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ummi ka matlab



 दोस्तों आज की इस पोस्ट में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मी होने का सही और हकीकी मफहूम क्या है वह बताने वाला हूँ और यह मोज़ू अपने आप में बहुत हस्सास और इस वक़्त की ज़रुरत है जिसे समझना सोशल मीडिया से वाबस्ता हर फर्द के लिए बहुत ज़रूरी है !

दर असल हुआ यूँ के गुज़िश्ता दिनों हमारे पड़ोसी मुल्क के youtuber मोलवी ने हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और कुरान करीम पर यह कहते हुए ज़बान दराज़ी की के, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लिखना पढ़ना नहीं जानते थे और इसी वजह से कुराने पाक में भी गिरामर की कुछ गलतियां रह गईं हैं, (मआज़ल्लाह)

हर साहिबे ईमान जानता है के यह दरीदा दहनी और जसारत बहुत बड़ी जसारत है जिसका वाकई हिसाब अल्लाह ही लेने वाला है !

लेकिन चूंके इस तरह की बातें कुराने करीम की आयात और अहादीसे करीमा के अलफ़ाज़ के परदे में लपेट कर पेश की जाती हैं! इसलिए ज़रूरी हो जाता है के हम इस तरह की आयात व अहादीस  का सही मतलब जानें! 

इंशा अल्लाह हम यह कोशिश करेंगे के आजके इस आर्टिकल में इस तरह की गलत फहमियों का इज़ाला हो !

अल्लाह तआला कुरान मजीद में इरशाद फरमाता है,

هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّينَ رَسُولًا مِنْهُمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ أَيْتِهِ ( سوره جمعه )

तर्जमा : यानी अल्लाह तआला वही है जिसने अनपढ़ों में उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उनपर उसकी आयतें पढ़ते हैं ! दोस्तों इस आयते करीमा में “उम्मी” का लफ्ज़ मज़कूर है जिसका मानी व मफहूम जानना बहुत ज़रूरी है तो आइये अरबी लुगात की मदद से इस लफ्ज़ का मानी समझ लेते हैं ताके बात समझने में आसानी हो! 

लफ्ज़ “उम्मी” का लुग्वी मानी : 

लफ्ज़े उम्मी उम से निकला है, जिसका एक मानी असल यानी जड़ होता है , इस मानी के लिहाज़ से हर उस शख्स को उम्मी कहा जाएगा जो अपनी असल पर काइम हो, और उस में फितरी तौर पर कुछ तब्दीली न आई हो!

उम्मी का दूसरा एक मानी है जिबिल्लते ऊला पर काइम हो यानी जैसा पैदा हुआ वैसा ही रहे! न लिखने पढने वाले को भी इस मानी में उम्मी कहा जाता है !

 उम्मी का तीसरा एक मानी है, जो लिखना पढ़ना न जानता हो ,(कामूस,ताजुल उरूस, व सहाह वगैरह)

लफ्ज़ “उम्मी” का कुरानी इस्तेमाल : 

कुराने करीम में लफ्ज़ उम्मी अलग अलग मक़ामात पर हस्बे हाल अलग अलग मानी में इस्तेमाल हुआ है , जैसे आपने ऊपर कुरान की आयत पढ़ी उसमें “अनपढ़” के लिए “उम्मी” का लफ्ज़ इस्तेमाल किया गया, इसी मानी में कुछ यहूदियों के लिए भी एक जगह आया है!

وَمِنْهُمْ أُمِيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ الْكِتَبَ إِلَّا أَمَانِي (سوره بقره 78)

तर्जमा: और उनमें कुछ अनपढ़ हैं के जो किताब को नहीं जानते, मगर ज़बानी पढ़ लेना या कुछ मन गढ़त बातें ! यानी यहूदियों में से कुछ कम नसीब ऐसे हैं जो तौरेत को जानते समझते नहीं, लेकिन उसके कुछ हिस्से ज़बानी तौर पर पढ़ लेते हैं और कुछ मन गढ़त भी कह गुज़रते हैं! 

