आमाल में दिखावा और रियाकारी
अस्सलामु अलैकुम इस पोस्ट में आपको दिखावा और रियाकारी के बारे में बताने वाला हूँ ! और आप जान लें के जिस अमल के करने में अगरचे वह अच्छा है अगर दिखावा और रियाकारी शामिल है तो ऐसा अमल अल्लाह की बारगाह में कुबूल नहीं और न ही सवाब मिलेगा और जिस अमल में ख़ुलूस हो अल्लाह की रज़ा मक़सूद हो तो ऐसा अमल मकबूल भी है और इसपर सवाब भी है !
आज के ज़माने में ख़ुलूस रुखसत हो गया है
दोस्तों यह दौर वह दौर है के जिसमें लोगों की इबादात व रियाज़ात से खुलूस रुखसत हो गया है और इसकी जगह दिखावा और रियाकारी ने ले ली है वह इबादात व रियाज़ात जो महज़ अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के लिए होनी चाहिए अब उन में भी रियाकारी की जलवा फरमाइयां हैं लोग रियाकारी के दलदल में इस तरह फंसे हुए हैं के दूर-दूर तक निजात के आसार नज़र नहीं आते चार दिन इबादत करने वाले अपने ज़ुहद के दिखावा में मस्त है उन्हें अपनी इबादतों के आगे ज़माने भर की इबादतें हीच और बेमानी नज़र आती हैं चार दिन नमाज़ क्या पढ़ ली अब लगे मस्जिद के दरवाज़े पर खड़े होकर सारे मोहल्ले की इज़्ज़त उतारने, गोया नमाज़ अल्लाह के लिए अदा नहीं की बल्की मुहल्ले वालों को बद अमल कहकर उनकी तौहीन करने के लिए पढ़ी हो।
दो किताबें क्या पढ़ लेंगे अपने इल्म का लोहा मनवाने और अहले इल्म को नीचा दिखाने, अब इन दो किताबों के मुताअल्लिक जब तक सारे शहर को खबर ना हो जाए के जनाब ने बड़ी जां फिशानी के साथ मुताला किया है और लोगों की ज़बान से जब तक यह ना सुन लें के फलां साहब बड़े इल्म वाले हैं तब तक उन किताबों के रटे हुए सवालात हर शख्स पर दागे जाते रहेंगे खासकर मोहल्ला के इमाम पर, अब हर नमाज़ के बाद इमाम से एक सवाल लाज़िमी होगा जब तक के इमाम की इज़्ज़त की धज्जियां न बिखर जाएं और लोग यह ना बावर कर लें के आं जनाब इमाम साहब से ज़्यादा इल्म वाले हैं, हाजी साहिबान की तो बात ही मत पूछो हज की नियत कम और पिकनिक की ज़्यादा होती है और इस पर सेल्फीयों का सैलाब, घर से निकलते ही सेल्फी, एयरपोर्ट पहुंचते ही सेल्फी, हवाई जहाज पर बैठते ही सेल्फी, और फिर जद्दा, हरम शरीफ, रमी, जिमार, तवाफ ए काबा, सफा मरवह की सई, मुजदल्फा व अरफात के मकामात ही नहीं बल्की ज़ियारते रोज़ा ए रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम के वक्त भी सेल्फी लेना नहीं भूलते, जब के वह ऐसा वक्त है कि उस वक्त एक आशिके रसूल को सिवाए दीदार पुर अनवार के और कुछ नज़र ही नहीं आता मगर आज के सेल्फी हाजी साहब को तो अपनी सेल्फी ही ज़्यादा प्यारी है कि अगर ऐसे वक्त में सेल्फी ना ले सका तो सोशल