qtESQxAhs26FSwGBuHHczRGOCdrb3Uf78NjGuILK
Bookmark

Sare Jahan ke लिए रहमत

मुहब्बत ए नब्वी और मुहब्बत के तकाज़े।

तर्जमा: हमने तुम्हें न भेजा, मगर रहमत सारे जहां के लिए।


हुज़ूर सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की आलमगीर रहमत 

दोस्तों: हमारे प्यारे आका सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम का इस्म मुबारक किस कदर प्यारा है, यूं तो नाम बहुत हैं, लेकिन नामे पाके मुस्तफा की शान ही अलग है, ऐसा चमकता दमकता नाम, के पहले इस नाम से कोई मोसूम नहीं हुआ, आसमानों पर आपका नाम मुकद्दस अहमद है, और ज़मीन पर आपका इस्म मुबारक मुहम्मद है, जैसे आपका नाम मुबारक बे मिसाल व बे नज़ीर है, इसी तरह आपकी शान मुबारक भी इंतेहाई बलंद व बाला है।

रब तआला ने अपना तआरूफ पेश फरमाया, और अपनी शनाख्त ब्यान फरमाई, तो इरशाद फरमाया।

तर्जमा: खूबियां अल्लाह को जो मालिक सारे जहां वालों का।

और अपने प्यारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम के बारे में इरशाद फरमाया: 

तर्जमा: हमने तुम्हें न भेजा, मगर रहमत सारे जहां के लिए।

यानी हमने आपको सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा।

सुब्हान अल्लाह: आलम कितने हैं, इसका इल्म हक़ीक़ी तो रब तआला ही को है, हम और आप तो यही जानते हैं के एक आलमे दुनिया है और एक आलमे आख़िरत, लेकिन इन दो के अलावा भी बहुत से आलम हैं, जैसे आलमे नासूत, आलमे लाहूत, और ना जाने कितने आलम हैं, सितारों के आगे जहां और भी है।अल्लाह तआला तमाम आलमों की परवरिश फरमाने वाला है।

आलम किसे कहते हैं। 

अल्लाह के सिवा जितने हैं, वह सब आलम में दाखिल हैं, ज़मीन, आसमान, चांद, सूरज, तारे, दरिया, पहाड़, आबशार, सहरा, वादियां, इंसान, हैवान, नबातात, जमादात, सब आलम में दाखिल हैं, ज़मीनी मखलूक हो या आसमानी मखलूक हो, सब आलम में दाखिल हैं, अल्लाह तआला हर एक का रब है, सबका रब वही है, सबका पालने वाला वही है, ज़मीनी मखलूक हो या आसमानी मखलूक, सारी मखलूकात को पालने वाला वही है, क्या रब तआला के अलावा भी कोई परवरदिगार है? हरगिज़ नहीं, ऐसा तसव्वुर और मामूली सा ख्याल भी दिल में लाना के अल्लाह के सिवा कोई और पालने वाला है, यह कुफ्र है, अल्लाह तआला ही पालने वाला है, और तमाम आलमों का पालने वाला है, एक आलम नहीं, तमाम आलमों का पालने वाला है। 

पहाड़ पर उगने वाले पौदे हैं तो उसका रब भी अल्लाह ही है, वही ग़िज़ा दे रहा है, और समंदर की तह में रहने वाली मछलियां हैं, उसको भी गिज़ा वही पहुंचा रहा है, ज़मीन के ऊपर चलने वालों के लिए तो अल्लाह ने खुद इरशाद फरमाया:

तर्जमा: और ज़मीन पर चलने वाला कोई ऐसा नहीं, जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मा ए करम पर न हो।

ज़मीन पर कोई चलने वाला ऐसा नहीं के जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मा ए करम पर न हो, अल्लाह तआला ने अपने रहमो करम से मखलूक की रोज़ी और रिज़्क़ का मामला अपने ज़िम्मा ए करम पर ले लिया है, सबको रिज़्क़ और गिज़ा देने वाला वही है। हां , किसी को कम रिज़्क़ मिलता है, और किसी को ज़्यादा मिलता है, यह रब तआला की मशिय्यत है, किसी को इतना ज़्यादा अता फरमाता है के, इंसानी अक्लें हैरान रह जाती हैं। रब तआला इरशाद फरमाता है,

तर्जुमा: और खुदा जिसे चाहे, बे गिनती दे। 

अल्लाह जिसे चाहता है, बे हिसाब रिज़्क़ अता फरमाता है, अगर किसी को कम रिज़्क़ मिलता है तो, इसमें भी रब तआला की कुछ मसलहत है, खुदावंदी हिकमतो मसलहत का सही इल्म खुदा ए तआला ही को है, अल गर्ज़ सारी काएनात का परवरदिगार अल्लाह ही है, जिसने सारी काएनात की तख़लीक़ फरमाई, रब तआला ने अपने बारे में इरशाद फरमाया

सारी हम्द अल्लाह के लिए जो तमाम जहानों का परवरदीगार है। और अपने प्यारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम के बारे में इरशाद फरमाया

तर्जुमा: हमने तुम्हें न भेजा, मगर रहमत सारे जहां के लिए। यानी हमने आपको सारे जहानों के लिए रहमत ही बनाकर भेजा। मतलब यह है के अल्लाह तआला जिसका रब है, हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम उसके लिए रहमत हैं, और खुदा ए तआला सारी काएनात का रब है, तो हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम सारी काएनात के लिए रहमत हैं। ख्वाह वह ज़मीन की मखलूक हो या आसमान की मखलूक, पहाड़ों पर बसने वाली मखलूक हो या समंदर की तह में रहने वाली मखलूक, मशरिक़ में रहने वाली हो या मगरिब में रहने वाली, शुमाल में रहने वाली हो या जुनूब में रहने वाली, कहीं के रहने वाले हों, किसी मुल्क और मिल्लत के लोग हों, कहीं भी बस्ते हों, कहीं भी रहते हों, उन तमाम के लिए हमारे और आपके आका व मौला हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम रहमत हैं।

आपकी रहमत, रहमते आम्मा है, रहमते ताम्मा है, फिर इसमें किसी तरह का तफावुत और फर्क नहीं है, पैगम्बर आख़िरुज़्ज़मां अलैहिस्सलातु वस्सलाम सबके लिए रहमत हैं, जिस तरह आप मर्दों के लिए रहमत हैं, इसी तरह औरतों के लिए रहमत हैं, जिस तरह इंसानों के लिए रहमत हैं, वैसे ही जानवरों के लिए भी रहमत हैं, जिस तरह आप हैवानों के लिए रहमत हैं, इसी तरह परिंदों के लिए रहमत हैं, जिस तरह ज़मीनी मखलूक के लिए रहमत हैं, इसी तरह आसमानी मखलूक के लिए रहमत हैं, गर्ज़ यह के हर चीज़ आपकी रहमत के साए में ज़िंदगी गुज़ार रही है।