दोस्तों, कुराने करीम के सूरह एराफ के दो मक़ामात पर रसूले मुकर्रम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को “उम्मी लक़ब से मुलक्कब फरमाया गया आयत नंबर 157 में इरशाद हुआ

الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْأُمِّيِّ الَّذِي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِنْدَهُمْ فِي التَّوْرَيةِ وَالْإِنجِيلِ

तर्जमा: यानी वोह जो गुलामी करेंगे, उस रसूल बे पढ़े, गैब की ख़बरें देने वाले की, जिसे लिखा हुवा पाएंगे अपने पास तौरेत और इंजील में! और दूसरा मक़ाम इसी से अगली आयत नंबर 158 में है

فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الأُمِّيِّ الَّذِي يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَكَلِمَاتِهِ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ.

तर्जमा: तो ईमान लाओ अल्लाह और उसके रसूल पर जो नबी हैं (किसी से) पढ़े हुए नहीं हैं, अल्लाह और उसकी तमाम बातों पर ईमान लाते हैं और उनकी पैरवी करो ताके तुम हिदायत पालो! 

इन दोनों आयतों में हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नबी उम्मी कहा गया, इसी तरह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद अपनी ज़बान ए मुबारक से भी अपने लिए इस लफ्ज़ का इस्तेमाल करते हुए इसकी तशरीह की और दर असल आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तशरीह ही इस लफ्ज़ के मानी मुताअय्यन करने में सबसे अहम तशरीह मानी जानी चाहिए !

इमाम बुखारी अलैहिर्रहमह, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत करते हैं के हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया:

إِنَّا أُمَّةٌ أُمِّيَّةٌ لَا نَكْتُبُ وَلَا نَحْسُبُ ( صحیح بخاری )

यानी हम अहले अरब उम्मी कौम हैं , हम न लिखते हैं, न हिसाब करते हैं~ एक और मकाम पर इरशाद फरमाया

إِنِّي بُعِثْتُ إِلَى أُمَّةٍ أُمَيَّةٍ . (صحیح ابن حبان )

यानी मुझे उम्मी कौम की तरफ नबी बना कर भेजा गया !

इन दोनों हदीसों में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने उम्मी होने की खुद वज़ाहत फरमा दी, के हम अरब वह कौम हैं , जिनका पेशा पढ़ना लिखना या हिसाब किताब करना नहीं, यानि यह चीज़ें हमारे कल्चर का हिस्सा नहीं! और यह बेशक सच है, के अरब इन चीज़ों से बे नियाज़ थे, लेकिन इसका हरगिज़ मतलब यह नहीं के उनके पास इल्म न था या हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इल्म व फन से बे बहरह हैं बल्के अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने आपको मुअल्लिम ए काएनात बनाकर भेजा ! जैसे आपने शुरू में आयत और उसका तर्जमा पढ़ा !  "अल्लाह तआला वही है , जिसने अनपढ़ों में उन्ही में से एक रसूल भेजा, जो उनपर उसकी आयतें पढ़ते हैं" !

अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद भी अनपढ़ यानी बे इल्म होते तो, उनके सामने किताब की आयतें कैसे तिलावत करते? जबके अल्लाह तआला ने आपके मकासिदे बेअसत में: 

  1. किताबुल्लाह की तिलावत करना,

  2. किताबुल्लाह की तालीम देना,

  3. हिकमत की तालीम देना,

  4. दिलों का तज़किया करना,

  5. और उन चीज़ों की तालीम देना बताया, जो लोग पहले से नहीं जानते थे, 

एक जगह कहा :

لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِنْ أَنْفُسِهِمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ أَيْتِهِ وَ كيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَبَ وَالْحِكْمَةَ ، وَإِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَفِي ضَلَلٍ مُّبِينٍ ( سورہ آل عمران، 164 )

तर्जमा : बेशक अल्लाह का बड़ा एहसान हुआ मुसलामानों पर के उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन पर उसकी आयतें पढ़ता है और उन्हें पाक करता है और उन्हें किताबो हिकमत सिखाता है जबके उससे पहले वह ज़रूर खुली गुमराही में थे! 