मीडिया पर स्टेटस क्या अपलोड करेगा लोग कैसे जानेंगे की हाजी साहब फलां जगह गए थे और फिर यही सेल्फी वाले हाजी साहब हज से लौटने के बाद यह चाहते हैं कि सारा ज़माना उनका इस्तकबाल करें उनकी दस्त बोसी करें मज़ीद बरआं अब उनके लिए इमाम के पीछे वाली जगह मुताअय्यन हो जाए अगर कोई उनकी जगह पर बैठ गया तो अब उसकी खैर नहीं ऐसी लाल पीली आंखें दिखाएंगे कि अगर ना हटे तो ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।
बात हो सेल्फी की और हमारी माएं और बहनों का तज़किरा ना हो तो यह सेल्फी के साथ ना इंसाफी होगी उन्होंने तो हद कर रखी है हाथ में तस्बीह और मुंह बनाकर सेल्फी मुसल्ला बिछाया नमाज़ पढ़ने से पहले भी सेल्फी और बाद में भी सेल्फी ताकि दुनिया देख ले के हां आज उन्होंने नमाज़ अदा की है नीज़ एक बड़ी परेशानी ये भी है के आजकल महज़ दिखावा के चक्कर में गरीब और मुतावस्सत लोग दूसरों से अपनी हैसियत छुपाने के चक्कर में बेजा दिखावा करते हैं और बहुत सारे काम दिखावा के लिए अपनी हैसियत से तजावुज़ करके करते हैं मसलन शादी ब्याह के वक्त पैसे ना होने के बावजूद क़र्ज़ लेकर वह सब कुछ करते हैं जो मोहल्ले के अमीर आदमी ने किया हो इसी तरह किसी के घर मय्यत होने पर भी क़र्ज़ लेकर तीजा चालीसवां वगैरा बड़ी धूमधाम से करते हैं यह दिखावा सिर्फ इसलिए किया जाता है कि लोग क्या कहेंगे और अगर कोई शख्स खाना ना खाए तो ज़बरदस्ती करते हैं ना खाने पर कहते हैं कि हम गरीब हैं इसलिए हमारे यहां कोई नहीं खाता यह अजीब रिवाज पड़ गया है जबकि क़र्ज़ लेकर ऐसे आलम में खाना और खिलाना दोनों मज़मूम है इसी तरह पैसा ना होते हुए भी मकान की आसाइश और ज़ेबाइश पर पुर तकल्लुफ खर्च किया जाता है यह सारी फुज़ूल खर्चियां हमारी ज़िन्दगी को मुश्किल से मुश्किल तर बनाती जा रही हैं बड़ा बुरा हाल है हर तरफ दिखावा और रियाकारी का बोलबाला है जो इबादतें अपने रब को राज़ी करने का एक सबसे बेहतरीन जरिया है उन्हें हमारे दिखावा और रियाकारी ने रब्बे कायनात की नाराज़गी का ताना-बाना बना दिया है।
रियाकरी की हकीकत कुरान के आईने में
दोस्तों अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में वही इबादात काबिले कबूल होगी जिनकी बुनियाद खुलूस व लिल्लाहिय्यत पर होगी और उन इबादात की कोई अहमियत नहीं, जो रज़ा ए इलाही के बजाय किसी और को दिखाने और खुश करने के लिए की गई हो ऐसी इबादतों में जो मशक्कतें बर्दाश्त कीं और जो माल व ज़र खर्च किया वह सब के सब न यह के बर्बाद हैं बल्कि उनकी मिसाल अल्लाह तआला ने कुराने मुकद्दस में कुछ इस अंदाज से बयान फरमाई है सुने और वक्त रहते होश के नाखून लें!
