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Rasool ka Hukm अल्लाह का हुक्म है

 


जिसने रसूल की इताअत की उसने अल्लाह की इताअत की

مَنْ يُطِعِ الرَّسُوْلَ فَقَدْ أَطَاعَ الله به الآية ٨٠ النساء

तर्जुमा: जिसने रसूल का हुक्म माना बेशक उसने अल्लाह का हुक्म माना, 

तफसीर: इस आयत के नाज़िल होने का सबब यह है के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिसने मेरी इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने मुझसे मोहब्बत की तो उसने अल्लाह से मोहब्बत की इस पर बाज़ मुनाफिकीन ने कहा कि यह आदमी यह चाहता है कि जिस तरह  नसारा ने ईसा इब्ने मरियम को रब बना लिया इसी तरह हम भी इसे रब मान लें इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फरमाई के जिसने रसूल के हुक्म देने और मना करने में उनकी इताअत की तो उसने मेरी इताअत की यानी रसूलअल्लाह की इताअत हकीकत में अल्लाह ही की इताअत है और हज़रत हसन ने फरमाया के अल्लाह ने रसूल की इताअत को अपनी इताअत करार दिया है इससे मुस्लिमीन को हुज्जत हासिल होगी 

 हज़रत इमाम शाफई फरमाते हैं के जिन फराइज़ को अल्लाह ने अपनी किताब में फर्ज़ किया है मसलन हज नमाज़ ज़कात तो अगर इनके तअल्लुक से रसूल का बयान ना होता तो हम उन्हें अदा करने का तरीका ही नहीं जान पाते और ना ही हम कोई इबादत अदा कर सकते और जब रसूल इतने बुलंद व बाला मर्तबा पर फाइज़  हैं तो रसूल पाक की इताअत हकीकत में अल्लाह ही की इताअत होगी (खाज़िन जिल्द1,सफा 400)

वज़ाहत: इस आयत में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपनी इताअत व बंदगी को अपने प्यारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत में समेट दिया है और अपनी फरमाबरदारी का मदार अपने महबूब की फरमाबरदारी पर रखा है और एतराज़ करने वाले मुनाफिक़ीन को साकित व शर्मसार करने वाला जवाब अता फरमाते हुए पूरी दुनिया को इस बात पर तम्बिह फरमाया के मेरे महबूब रसूल का कोई भी फरमान कोई भी हुक्म व मना हरगिज़ मेरी मर्ज़ी के खिलाफ नहीं बल्कि उनका हर हक्म व मना मेरा ही हुक्म व मना है और उनकी इताअत व पैरवी रज़ा व खुशनूदी मेरी इताअत व पैरवी रज़ा व ख़ुशनूदी है और उनकी ना फरमानी व हुक्म उदूवली दर हक़ीक़त मेरी ना फरमानी व हुक्म उदूवली है  

 इस मफ़हूम से खूब खूब अयाँ होता है के अल्लाह तआला ने रसूल बा वक़ार को अपना नाइब और खलीफा ए मुतलक़ बनाया है और उन्हें इख़्तियार कामिल दे रखा है के वह जिस तरह चाहें निज़ामे दीन व शरीअत में तसर्रुफ फरमाएं और काएनाते आलम में हर किसी को अपना मुतीअ व फरमाबरदार समझें के वह मेरे महबूब हैं तो जो भी मेरे तहत इताअत हैं सब उनके तहत इताअत हैं बल्कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने रसूल मक़बूल को यह अज़मत व रिफअत बख्शी के आपके बारे में यूं फरमा दिया के जिस किसी ने मेरे महबूब कि इताअत कि उसने हक़ीक़त में मेरी इताअत की, गोया बे इताअते रसूल, अल्लाह तआला की इताअत का तसव्वुर ही नहीं हो सकता चे जाएका उसका वजूद हो, मालूम हुआ के रसूले मुख़्तार, अल्लाह के महबूब व मुज़हिरे अतम हैं, और उन्हें उसकी मिल्कियत में तसर्रुफ व इख़्तियार हासिल है, और उनकी इताअत के बगैर, अल्लाह कि इताअत का सवाल ही नहीं पैदा हो सकता! 

सरकार आला हज़रत फरमाते हैं,

में तो मालिक ही कहुंगा, के हो मालिक के हबीब, 

यानि महबूब व मुहिब में नहीं मेरा तेरा,

साबित हुआ के जुमला फराइज़ फरोअ हैं, 

असलुल उसूल बंदगी उस ताजवर कि है,

यानि में तो रसूल को मालिक ही कहुँगा, क्यूंके आप, मालिके हक़ीक़ी अल्लाह तआला के महबूब हैं, और जो मिलकियत मुहिब कि होती है, वह महबूब कि भी होती है, क्यूंके मुहिब और महबूब में मेरा और तेरा नहीं चलता, बल्के दोनों कि मिलकियत एक ही मानी जाती है,!

और दुसरे शअर में यह बताया के मज़कूरा आयत और तफसील से साबित हुआ के तमाम फराइज़ फरअ और नाइब हैं, असल फर्ज़ और असल बंदगी, कौनैन की शहनशाही का ताज रखने वाले, ताजदारे रसूल बा वक़ार की इताअत व बंदगी है, और उनकी बंदगी के बगैर, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बंदगी नहीं हो सकती!


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