अच्छे रिश्तों की तलाश
हर आदमी जो खुद के निकाह का इरादा रखता हो या अपनी औलाद के निकाह का इरादा रखता हो उस के लिये सब से पहला मरहला मुनासिब रिश्ते की तलाश है और ये पहला मरहला निहायत ही अहम है और इस में काफ़ी सूझ-बूझ और एहतेयात की भी ज़रुरत है इसलिये के आदमी जब चंद घंटों या चंद दिनों के सफ़र पर निकलता है तो उस की ख्वाहिश होती है के उस के पास बैठने वाले लोग मोहज़्ज़ब और बा-अखलाक हों, ताके सफ़र सुकून के साथ गुज़रे, जब चंद दिनों के सफ़र में आदमी की ये ख्वाहिश होती है के हमसफ़र बड़े सुकून और आराम से करे तो फिर ज़िन्दगी भर का हमसफर मुन्तखब करते वक़्त तो इन ज़रूरतों का एहसास और ज़्यादा होना चाहिये, इस लिहाज़ से ये पहला मरहला निहायत ही अहम और मुशकिल है लेकिन रहम फ़रमाने वाले आक़ा अलैहिस्सलाम ने इस मक़ाम पर भी हमारी रहनुमाई फ़रमाई और हमारी इस मुश्किल को आसान फ़रमाते हुए इरशाद फरमाया चार बातों की वजह से औरत से शादी की जाती है माल, हसब व नसब, जमाल (खूबसूरती) और दीनदारी तुम्हारे हाथ खाक आलूद हों तुम दीनदारी को तरजीह दो,!
(बुखारी शरीफ)
इस हदीसे पाक से ये बात वाज़ेह होती है के आक़ा अलैहिस्सलाम ने निकाह के लिए दीनदारी को मेयार करार दिया है।जिस का मतलब ये हुआ के रिश्ता मुनासिब होने के लिये इतना काफ़ी है के अक़ीदे की दुरुस्तगी के साथ शरीफुन्नसब हो और दीन के अहकामात पर अमल करने वाला हो, लेकिन दौरे हाज़िर की परेशानी ये है के अब लोगों ने आक़ा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बनाये हुए मेयार को छोड़ कर अब अपना एक अलग मेयार क़ायम कर लिया है जिस का नतीजा ये है के बाज़ मौके पर बदमज़हबों से भी रिश्तों के मुआमलात तय कर लिये जाते हैं जबके बदमज़हबों से रिश्तों के मुआमलात दुनिया व आखेरत में सख्त नुकसानदेह है। आक़ा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं- जिस ने किसी बदमज़हब की ताज़ीम की उस ने दीने इस्लाम के ढाने पर मदद की। (बैहेकी शरीफ)
ज़ाहिर सी बात है के जब रिश्तों के मुआमलात तय होंगे तो उन की ताज़ीम भी होगी और एहतेराम भी होगा और ये खुद अपने ईमान के लिये नुकसान देने वाला है लेहाज़ा मर्द अपने लिये किसी ऐसी औरत का इन्तेखाब करे जो नेक, पाकबाज़, सलीका शेआर, तालीम याफ़्ता और हुस्ने अख़लाक़ वाली हो और औरत या उसके वालदैन ऐसे लड़के का चुनाव करे जो दीन-पर-अमल करने वाला हो अच्छे अख़लाक़ का मालिक हो तालीम
याफ्ता और समझदार हो ।
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