जिस रब की रुबीबियत के दाएरे में, मखलूक पल रही है, इसी तरह अल्लाह-के-रसूल आका व मौला हुज़ूर अहमदे मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की रहमत का साया सबको मुहीत है और तमाम आलम और सारा जहां आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम की रहमत के साए में पल रहा है। 

यह सारे जहां में जो रोशनी नज़र आ रही है, यह सब कुछ मेरे और आपके प्यारे मुस्तफा सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के नाम पाक की बरकत है, किसी कहने वाले ने क्या खूब कहा है, 'जहां रोशन अस्त, अज़ जमाले मुहम्मद', यानी जहान रोशन है जमाले मुहम्मद सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम से।

सरकार की रहमत अपनों के लिए भी रहमत है, और गैरों के लिए भी रहमत है, जो आपको मानते हैं उनके लिए भी आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम रहमत हैं, और जो नहीं मानते हैं, जो आप के मुनकिर हैं उनपर भी आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम  की रहमत बरस रही है, उनको भी अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम की रहमत शामिल है, अब भला सोचिए के ऐसी रहमत वाले आक़ा, ऐसे मेहरबान आक़ा के जिनके बारे में कुरान इरशाद फरमा रहा है के

तर्जुमा: बेशक तुम्हारे पास तशरीफ लाए तुम में से, वह रसूल जिनपर तुम्हारा मशक्कत मैं पड़ना गिरां है, तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले, मुसलमानों पर कमाल मेहरबान।

रब तआला ने बहुत वज़ाहत के साथ आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम  की रहमत व राफ़त का ज़िक्र फरमाया, यह भी ख्याल रहे के आयते मुकद्दसह में जिस तरह हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम की रहमत व मेहरबानी का ज़िक्र है इसी तरह इससे आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम  के मीलाद मुबारक का भी सुबूत फ़राहम होता है, आपकी विलादत मुबारका का तज़किरा भी सुन्नते इलाहिया है। 

मुसलमानों बारहवीं शरीफ में सरकार के मीलाद पाक का ब्यान होता है, हम और आप सरकार का मीलाद नामा पढ़ते हैं, तो उसमें सरकार की विलादत मुबारका का ज़िक्र होता है, तो इस आयते करीमा में आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम की आमद का तज़्किरा फरमाया गया है,

तुम्हारे पास एक रसूल तशरीफ लाए

जो तुम्हीं में से हैं

उनपर तुम्हारा मशक्कत में पड़ना इंतेहाई गिरां है

सुब्हानअल्लाह सुब्हानअल्लाह, देखो कैसी आक़ा की रहमत है, के फरमाया गया के, तुम्हारा मशक्कत में पड़ना, मुसीबत में पड़ना उनपर गिरां है,,

मुसलानों को बे इंतहा चाहने वाले, कमाल के मेहरबान और रहम फरमाने वाले हैं।अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम सारे जहां के लिए रहमत हैं, लेकिन आपकी मेहरबानियां और आप की रहमते ख़ास्सा मुसलमानों के लिए है।

ज़रा सोचो और गौर करो, अगर ऐसे चाहने वाले आक़ा, ऐसी रहमतों वाले आक़ा को हम फरामोश करदें और उनके अहकाम से हम सरताबी करें, उनकी ना फरमानी करें, तो यह किस कदर नादानी की बात है, कितनी बड़ी ना समझी की बात है, अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम की रहमत, रहमते आम्मा है, आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम सारे जहां के लिए बाइसे रहमत हैं लेकिन 

بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُ وَسَفْ رَّحِيمٌ

फरमाकर क़ुरान ए मुकद्दस ने वाज़ेह फरमा दिया के सरकार अपनी उम्मत पर बहुत मेहरबान और इंतेहाई करम फरमाने वाले हैं।

उम्मत के लिए मगफिरत की तलब और दुआ ए नब्वी।

मुसलमानों: हमारे रसूल कैसे मेहरबान हैं, ऐसे मेहरबान हैं के एक मर्तबा हज़रत जिब्राईल अमीन अलैहिस्सलाम बारगाहे रिसालत में हाज़िर आए, और आकर अर्ज़ करने लगे, के या रसूलअल्लाह मैंने फलां नबी की उम्मत को जहन्नम में देखा है, हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने दरयाफ्त फरमाया और, तो जिब्राइल अमीन अलैहिस्सलाम अर्ज़ गुज़ार हुए, के फलां नबी की उम्मत को जहन्नम में देखा है, वह हज़रात अंबिया ए किराम अलैहिमुस्लातु वस्सलाम के नाम लेते रहे, और शुमार कराते रहे, के फलां नबी की उम्मत को जहन्नम में देखा, फलां नबी की उम्मत को जहन्नम में देखा, और यह सब अर्ज़ करने के बाद हज़रत जिब्राईल अमीन खामोश हो गए, क्योंकि बुलबुले सिदरा, मुअल्लिमुल मलाइका, हज़रत जिब्राईल अमीन अलैहिस्सलाम मिज़ाज शनास थे, उन्हें मालूम था के अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम को अपनी उम्मत बहुत प्यारी है, अगर मैंने यह कह दिया के सरकार, में ने आपकी उम्मत को भी जहन्नम में देखा है, तो सरकार मुज़्तरिब व परेशान हो जाएंगे, बेचेन हो जाएंगे, इसलिए यहां आकर हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम की ज़बान पर मोहरे सुकूत लग जाती है। उधर अल्लाह के रसूल मुन्तज़िर हैं, दरयाफ्त फरमाते हैं के, और किसको जहन्नम में आपने देखा, जब सरकार ने बार बार फरमाया तो, बादले ना ख्वास्ता, उन्हें अर्ज़ करना पड़ा के, या रसूलअल्लाह, मैंने आपकी उम्मत को भी जहन्नम में देखा है, हज़रत जिब्राईल अमीन यह अर्ज़ फरमा कर सिदरा की तरफ मुन्तक़िल हो गए, जो आसमानों पर उनका मक़ाम है, इधर अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम मदीने की आबादी के बाहर निकल जाते हैं, और किसी पहाड़ की खोह में जाकर बैठ जाते हैं, और रोने लगते हैं, मुज़्तरिब और बे चेन हो रहे हैं, रो रहे हैं, सहाबा किराम जो आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम के बे हद चाहने वाले, और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम से बे इंतहा मुहब्बत करने वाले थे, जिन का हाल ये था, और उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी तमन्ना और आरज़ू यह थी के, हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम को हमेशा देखते रहें, और उनकी अदाओं को मुलाहिज़ा करते रहें, और उनकी प्यारी प्यारी बातें सुनते रहें, और उनकी सबसे बड़ी आरज़ू और तमन्ना यही होती थी के , रसूलुल्लाह की सुहबत हमें मिलती रहे, सरकार का दीदार हमें होता रहे, और कैसे खुश किस्मत थे वह लोग, जिन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम को ईमान की निगाहों से देखा है, और ईमान पर ही उनकी वफात वाक़े हुई, सहाबी वही कहलाते हैं, जिन्होंने रसूलुल्लाह को ईमान की आंखों से देखा, और ईमान पर उनकी मौत वाक़े हुई। 