ए ईमान वालों, अपने सदके बातिल ना कर दो एहसान रख कर और ईज़ा देकर उसकी तरह जो अपना माल लोगों के दिखावे के लिए खर्च करे और अल्लाह और कयामत पर-ईमान न-लाए, तो उसकी कहावत ऐसी है जैसे एक चट्टान के उस पर मिट्टी है अब उस पर ज़ोर का पानी पड़ा जिसने उसे निरा पत्थर कर छोड़ा अपनी कमाई से किसी चीज़ पर काबू न पाएंगे और अल्लाह काफिरों को राह नहीं देता, (सूरह बकरा)
दोस्तों देखा आपने जो शख्स दिखावा के लिए माल खर्च करता है उसकी मिसाल कुरान ए मुकद्दस में ऐसी है जैसे किसी पत्थर पर धूल जमी हो और बारिश आते ही जब वह धूल हट जाए तो वह पत्थर साफ हो जाए, ऐसी ही दिखावा की खातिर अमल करने वाला यह ख्याल करेगा कि उसने बड़े नेक आमाल किए हैं मगर जब उस पर रियाकारी और दिखावा की बारिश पड़ेगी तो वह देखेगा के यहां तो कुछ भी बाकी नहीं।
अदम खूलूस का बवाल अहादीसे मुबारका में
अब आईए इसी तनाज़ुर में सरवरे कायनात फखरे मौजूदात आक़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम का फरमान आलीशान भी सुनते चले आका अलैहिस्सलातु वस्सलाम फरमाते हैं
तर्जुमा: बेशक आमाल का मदार नियतों पर है और हर अमल का नतीजा हर इंसान को उसकी नीयत के मुताबिक ही मिलेगा पस जिसकी हिजरत (तरके वतन) दौलते दुनिया हासिल-करने के-लिए हो या किसी औरत से शादी की गर्ज़ हो पस उसकी हिजरत उन्हीं चीज़ों के लिए होगी जिनके हासिल करने की नियत से उसने हिजरत की है।
दोस्तों देखा आपने आमाल पर जो सवाब मिलता है वह सिद्के नियत की बुनियाद पर मिलता है और वही मिलता है जिसकी नियत की है तो अगर नियत अल्लाह की रज़ा हासिल करने की है तब तो अल्लाह की बारगाह में उसकी कदरो कीमत है और अगर दिखावा के-लिए किया-गया है तो जान लो के जो काम दिखावा के लिए किया जाए वह काम किसी काम का नहीं।
एक नज़र इस हदीसे मुबारका पर भी डालते चलें
हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम से पूछा गया एक आदमी इज़हार शुजाअत बहादुरी के लिए लड़ता है दूसरा हमियत की वजह से लड़ता है तीसरा रियाकारी के लिए लड़ता है उनमें से अल्लाह के रास्ते में कौन है आपने फरमाया जो शख्स अल्लाह के कलमा की सर बुलंदी के लिए जिहाद करें वह अल्लाह के रास्ते में है।
दोस्तों दिखावा के लिए नेक काम करने से पहले यह भी सुन लें ताकि अपने आमाल को बद नियती और दिखावा से महफूज़ रख सकें
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि सल्लम ने फरमाया जो रियाकारी करेगा तो अल्लाह तआला कयामत के दिन उसे लोगों के सामने ज़ाहिर कर देगा और जो अल्लाह की इबादत शोहरत के लिए करेगा तो अल्लाह तआला कयामत के दिन उसे रुसवा व ज़लील करेगा एक और हदीस पाक मुलाहिज़ा फरमाएं जो आपकी आंखें खोल देगी
हज़रत अबू हुरैरा रदीअल्लाहू अन्हू ने फरमाया मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुए सुना कयामत के रोज़ सबसे पहला शख्स जिसके खिलाफ फैसला आएगा वह होगा जिसे शहीद कर दिया गया उसे पेश किया जाएगा अल्लाह अज्ज़ व जल्ला उसे-अपनी अता करदा नेअमत की पहचान कराएगा तो वह उसे पहचान लेगा फिर रब्बे कायनात पूछेगा तूने इस नेअमत के शुक्राने में, मेरे लिए क्या-किया वह-कहेगा मैं तेरी राह में लड़ाई की हत्ता के मुझे शहीद कर दिया गया, अल्लाह तआला फरमाएगा तूने झूठ बोला तुम इसलिए लड़े थे के कहा जाए, यह शख्स बड़ा बहादुर है और यही कहा गया, फिर उसके बारे में हुक्म दिया जाएगा, तो उस आदमी को मुंह के बल घसीटा जाएगा यहां तक के आग में-डाल दिया-जाएगा।
