट में आप कुछ ज़िक्र अज़कार पढ़ेंगे के जिसको पढ़ने से ढेरों सवाब मिलेगा, और में उम्मीद करता हूं के इसे आपको ज़रूर फायदा होगा।
बाद नमाज़ आयतुल कुरसी का विर्द।
हुज़ूर नबी करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम का इरशाद मुबारक है, जो शख्स बाद हर नमाज़ के आयतुल कुरसी पढ़े तो उसे मौत के सिवा कोई चीज़ जन्नत के दाखले से न रोकेगी, (यानी मरते ही वह जन्नत में जाएगा, कयामत से पहले रूहानी तौर पर बाद कयामत जिस्मानी तोर पर) और जो बिस्तर पर लेटते वक्त इसे पढ़ ले तो अल्लाह तआला उसके घर और उसके पड़ोसी के घर और आसपास के घर वालों पर अमन देगा, ( यानी इसकी बरकत से सारे मोहल्ले में चोरी आग लगने मकान गिर जाने बल्के सारी नागहानी आफतों से सुबह तक अमन रहेगा) यह अमल बहुत मुजर्रब है।
समंदर की झाग के बराबर गुनाह मुआफ
हज़रत अबू हुरैरा फरमाते हैं हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया, जो कोई फजर की नमाज़ के बाद सौ बार “सुब्हानअल्लाह” कहे और सौ बार “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहे उसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे अगर्चे समंदर की झाग के बराबर हों। (निसाईं/कंज़ुल उम्माल)
हज़ार नेकियां
हजरत सअद बिन अबी वक़ास रदी अल्लाहु अन्हु से रिवयात है फरमाते हैं हम रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जनाब में हाज़िर थे कि आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया, कहा तुम में से कोई इससे आजिज़ है के रोज़ाना एक हज़ार नेकियां कर लिया करे, हम नशीनों में से किसी ने अर्ज़ किया के कोई रोज़ाना हज़ार नेकियां कैसे कर सकता है, फरमाया एक सौ दफा “सुब्हानअल्लाह” पढ़ लिया करे उसके लिए हज़ार नेकियां लिखी जाएंगी और उसकी हज़ार खताएं माफ की जाएंगी।
सुब्हानअल्लाह पढ़ने में कितनी फज़ीलत है के सौ बार पढ़ने से न सिर्फ यह के हज़ार नेकियां हासिल होंगी बल्कि हज़ार बुराइयां भी मिट जाएंगी (ख़ताएं माफ होंगी)
सवाब में वज़नी कलमात
हज़रत अबू हुरैरा फरमाते हैं नबी अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया दो कल्मे ज़बान पर हल्के हैं मगर तराज़ू में वज़नी हैं (भारी हैं ) और रहमान को प्यारे हैं यानी “सुब्हानल्लाहि वबिहम्दिही, सुब्हानल्लाहिल अज़ीम” (मिश्कात) यह दोनों कलमात ज़बान पर बहुत आसान हैं मगर कल कयामत में इनका वज़न बहुत ज़्यादा होगा, क्योंकि हमारे काम से रब्बे ज़ुल जलाल का नाम वज़नी है फिर खूबी यह है की रब्बे कायनात को यह कलमात प्यारे हैं और जो इनका विर्द करेगा, वह भी प्यारा होगा उसकी ज़बान भी प्यारी होगी।
ला इलाहा इल्लल्लाह वाला पलड़ा भारी
हजरत अबू सईद खुदरी फरमाते हैं हुज़ूर आक़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया ए मेरे रब मुझे वह चीज़ सिखा जिससे तुझे याद किया करूं जिसके ज़रिए तुझसे दुआ करूं, रब ने फरमाया ए मूसा कह “ला इलाहा इल्लल्लाह” फिर अर्ज़ किया या रब ये तो सारे बंदे ही कहते हैं मैं तो कोई ऐसी खास चीज़ चाहता हूं जिससे तू मुझे खास करे, तो रब्बे ज़ुल जलाल ने फरमाया ए मूसा (अलैहिस्सलाम) अगर सातों आसमान और मेरे सिवा इनकी आबादी और सातों ज़मींनें एक पलड़े में रख दी जाएं और “ला इलाहा इल्लल्लाह” दूसरे पलड़े में, तो इन सब पर “ला इलाहा इल्लल्लाह” भारी होगा। (मिश्कात)
सुब्हानअल्लाह ला इलाहा इल्लल्लाह का वज़ीफा तमाम वज़ाइफ से आला और बेहतर वज़ीफा है, क्योंकि रब्बे कायनात का इस्म पाक मखलूक से अफज़ल और बेहतर है।
उंगलियां बोलेंगी
हजरत यसीरा रदीअल्लाहु अन्हा से रिवायत है, यह मुहाजीरात में से हैं, फरमाती हैं, हमें नबी अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फरमाया, ए बीबियों, तस्वीह व तहलील और रब्बे कायनात की पाकी बोलने को लाज़िम कर लो, उंगलियों पर गिना करो, के उंगलियों से सवाल होगा, उन्हें गोयाई बख्शी जाएगी, और कभी गाफ़िल ना होना वरना तुम रहमत से भुला दी जाओगी, (मिश्कात)
इससे मालूम हुआ उंगलियों पर तस्बीहात वगैरह को शुमार करना बहुत खूब है, आज़ा को अच्छे काम लगाना चाहिए, यह हमारे हक में गवाही देंगे।
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