अगर सिर्फ देखना काफी होता तो अबू जहल ने भी हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम को देखा था, अबू लहब ने भी देखा था, देखने को तो उत्बा ने भी देखा था, और दूसरे कुफ़्फ़ारो मुशरिकीन ने भी देखा था, लेकिन सहाबा किराम को ईमान की हालत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की ज़ियारत नसीब हुई है, सरकार की खिदमतें उन्होंने की हैं, सरकार की बारगाह में हाज़िर हो कर उनकी प्यारी प्यारी बातें सुनी हैं, इस बिना पर उनका मर्तबा इतना बड़ा है, इतना बलंद है, के दुनिया भर के तमाम औलिया ए किराम से उनका रुतबा बलंद है, बड़े से बड़ा वली क्यों न हो, लेकिन एक भी सरकार के सहाबी के मर्तबे को नहीं पहुंच सकता, यह ऐज़ाज़ उन्हें हासिल हुआ, और यह इज़्ज़त उन्हें मिली है, तो सिर्फ इस वजह से मिली है, के सहाबा ने ईमान की निगाहों से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की ज़ियारत की है, और ईमान पर ही उनका खात्मा हुआ है,।

सरकार दो आलम सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के आशिकों का हाल तो यह था के वह यह चाहते थे के हर लम्हा सरकार की ज़ियारत हमें होती रहे, सरकार की बार-गाह में हा-ज़िर रहते, उनकी प्यारी प्यारी बातें सुनते और उनकी एक-एक सुन्नत पर अमल करते अगर सरकार ने फरमाया के नमाज़ पढ़ो तो उन्होंने नमाज़ें काइम किं और ऐसी नमाज़ पढ़ी के आज उनकी नमाज़ें मिसाली हैसियत रखती हैं शायद ही ऐसा कोई दुनिया में नमाज़ें पढ़ने वाला होगा जो सहाबा ने पढ़ी हैं सरकार ने अगर फरमाया के रोज़ा रखो तो उन्होंने रोज़े रखे सरकार ने फरमाया ज़कात दो सहाबा ने ज़कात दिए, चुनांचे वक्तन फ़ोक्तन कभी नमाज़ का हुक्म आया, कभी रोज़े का हुक्म आया, कभी हज का हुक्म आया, कभी ज़कात का हुक्म आया, वही की शक्ल में हज़रत जिब्राइल अमीन लेकर हाज़िर होते रहे, और अल्लाह तआला के अहकाम, अल्लाह के पैगाम सरकार की ज़बान से सहाबा तक पहुंचते रहे और सहाबा इस पर फौरन अमल कर लेते।

ताज्जुब होगा आपको के वह मदीना वह मक्का के जहां शराब नोशी का आलम यह था कि लोग रात दिन शराब के नशे में मस्त रहा करते थे, अपने घरों ही में शराब बनाया करते थे, शराब के बड़े-बड़े मटके उनके यहां भरे रहते थे, अहले अरब इस कदर शराब पीने वाले थे, वह ज़माना जाहिलियत में भी शराब पीते थे, और ज़माना जहिलियत के बाद भी, और हुरमते शराब से क़ब्ल शराब पीते थे, और फिर जैसे ही शराब-हराम होने की आयत नाज़िल हुई, और अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने लोगों को बताया कि आज से शराब हराम है, उस दिन से सहाबा ने ऐसी तौबा की के फिर शराब की एक बूंद तक किसी के घर में बाकी ना रही।

बड़े-बड़े मटके मदीना मुनव्वरा की नालियों में उंडेल दिए गए, घरों में शराब थी वह गलियों में उंडेल दी गई, जिनके यहां शराब थी सबको बाहर लाकर डाल दिए, और मदीने की नालियों में और गलियों में शराब ही शराब बहने लगी, नालियों में पानी की जगह शराब बहने लगी, हुज़ूर नबी ए करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम-के चाहने वालों ने इस हुक्म को ऐसा माना के कोई साबित नहीं कर सकता कि एक कतरा शराब भी उनके घरों में हो, या हुक्मे मुमानिअत के बाद उन्होंने एक कतरा शराब पी हो। मालूम हुआ के अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम के मानने वाले और चाहने वाले ऐसे थे, यह ऐसे आशिकाने रसूल थे के दुनिया उनकी मिसाल-पेश नहीं कर-सकती। 

जब सहाबा किराम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के ऐसे चाहने वाले थे, तो बताओ कि अगर थोड़ी देर के लिए उनके महबूब और प्यारे रसूल उनकी निगाहों से गाइब हो जाएं तो उनके दिलों पर क्या गुज़री होगी उनकी बातनी कैफियत का आलम क्या होगा, हुज़ूर सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की खबर सुनकर सारा मदीना बेताब हो गया, मर्द बेचैन हैं औरतें बेचैन हैं के हमारे आका कहां तशरीफ ले गए, हर चहार जानिब लोग तलाश कर रहे हैं, मदीना मुनव्वरा के अतराफ व अकनाफ में लोग मुंतशिर होकर, आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम  को ढूंढ रहे हैं, आबादी के अंदर और आबादी के बाहर हर जगह आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम को तलाश किया जा-रहा है, लेकिन कहीं अल्लाह के रसूल का पता नहीं चल रहा है, जब सारी आबादी छान डाली गई और कहीं भी अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम का पता नहीं चला, तीन दिन इसी फिराक में गुजर गए इसी बेताबी और इज़्तेराब में मदीने की बस्ती में इज़्तेराब छाया हुआ है लोगों ने खाना पीना छोड़ दिया है, अल्लाह-के-रसूल  हुज़ूर नबी-करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम की तलाश जारी है, लेकिन सरकार कहीं नहीं मिल रहे हैं ना ही कहीं से कोई खबर मिल रही है अंजाम कार जब आबादी के अंदर नहीं मिल सके तो फिर सहाबा किराम ने जंगलों का रुख किया और जंगल की तरफ निकल गए, के सरकार कहीं मिल जाएं तलाश करते-करते इत्तेफाक ऐसा हुआ के एक चरवाहे से मुलाक़ात हो गई जो बकरियों को चरा रहा था, उस चरवाहे से किसी ने पूछा के ए चरवाहे तुमने किसी ऐसी शक्लो सूरत का इंसान देखा है के जिसकी पेशानी इतनी बुलंद है जिसकी आंखें ऐसी भली हैं जिनका चेहरा इंतेहाई ज़ेबा है इंतेहाई रोशन व मुतबर्रक है, दरख़्शां है, ऐसे चेहरे वाले को ऐसी दाढ़ी वाले को, ऐसे नक़्श व निगार वाले को, तुमने कहीं देखा है, चरवाहे ने कहा ऐसी तो कोई शख्सियत मैं नहीं देखी लेकिन हां एक अजीब बात में यह देख रहा हूं उस पहाड़ी के ऊपर एक घर के अंदर से रोने की आवाज़ आ रही है, एक रोने वाला हो रहा है, इस अंदाज़ से रो रहा है कि उसके रोने का असर मेरी बकरियों पर पड़ गया है और मेरी बकरियां ने चरना छोड़ दिया है, सहाबा किराम ने समझ लिया कि हो ना हो वह हमारे और आपके आका हुज़ूर अहमदे मुज्तबा मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम हैं सहाबा किराम दौड़ते हुए उस गार की तरफ चले जाते हैं, देखा तो अल्लाह-के-रसूल  सजदा रेज़ हैं और खुदा की बारगाह में रो-रो कर दुआ फरमा रहे हैं