और फिर वह आदमी जिसने इल्म पढ़ा पढ़ाया और कुरान की किरात कि उसे पेश किया जाएगा अल्लाह अज्ज़ व जल्ला उसे-अपनी निअमतों की पहचान कराएगा वह पहचान कर लेगा फिर रब्बे कायनात फरमाएगा तूने इन निअमतों के शुक्राने में क्या-किया वह-कहेगा मैं इल्म पढ़ा और पढ़ाया और तेरी खातिर कुरान की किरत की अल्लाह फरमाएगा तूने झूठ बोला तूने इसलिए इल्म पढ़ा के कहा जाए यह आलीम है और तूने कुरान इसलिए पढ़ा के कहा जाए यह कारी है तो वह तुझे दुनिया में कहा गया फिर उसके बारे में हुक्म दिया जाएगा उसे मुंह के बल घसीटा जाएगा हत्ता के आग में-डाल दिया-जाएगा,
और फिर वह आदमी जिस पर अल्लाह ने वुसअत की और हर किस्म का माल अता किया उसे लाया जाएगा अल्लाह अज्ज़ व जल्ला उसे-अपनी नेअमतों की पहचान कराएगा वह पहचान लेगा, अल्लाह फरमाएगा तुमने इनमें क्या किया, कहेगा मैंने कोई राह नहीं छोड़ी जिसमें तुम्हें पसंद है कि माल खर्च किया जाए मगर हर ऐसी राह में खर्च किया, अल्लाह फरमाएगा तुमने झूठ बोला है तुमने यह सब इस-लिए किया ताके कहा जाए तू सखी है, ऐसा ही दुनिया में तुझे कहा गया ,फिर उसके बारे में हुक्म दिया जाएगा, इसे मुंह के बल घसीटा जाएगा हत्ता के आग में-डाल दिया-जाएगा।
इन सारी रिवायात से यह बखूबी वाज़ेह हो जाता है के अगर काम अच्छा हो और बुरी नीयत से किया जाए तो उस पर कुछ भी अजरो सवाब नहीं मिलेगा बल्कि वही अमल उसके लिए जहन्नम का बाइस होगा चाहे वह अमल नमाज़ हो रोज़ा हो गुरबा में माल की तक्सीम हो, मां-बाप की खिदमत हो या शहादत जैसी अज़ीम दौलत या कोई और कारे खैर, यह सब उसी वक्त काम आएंगे जब उस अमल को नियत खैर के साथ रज़ा ए इलाही की खातिर किया हो।
आज हम किसी गरीब की मदद करते वक्त सेल्फी लेते हैं मस्जिद में चंदा देते वक्त सर फख्र से ऊंचा करते हैं के लोग हमें देख लें कि हमने चंदा दिया है मदरसा की मदद करने के बाद यह चाहते हैं कि अब मदरसा के किसी कमरा पर या किसी दीवार पर उनका नाम लिखकर चिपका दिया जाए ताकि लोग देखें कि यह काम फलां साहब ने करवाया है दिखावा का नशा ऐसा सवार है की ज़कात देते वक्त भी हम इसकी नुमाइश का कोई मौका नहीं छोड़ते याद रखो अल्लाह की बारगाह में उसी अमल की कुबूलियत है जो खुलूस के साथ अल्लाह की रज़ा के-लिए किया-गया है जो अमल किसी और के दिखावा के-लिए किया-गया है उसकी अल्लाह की बारगाह में कोई वुकअत और कोई कदर नहीं।
और जब काम या इबादत रज़ा ए इलाही के लिए की जाए
दोस्तों अब ज़रा उनका हाल भी कुराने मुकद्दस की ज़बान समाअत फरमा लें जो लोग इबादतें महज़ अल्लाह की रज़ा की खातिर करते हैं और उनकी इबादात में किसी किस्म का दिखावा शामिल नहीं होता उन्हें अल्लाह तआला कैसे इनआमात से नवाज़ता है इरशादे खुदा वंदी है,