या अल्लाह तू मेरी उम्मत मुझे बख्श दे या अल्लाह तू मेरी उम्मत मुझे बख्श दे,अल्लाह-के-रसूल  अलैहिस्सलातु वस्सलाम बेताब हैं रो रहे हैं गिरिया व ज़ारी फरमा रहे हैं, सहाबा किराम अर्ज़ कर रहे हैं के ए हम सबके आका हमारे मावा व मल्जा सजदे से सर मुबारक उठाइए पूरा मदीना बेचैन है बच्चा-बच्चा बेचैन है हर जवान व बुज़ुर्ग बेकरार है सब लोग आपके फिराक में रो रहे हैं लोगों ने खाना छोड़ दिया है लोगों ने पीना छोड़ दिया है, लेकिन सरकार मसरूफ दुआ हैं आंखों से आंसू जारी हैं और रब्बी हब्ली उम्मती का विर्द ज़बान मुबारक से जारी है। जब सहाबा किराम कामयाब ना हो सके और सरकार की बारगाह में उनकी आजज़ी काम ना आई तो उन्होंने सोचा कि चलो हज़रत बीबी फातिमतुज़्ज़हरा को लेकर आते हैं वह जिगर गोशा ए रसूल हैं वह अपने अब्बा जान से अर्ज़ करेंगीं तो ज़रूर सरकार मान लेंगे, चुनांचे बाज़ सहाबा तशरीफ ले गए और बीबी फातिमा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हा की खिदमत में जाके अर्ज़ किया के ऐसा ऐसा मामला है हज़रत बीबी फातिमा चादर से अपना सर ढक लेती हैं अपना चेहरा ढांप लेतीं हैं और परदे के साथ अपने अब्बा जान की बारगाह मैं हाज़िर-होती हैं और देख कर बेचैन हो जाती हैं मुज़्तरिब हो जाती हैं और कदमों पर सर रख देती हैं और अर्ज़ करतीं हैं के या रसूलअल्लाह अपना सर उठाइए वरना क़यामत से पहले एक क़यामत नमूदार हो जाएगी अपना सर मुबारक उठाइए। जब हज़रत फातिमा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हा ने बहुत ज़्यादा दरख़्वास्त की तब अल्लाह-के-रसूल ने अपना सर मुबारक उठाया और फरमाए, मैं उस वक्त तक सर न उठाता जब तक के एक-एक उम्मती की बख्शिश का सामान न कर लेता। तो ऐसे चाहने वाले आका ऐसी रहमतों वाले आका के जिनके मुताअल्लिक फरमाया गया

मुसलमानों पर कमाल  मेहरबान हैं और मेहरबान ।

हमारे आका मर्दों पर भी मेहरबान हैं औरतों पर भी मेहरबान हैं बच्चों पर भी मेहरबान हैं और बड़ों पर भी मेहरबान हैं सुब्हानअल्लाह सुब्हानअल्लाह हमारे आका ऐसे मेहरबान हैं के जहां मुसीबत के वक्त किसी ने उनको याद किया कोई मुसीबत में उनको पुकारा है तो उसकी सारी मुसीबतों के बादल छट गए हैं ‌।

सहाबी रसूल हज़रत सफीना का ज़िक्र जमील।

हदीस मुबारक में एक वाकिआ है एक मर्तबा मुजाहिदीन इस्लाम का एक लश्कर कहीं जंग में जा रहा था उस लश्कर में सहाबी रसूल हज़रत सफीना रज़ी अल्लाहु अन्हू भी थे इत्तेफाक ऐसा हुआ कि वह रास्ता भटक गए तन्हा रह गए और जंगल में भटकते फिर रहे थे कहीं पता नहीं चल रहा था की काफिला कहां निकल गया कहीं लश्कर का पता नहीं चल रहा था अब हज़रत सफीना परेशान व मुज़्तरिब हैं के किसी सूरत से काफिले का पता चल जाए और अभी इसी तलाश में थे के अचानक ही एक शेर सामने आ गया जंगल का शेर ज़ाहिर है कि अगर जंगल में किसी तन्हा आदमी को शेर मिल जाए तो उसे कितना खौफ होता है कैसी दहशत होती है आदमी की ज़िंदगी खतरे में पड़ जाती है लेकिन हज़रत सफीना जो ग़ुलाम ए रसूल हैं एक आशिक ए रसूल हैं वह घबराते नहीं हैं जब शेर उनके सामने आया तो उन्होंने यह फरमाया

ए शेर में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम का ग़ुलाम हूं। दोस्तों यहां यह बात गौर करने की है और यह तवज्जा देने के लाएक है की हज़रत सफीना को जब नाम लेना था तो अल्लाह का नाम लेते के मैं अल्लाह का बंदा हूं ‘अना अब्दुल्लाही या अबल हारिस’ लेकिन हज़रत सफ़ीना ने अल्लाह तआला का नाम नहीं लिए बल्के रसूलुल्लाह का नाम लिया हालांकि हकीकी मददगार तो रब तआला की ज़ात पाक ही है, आज यह बात बहुत ज़ोरो शोर के साथ उठाई जाती है के मुसीबत के वक्त रब तआला को पुकारना चाहिए, हां एक आशिक ए रसूल को देखो एक सहाबी ए रसूल को देखो वह मुसीबत के वक्त भी अपने प्यारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम  का नाम ले रहे हैं और शेर को मुखातब करके फरमा रहे हैं, मैं हुज़ूर अक़दस नबी आखिरुज़्ज़मां सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम का गुलाम हूं, दर हक़ीक़त यह अकीदत की बात है, यह मोहब्बत की बात है, जब मुसीबत भी आती है तो अपने महबूब का नाम लेना सहाबी की सुन्नत है रब तआला की रहमत से भी उम्मीद है के, अपने प्यारे रसूल का ज़िक्र सुनकर अल्लाह तआला अपना फज़लो  करम फरमाए। एक नुक्ता यहां यह भी है कि जिसने रसूलुल्लाह को मान लिया उसने अल्लाह को मान लिया इस्लाम को भी मान लिया सहाबा को भी मान लिया ताबईन को भी मान लिया तबे ताबईन को भी मान लिया औलिया ए किराम को भी मान लिया इमामे आज़म अबू हनीफा को भी मान लिया उसने गौसे आज़म को भी मान लिया उन्होंने आला हज़रत को भी मान लिया उन्होंने मुफ्ती ए आज़म को भी मान लिया इसीलिए तो आला हज़रत ने फरमाया *उन्हें-जाना उन्हें-माना न रख्खा ग़ैर-से-काम, लिल्ला-हिल-हम्द, मैं दुनिया-से मुसल-मान गया।* सुब्हान अल्लाह सुब्हान अल्लाह, दोस्तों: दुनिया से मुसलमान को उसी वक्त जाना है जब वक्तअजल आ जाए, मुसलमानों उन्हें जानों उन्हें मानों जो वह फरमाएं उसकी तामील में लग जाओ, उन्होंने जो फरमा दिया है वह हक्मे इलाही है उनको दिलो जान से तस्लीम करो, और उनके हर हुक्म के सामने अपना सर न्याज़ को झुका दो, इसी का नाम तस्दीक़ व तस्लीम है, आला हज़रत रहमतुल्लाह  अलैह एक आशिक ए रसूल थे, सच्चे आशिक ए रसूल थे, वह फरमाते हैं के, *उन्हें-जाना उन्हें-माना न रख्खा ग़ैर से काम*, 

यहां पर बहुत से नादान लोग सवाल करते हैं के देखो साहब, यह कह रहे हैं के उन्हें माना, अल्लाह को नहीं माना, उन्हें जाना, अल्लाह को नहीं जाना, न-रखा ग़ैर-से काम, यानी अल्लाह से भी काम ना रखा, मआज़अल्लाह, सहाबा से भी काम नहीं रखा, ताबईन से भी काम नहीं रखा, तबे ताबईन से भी काम नहीं रखा औलिया ए कामेलीन से भी काम नहीं रखा, *उन्हें-जाना उन्हें-माना न रख्खा ग़ैर से काम,* जो लोग ऐसा एतराज़ करते हैं वह नादान हैं वह दीन के हकाइक से ना आशना हैं, मामला वही है जो मैंने अर्ज़ किया के, उनको मान लिया तो, सबको मान लिया, रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम को मानने वाला रब तआला को भी मानने वाला है, रसूलअल्लाह को वही मानेगा जो मज़हबे इस्लाम को मानेगा, और मज़हबे इस्लाम को मान लिया तो, जन्नत व दोज़ख़ भी मान लिया, कयामत व हश्र को भी मान लिया, तमाम अंबिया ए किराम को भी मान लिया। सहाबा व ताबईन को भी मान लिया, औलिया व मुहद्दीसीन को भी मान लिया, गौसो ख्वाजा को भी मान लिया, अल गर्ज़ इस एक रसूल को मान लिया तो सबको मान लिया, इसीलिए इस्लामी कलमा में सिर्फ अल्लाह,और उसके-रसूल के मानने का ज़िक्र आता है, मतलब यह की अल्लाह व रसूल को मान लिया तो सब कुछ मान लिया। और अगर रसूलअल्लाह को नहीं जाना और उनको नहीं माना उन्हें अपने जैसा बशर समझा और उनके मुतअल्लिक़ यह अकीदा रखा के मआज़ल्लाह वह मर कर मिट्टी में मिल गए उनके मुतअल्लिक़ अगर यह बुरा अक़ीदा है के नमाऊज में उनका ख्याल आ जाना मआज़ल्लाह गधे और खच्चर के ख्याल में डूब जाने से बदतर है तो समझ लो की फिर कुछ नहीं माना रसूलअल्लाह को ऐसा मानना है जैसा मानने का हुक्म कुरआन और हदीस-में-आया है इसीलिए आला हज़रत अलैहिर्रहमह ने फरमाया *उन्हें-जाना उन्हें-माना ना रख्खा ग़ैर से काम लिल्लाहिलहम्मद मैं दुनिया-से मुसल-मान गया* ।

दोस्तों मैं यह अर्ज़ कर रहा था के हज़रत सफीना रदी अल्लाहु अन्हू  ने शेर को देख कर यह फरमाया के ऐ शेर में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम का ग़ुलाम हूं ज़रा सोचो के एक हैवान और वह भी दरिंदा जानवर यानी शेर से हज़रत सफीना खिताब फरमा रहे हैं एक दरिंदा जानवर किसी इंसान की ज़बान क्या समझ सकता था लेकिन यहां माजरा ही कुछ अजीब है शेर ने जैसे ही रसूलअल्लाह का नाम सुना तो दुम हिलाता हुआ हज़रत सफीना की बारगाह में हाज़िर-हो गया सुब्हानअल्लाह और फिर आलम यह हुआ के उसने हज़रत सफीना की रहबरी की शेर ने उनको रास्ता दिखाया, अब वह शेर हज़रत सफीना के पीछे-पीछे चल रहा है आगे आगे हज़रत सफीना और पीछे-पीछे शेर रास्ते में चल रहा है नहायत ही मुतानत व संजीदगी और फर्मा बरदारी का मुज़ाहिरा चलते हुए शेर चल रहा है और जब मुसलमानों का काफिला नज़र आता है तो शेर अपना रास्ता बदल लेता है यहां यह बात भी याद रखने की है के हज़रत सफीना का नाम सफीना क्यों पड़ गया, वह खुद बयां फरमाते हैं कि मैं एक मर्तबा सरकार के साथ चला जा रहा था मुजाहिदीन इस्लाम भी थे सहाबा किराम भी थे जब काफिला चलने लगा तो सहाबा किराम के पास सामान ज़्यादा था सहाबा किराम ने अपना सामान सब इकट्ठा करके चादर में बांधा और सारा सामान हज़रत सफीना के सर पर रख दिया यह देखकर हुज़ूर नबी-करीम अलैहिस्सलातु-वस्सलाम ने इरशाद-फरमाया “रखे रहो अपने सर पर इसलिए के तुम सफीना हो”!