"उनकी कहावत जो अपने माल अल्लाह (अज्ज़ व जल्ला) की राह में खर्च-करते हैं उस दाना की तरह जिसने उगाइयां सात बाली हर बाल में सौ दाने, और अल्लाह उससे भी ज़्यादा बढ़ाए जिसके लिए चाहे और अल्लाह वुसअत वाला इल्म वाला है"।
दोस्तों देखा आपने जब कोई काम अल्लाह की रज़ा और उसकी खुशनूदी हासिल करने की गर्ज़ से किया जाए तो अल्लाह तआला कैसे इनआमात से नवाज़ता है और कैसी बरकतें अता फरमाता है। दोस्तों अब लगे हाथ एक और फरमाने रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम समाअत फरमा लें।
हज़रत अबू सईद खुदरी रदीअल्लाहू अन्हू से मरवी है वह कहते हैं जो आदमी नमाज़ की तरफ निकलते हुए यह कलमात कहता है ए अल्लाह मैं तुझसे तुझ पर सवालियों के हक और अपने चलने के हक के वास्ते से सवाल करता हूं कि मैं फख्र, सरकशी, रियाकारी, और शोहरत के लिए नहीं निकला, बल्कि मैं तेरी नाराज़गी से बचने के लिए और तेरी रज़ा मंदी को तलाश करने के लिए निकला हूं, मैं तुझसे सवाल करता हूं, तू मुझे आग से बचा और मेरे गुनाह बख्श दे, बेशक गुनाहों को कोई नहीं बख्शता, मगर तू ही। तो अल्लाह तआला सत्तर हज़ार फरिश्तों को इस ड्यूटी पर लगाता है कि वह उस आदमी के लिए बख्शिश तलब करें और अल्लाह तआला ऐसे आदमी पर नज़र करम फरमाता है यहां तक के वह बंदा नमाज़ से फारिग हो जाए।
दोस्तों: यह सुनकर तो ऐसा महसूस होता कि गोया रब करीम यह निदा कर रहा है कि ए मेरे बंदे तू रियाकारी और दिखावा के दलदल से निकल कर इख्लास के साथ अमल करके तो देख तेरा रब फिर तुझे कैसे नवाज़ता है किसी ने क्या खूब कहा है, यानी अल्लाह की रहमत यह नहीं देखती कि अमल कितना बड़ा है बल्कि अल्लाह की रहमत तो बहाना तलाश करती है कि कब बंदा कोशिश करे और अल्लाह उसे अता फरमा दे।
और मुलाहिज़ा फरमाएं, नबी करीम रऊफुर्रहीम सल्लल्लाहु अलैहि-वसल्लम ने फरमाया, जब आदमी सवाब-की नियत-से अपने अहलो अयाल पर खर्च करे। पस वह भी उसके लिए सदका है। (सही बुखारी)
अरे नादान इंसान तुझे और क्या चाहिए अगर तू सवाब-की नियत-से अपने बीवी बच्चों पर खर्च करे,तब भी अल्लाह तुझे सवाब अता फरमाए।
इसी मफहूम की एक और हदीस मुलाहिज़ा फरमाएं, और अपने आमाल में इखलास पैदा करें,
नबी करीम रऊफुर्रहीम सल्लल्लाहु अलैहि-वसल्लम ने फरमाया, अगर औरत अपने शौहर के माल से कुछ खर्च करे और उसकी नीयत शौहर की पूंजी बर्बाद करने की न हो, तो उसे खर्च करने का सवाब मिलेगा, और शौहर को भी इसका सवाब मिलेगा, उसने कमाया है, और खज़ांची का भी यही हुक्म है।
एक का सवाब दूसरे के सवाब में कोई कमी नहीं करता।
दोस्तों आपको इन तमाम आयात कुरानिया और अहादीस की रोशनी में यह बात बखूबी समझ में आ गई होगी के दिखावा और रियाकारी कैसी मोहलक बीमारी है इसमें पड़कर न सिर्फ यह के हम अपनी नमाज़ें रोज़े हज ज़कात सदकात खैरात और दीगर अतियात पर सर्फ की हुई मेहनत व दौलत बर्बाद करते हैं बल्कि अपने रब करीम को नाराज़ भी करते हैं तो आज से हम सब यह अहद कर लें कि जब भी कोई काम करेंगे महज़ अल्लाह-तआला की रज़ा के-लिए करेंगे इसमें किसी किस्म के नामो नमूद और दिखावा का शाएबा तक ना होगा।
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