दोस्तों: सफीना उस कश्ती को कहा जाता है जो सामान लाद कर ले जाती है हुज़ूर अलैहिस्सलातु-वस्सलाम ने फरमाया के तुम सफीना हो और उसी रोज़ से उनका नाम सफीना पड़ गया हज़रत सफीना बयान फरमाते हैं के सरकार के फरमाने का असर यह हुआ के मेरी ताकत उस रोज़ से इतनी बढ़ गई के एक दो नहीं बल्कि सात ऊंटों का बोझ में अपने सर पर उठा लेता था। 

 हयाते नब्वी और इल्मे गैब 

 हमारे और आपके लिए फिक्रिया है के रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम को मानते हैं जो न मानते ना मानें लेकिन हम तो मानते हैं के अल्लाह-के-रसूल हैं अल्लाह के महबूब हैं अल्लाह के बाद सारी कायनात में सबसे अफज़ल व आला हैं वह अपनी हयाते ज़ाहिरी में जिस तरह जिंदा थे आज भी जिंदा है हम ज़िंदा नबी के मानने वाले हैं वह आज भी अपनी हयाते ज़ाहिरी के साथ इसी तरह ज़िंदा हैं और अल्लाह तआला के फज़्ल से उनको खाने पीने को मिलता है गर्ज़ यह के ज़िंदगी में एक इंसान की जो ज़रूरियात होती हैं वह सब मेरे आका को मुहैय्या हैं रब  तआला ने सारी नेअमतें उन्हें अता फरमा दी हैं अल्लाह-के-रसूल  की शान यह है कि सारी कायनात को इस तरह मुलाहिज़ा फरमा रहे हैं के जैसे राई का दाना हाथ पर देखा जाए आज भी सरकार के इल्म से कोई चीज़ बाहर नहीं है हम और आप यहां ज़िक्रे रसूल कर रहे हैं हमारा ईमान मेरा वजदान कह रहा है के अल्लाह-के-रसूल  यह सब कुछ समाअत फरमा रहे हैं और सरकार करम फरमाएं तो हमारी बख्शिश का सामान बन जाए!

 दोस्तों मालूम हुआ कि हमारा यह अकीदा है और हम लोग यह सब कुछ अकीदा रखते हुए भी कितने अफसोस का मक़ाम है के हम ऐसा मानने वाले हैं इसके बावजूद अल्लाह-के-रसूल  अलैहिस्सलातु वस्सलाम  के फरामीन को नहीं मानते और उनके हुक्म को भूले हुए हैं..!

 आमाले सालेहा की तरगीब.!

 नमाज़ को कहा जाता है तो नमाज़ पांच वक्त की पढ़ना नसीब नहीं होती अल्लाह-के-रसूल  ने रोज़ा रखने का हुक्म इर्शाद फ़रमाया है, तो कितने मुसलमान हैं जो रोज़ा रखते हैं अल्लाह-के-रसूल  ने ज़कात देने का हुक्म दिया तो कितने दौलतमंद हैं जो सही मानो में ज़कात अदा करते हैं कितने अहले सरवत हैं जो हज के लिए जा रहे हैं दोस्तों हम कैसे मानने वाले हैं अल्लाह-के-रसूल  ने फरमाया के दाढियाँ रखो तो कितने लोग दाढ़ी रखने वाले हैं एक अरसा हो गया आज मैं गौर कर रहा था हर महफिल में मैंने निगाह दौड़ाई तो बड़े-बड़े बूढ़े लोग जिन लोगों से मैंने बार-बार कहा है के तुम दाढ़ियां रखो लेकिन आज भी उनके चेहरे दाढ़ियों से साफ दिखाई देते हैं!

दोस्तों दाढ़ी ईमानी निशान है यह गुलामों की शान है दाढ़ी तो ऐसी सुन्नत है के अल्लाह-के-रसूल  ने बार-बार इसकी तरगब फरमाई बारहा इसकी ताकीद फरमाई लेकिन मुसलमान इस सुन्नत से ग़ाफ़िल हैं। मुसलमानों हम रसूलअल्लाह के मानने वाले हैं रसूलअल्लाह के चाहने वाले हैं रसूलअल्लाह की गुलामी का दम भरने वाले हैं हमारा नारा है के गौस का दामन नहीं छोडेंगे यह सब कुछ है लेकिन दाढ़ी रखना हमारे लिए ऐसा मुश्किल काम हो गया और ऐसी शर्म महसूस होती है कि अगर किसी जवान से कहा जाए के दाढ़ी रखो तो उसको शर्म लगती है जवान तो जवान बूढ़े लोग भी नहीं रखते खुदारा ज़रा सोचो के अल्लाह-के-रसूल  अलैहिस्सलातु वस्सलाम की कितनी नाराज़गी तुम मोल लेते हो।

 ज़रा अंदाज़ा लगाओ  के दाढ़ी रसूलुल्लाह की कैसी पसंदीदा सुन्नत है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम के सहाबा में से एक सहाबी ऐसे थे के जिनकी दाढ़ी में सिर्फ एक ही बाल था और सरकार जब उनको देखते तो सरकार के लबों पर तबस्सुम आ जाता आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम खुश होते थे सरकार के लबों पर मुस्कुराहट आ जाती थी, उन्हें यह ख्याल हुआ कि शायद एक बाल होने से, सरकार तबस्सुम फरमाते हैं, उन्होंने एक दिन उस बाल को काट दिया उस बाल को कतर दिया तो बारगाहे रिसालत में हाज़िरी हुई तो, अल्लाह-के-रसूल  ने उनको देखा तो वह बाल नज़र नहीं आ रहा था, अल्लाह-के-रसूल  ने अपना रुख फेर लिया उनके चेहरे की तरफ से मुंह फेर लिया, दोस्तों *दाढ़ी-का एक-बाल* इतनी क़द्र व मंज़िलत रखता है के वह एक बाल रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम को इतना पसंद था कि सरकार उनके चेहरे को देखते तो सरकार के लबहाए मुबारक पर तबस्सुम आ जाया करता था, और जब उन्होंने *दाढ़ी-का एक-बाल* मुंडा दिया तो सरकार ने अपना रुख फेर लिया तो जो लोग बिल्कुल दाढ़ी नहीं रखते हैं अल्लाह-के-रसूल  अलैहिस्सलातु वस्सलाम उस से किस कदर नाराज़ होंगे,! दोस्तों तुम दाढ़ियां रखो और नमाज़ें पढ़ो पाबंदी इख़्तियार करो क्योंकि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम अपनी उम्मत को बहुत चाहने वाले हैं और अपनी उम्मत से बहुत मोहब्बत करने वाले हैं रसूलअल्लाह सल्लल्लाहू सल्लम को अपनी उम्मत कितनी प्यारी है कि हर हर मौके पर सरकार ने उम्मत को याद रखा है सारी ज़िंदगी उम्मत के गम में रोते हुए गुज़ार दी है, लेकिन किस कदर अफसोस का मक़ाम है के मुसलमान अपने रसूल को भूले हुए हैं मर्द भूले हुए हैं औरतें भी रसूलअल्लाह के अहकाम को भूली हुई हैं मौला तबारक व तआला हमें और आपको तौफ़ीक़ अता फरमाए के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की हर एक सुन्नत पर अमल करें, अहकामे शरीअत की पाबन्दी करें,!

मस्तूरात को हिजाब की तरगीब,

दोस्तों आज मुस्लिम औरतें परदे से आज़ाद हो चुकी हैं बड़े घर की औरतें हों या गरीब घर की औरतें, सब बे हिजाब शहरों में, गलियों में, बाज़ारों में, बसों में, ट्रेनों में बे पर्दा नज़र आती हैं खुदारा ज़रा देखो तो क्या आलम हो चुका है क्या यही इस्लाम की तालीम है, अल्लाह-के-रसूल  सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम  की बार-गाह में एक सहाबी ए रसूल आते हैं और आपसे हाज़िर होने की इजाज़त तलब करते हैं वह इजाज़त पाकर आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम के काशाना ए अक़दस में आते हैं वह आंखों से मअज़ूर हैं हज़रत सय्यदा आएशा सिद्दीका रज़िअल्लाहु तआला अन्हा उनसे पर्दा नहीं करती हैं जब वह सहाबी चले जाते हैं तो अल्लाह-के-रसूल   हज़रत आएशा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हा से फरमाया वह आएशा जो रसूलअल्लाह की चाहने वाली बीवी हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु- अलैहि-वसल्लम उनसे मोहब्बत फरमाते हैं थे, उनसे फरमाते हैं के आएशा तुम्हें क्या हो गया के तुमने उनसे पर्दा ना किया, हज़रत आएशा रज़ीअल्लाहु अन्हा फर्मातीं हैं की या रसूलअल्लाह, वह तो नाबीना हैं इस पर सरकार ने जो अल्फ़ाज़ इरशाद फरमाए थे उसका तर्जुमा यह है के, वह नाबीना हैं लेकिन तुम तो अंधी नहीं हो, देखो रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु-अलैही-वसल्लम अपनी प्यारी चाहने वाली बीवी से किस तरह खिताब फरमा रहे हैं और कितनी नाराज़गी का इज़हार फरमा रहे हैं के तुम तो अंधी नहीं हो! 

मुसलमानों, आज का आलम यह है के औरतें ध्यान ही नहीं देतीं के पर्दा भी कोई चीज़ है, क़ुरान मजीद औरतों को पर्दा का हुक्म देते हुए इरशाद फरमा रहा है

तर्जुमा : *और अपने घरों मैं ठहरी रहो, और बे पर्दा ना रहो, जैसे अगली-जाहि-लियत की पर्दगी!*

औरतों को चाहिए के अपने घर में क़रार पकड़ें, अहदे रिसालत में जब तक पर्दा नहीं था, तो औरतें भी मस्जिद आती थीं और जमाअत में भी शरीक होती थीं, और जिस दिन से आयते करीमा नाज़िल हुई, और पर्दे का हुक्म औरतों को दिया गया, तो कोई औरत बे पर्दा नहीं आती थी, वह ज़माना तो खैरुल क़ुरून का ज़माना था, सबसे बेहतरीन ज़माना था, खुद अल्लाह-के-रसूल वहां मौजूद थे, उस ज़माने से लेकर आज तक भी बहुत सी जगहों पर, पर्दा का बहुत अहतेमाम होता है, और आज से दस बीस साल पहले ऐसा पर्दा था के उप्र के इलाकों में कोई औरत आपको दरवाज़े पर नज़र नहीं आती थी, बाहर से आने वाला आदमी, अगर घर के दरवाज़े पर दस्तक देता था, तो अगर उस घर मैं मर्द नहीं है तो जवाब नहीं मिल सकता, जहाँ पर पर्दा है वहां  बि-फ़ज़्लिहि तआला आज भी यही आलम है के वहां आज भी किसी औरत की आवाज़ बाहर नहीं आएगी, पर्दा हो तो ऐसा होना चाहिए, लेकिन बहुत से मक़ामात पर माहौल बदल रहा है, और शर्मो हया का मादह कम होता जा रहा है, हया एक ऐसी चीज़ है के अल्लाह-के-रसूल  ने इरशाद फ़रमाया

तर्जुमा: हया ई-मान की एक-शाख है,! हया ईमान का एक हिस्सा है, मर्द हो या औरत, हर किसी के लिए हया का हुक्म है, मर्दों के लिए हुक्म है के वह गैर औरतों पर निगाह ना डालें, और औरतों के लिए यह हुक्म है के वह गैर मर्दों को ना देखे,! लेकिन आज हालात बदलते जा रहे हैं, आज तो पर्दे की पाबन्दी भी ख़त्म होती जा रही है, हर-हुक्म  को ठुकराया जा-रहा है, हर हुक्म से सरताबी की जा रही है, दुनिया का एक गुलाम अगर अपने आका का फरमांबरदार होतो वो अपने आका का कितना प्यारा होता है,! गुलाम मुख्तलिफ किस्म के होते हैं, एक गुलाम ऐसा होता है जो आका के हर हुक्म को मानता है, और उसके सामने सरे न्याज़ झुका देता है, और हर हुक्म की तामील करता है, वो अपने मालिक-को कितना प्यारा होता है, बिला तशबीह यूंही समझो के अहमदे मुज्तबा मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की गुलामी चाहते हो तो, उनके ऐसे गुलाम बन जाओ के जिसको उन्होंने कहा है उसको मानो और जिससे उन्होंने बाज़ रखा है उससे बाज़ रहो, क्योंकि उनकी शान यह है के कुरान ने फरमाया के जो वह तुम्हें दें तुम-उसे ले-लो, और जिससे बाज़ रखें उससे बाज़ रहो

तर्जुमा: और जो कुछ तुम्हें रसूल अता फरमाएं, वह लो, और जिससे मना फरमाएं, बाज़ रहो,! दोस्तों रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की साहबज़ादी हज़रत बीबी फातिमतुज़्ज़हरा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हा, जिनका अदब व अहतराम हमारे लिए लाज़िम व ज़रूरी है, औरतें भी उनका अदब व अहतराम करती हैं, लेकिन कभी उन्होंने गौर किया, के हज़रत बीबी फातिमतुज़्ज़हरा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हा, का पर्दा कैसा पर्दा था, ऐसा पर्दा था के उनको नंगे सर कभी आसमान ने भी नहीं देखा, सुब्हान अल्लाह,!

 रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की रहमत जहां मर्दों के लिए है वही खास रहमत औरतों के लिए भी है, बल्के औरतों को तो खास एहसान मानना चाहिए के अल्लाह-के-रसूल ने औरतों को एक नई ज़िंदगी अता फरमाई है, वरना ज़माना जाहिलियत का हाल ये था के जब लड़की पैदा होती थी तो उसे पैदा होते ही अरब के लोग ज़िंदा दफन कर दिया करते,! यह कितना बड़ा एहसान है के अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम की तालीम से और सरकार के मना फरमाने से लोग इस हरकत से बाज़ आ गए, अगर यह ना होता तो आज तक यही चला आता के लोग अपनी लड़कियों को ज़िदा दफन कर देते,! 

दोस्तों, औरतों पर बड़ा अहसान है, मेरे नबी करीम सल्लल्लाहु-अलैहि-वसल्लम की ख़ास रहमत है, जहां हमारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम मर्दों के लिए रहमत हैं वहां औरतों के लिए भी रहमत हैं,!

 अल्लाह-के-रसूल  ऐसी रहमत हैं के कैसी ही सख्त मुसीबत का वक्त हो कैसी ही बड़ी परेशानी की नौबत आ जाए जहां या रसूलअल्लाह का नारा लगाया या नबीअल्लाह या हबीबअल्लाह, कहकर पुकारा, अल्लाह-के-रसूल  को सच्चे दिल से याद किया, वैसे ही सारी मुसीबतों के बादल छठ जाते हैं, सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं मुश्किलात ख़तम हो जाती हैं, इसी तरह रसूलअल्लाह के सदके में उनके चाहने वालों को भी यही रिफअत व बुलंदी और यही इज़्ज़त व करामत नसीब हुई के जब उनका नाम लिया जाए और जब उनको पुकारा जाए तो मुसीबतें दूर हो जाती हैं मुश्किलात काफूर हो जाती हैं और परेशानियां आसानियों में बदल जाती हैं,!

 पीराने पीर हुज़ूर गौसे पाक रदीअल्लाहु अन्हु का भी यही हाल है के जहां या गौस अल मदद कहकर पुकारा है, तो मुसीबतें और परेशानियां दूर हो जाती हैं,! दोस्तों तो मालूम हुआ के अल्लाह-के-रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम सरापा रहमत हैं, सब की मुसीबत को टालने वाले हैं, सब की परेशानियों को दूर करने वाले हैं, अल्लाह तआला ने अपने महबूब को अपने खजाने की कुंजियां दे दी हैं, जिसको जो चाहते हैं अता फरमाते हैं, अल्लाह तआला हमें और आपको, अपने आक़ा व मौला का सच्चा वफादार और गुलाम बना दे, औरतें भी सरकार के फरामीन पर अमल करें, और मर्द भी उनके हुक्म की तामील करें, और पांचो वक्त की नमाज़ें पढ़ें, रोज़ा रखें, अपने चेहरे को दाढ़ियों से मुज़य्यन करें, और तमाम शैतानी वस्वसों को दिल से दूर कर दें, अल्लाह और उसके प्यारे रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम के अहकामात पर अमल करें,! 

मसाइब व आलाम के असबाब व इलल,!

आज खौफ ए खुदा दिलों से निकल चुका है न अल्लाह के अहकामात पर अमल किया जा-रहा है न रसूलअल्लाह के अहकामात पर अमल किया जा-रहा है, इसी सबब से आज क़ौमे मुस्लिम मुसीबतों में परेशानियों में मुबतिला हो चुकी है, दुश्मनाने इस्लाम मुसलमानों के खून-के-प्यासे हो चुके हैं हर चहार जानिब से मुसलमानों पर यलगार हो रहा है आज इस्लाम मुखालिफ़ क़ुव्वतें हर तरफ से मुसलमानों को घेरे में ले रही हैं लेकिन मुसलमानों की आँखें नहीं खुल रही हैं अल्लाह और उसके के रसूल के अहकामात पर अमल नहीं करते, मुसीबतों के असबाब तलाश नहीं करते, सिर्फ शिकायत करते हैं क्या मुसलमानों ने कभी सोचा के इन मसाइब व आलाम और मुश्किलात का सबब क्या है, हम क्यों परेशानियों में घिरते चले जा रहे हैं,! दोस्तों: इसका सबब अल्लाह व रसूल की नाफरमानी है, कुरान में इरशाद ए रब्बानी है

तर्जुमा: *और-तुम्हें जो मुसीबत-पहुंची वह इसके सबब से है जो तुम्हारे हाथों ने कमाया,*!

 मुसलमानों आयत करीमा का मफ़हूम यह है के तुम्हारी मुसीबतें तुम्हारे अमल का नतीजा होती हैं, तुम्हें जो कुछ मुसीबत पहुंचती है वह तुम्हारे हाथों की कमाई होती है अल्लाह तआला बहुत से बन्दों को बख्श देता है, बहुत सी खताओं को माफ फरमा देता है इसी तरह बंदगाने इलाही, कभी गिरफ्त में आ भीजाते हैं, तो मालूम हुआ के बहुत सी परेशानियां और मुसीबतें सिर्फ इस वजह से आती हैं के हम अल्लाह व रसूल के फरामीन व इरशादात पर अमल नहीं पैरां हैं और अल्लाह व रसूल की ना फरमानी करते हैं हम सरकार के दिल को दुखाते हैं, मुसलमानों, सरकार की रूठी हुई रहमतों को अगर मनाना चाहते हो और अपनी हालत को सुधारना चाहते हो दुनिया में भलाई और आखिरत में भलाई चाहते हो यहां भी इज़्ज़त चाहते हो और वहां भी वकार चाहते हो तो अल्लाह-के-रसूल  का दामन सच्चाई के साथ पकड़ लो और अपनी हालत इस तरह बना लो के,! 

*उन्हें-जाना उन्हें-माना ना रख्खा ग़ैर-से काम, लिल्ला-हिल-हम्द, मैं दुनिया-से मुसल-मान गया,*!

यह तमाम औलिया ए किराम, ख्वाह वह सहाबा किराम हों, या ताबईन या तबे ताबईन हों, या अइम्मा मुजतहदीन, तमाम औलिया और औलामा, व मुहद्दीसीन, फुक़ाहा, व मुफस्सेरीन, तमाम ने रसूलुल्लाह को माना और जाना है, क्या गौसे आज़म ने नहीं माना, ज़रूर माना है, हुज़ूर गौसे आज़म तो सरकार के नूरे नज़र हैं आले रसूल हैं हसनी व हुसैनी सैय्यद और नजीबुत तरफैन हैं सरकार के खानवादे से ताल्लुक रखते हैं उन्होंने तो अलैहिस्सलातु वस्सलाम को ऐसा माना के आपने खुद फरमाया के मेरा हर कदम रसूलअल्लाह के नक्शे कदम पर है!



एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें

please do not enter any spam link in the comment box.