दूसरी जगह इससे भी बड़ी बात इरशाद फरमाई , और कहा के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वोह भी सिखाते हैं जो लोग पहले से नहीं जानते!

كَمَا أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًا مِنْكُمْ يَتْلُوا عَلَيْكُمْ ايْتِنَا وَيُزَكِّيْكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ الْكِتَبَ : وَالْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُمْ مَّا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ (سوره بقره ، 151)

तर्जमा: जैसे हमने तुम में तुम्ही में से एक रसूल भेजा जो तुम पर हमारी आयतें तिलावत फरमाता है और तुम्हें पाक करता और किताब और पुख्ता इल्म सिखाता है और तुम्हें वोह तालीम फरमाता है जिसका तुम्हें इल्म न था! 

अब बताएं: भला जो गुमराही से निकालने, दिलों का तज़्किया करने, किताबुल्लाह सिखाने, हिकमत सिखाने, और न जानी हुई बातें सिखाने के लिए तशरीफ़ लाया हो, वह खुद अनपढ़ कैसे हो सकता है?!

पता चला आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए “उम्मी” का सिर्फ वही मतलब है जो खुद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बताया के हमारे हाँ रिवायती पढ़ाई लिखाई का रिवाज नहीं, इसी लिए हम उम्मी कौम हैं, लिखने पढ़ने और हिसाब व किताब का काम नहीं करते, और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मी होने का मतलब यह है के आपने रिवायती अंदाज़ से दुनिया में किसी से तालीम हासील नहीं की वरना आप तो वोह हैं जिन्हें खुद खालिके काएनात ने किताब सिखाई, इरशाद हुआ

الرَّحْمنُ عَلَّمَ الْقُرْآنَ ۔ (سورہ رحمن، 1-2)

तर्जमा: रहमान ने अपने महबूब को कुरान सिखाया,! बल्के इससे भी आगे की बात यह है के दुनिया में जब भी किसी इल्मी फ़ज़ीलत की बात होती है तो किसी एक ख़ास मैदान या किसी ख़ास फन की फ़ज़ीलत ब्यान होती है , जबके हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुताअल्लिक अल्लाह ने इतनी बड़ी बात इरशाद फरमाई के आप जो कुछ नहीं जानते थे , अल्लाह तआला ने आपको वो सब कुछ भी सिखा दिया है!

وَ عَلَّمَكَ مَا لَمْ تَكُنْ تَعْلَمُ وَكَانَ فَضْلُ اللهِ عَلَيْكَ عَظِيمًا ( سورہ نساء 113)

तर्जमा: और तुम्हें सिखा दिया जो कुछ तुम न जानते थे और यह अल्लाह का तुम पर बड़ा फ़ज़ल है ! बल्के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इल्म का आलम तो यह है के आप न सिर्फ ज़ाहिरी चीज़ें जानते हैं ,बल्के वह भी जानते हैं जहां तक ज़हनो फ़िक्र की रसाई न हो, यानी आप गैब की भी ख़बर देते हैं और इस शान से देते हैं के गैब बताने में बखीली से भी काम नहीं लेते, अल्लाह तआला का इरशाद हुआ

وَمَا هُوَ عَلَى الْغَيْبِ بِضَنِينِ (سورہ تکویر ،24)

तर्जमा: और यह नबी गैब बताने में बखील नहीं, 

दोस्तों इन तमाम बातों से साबित हुआ के कुराने मजीद में हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुताअल्लिक यह नहीं कहा जा रहा है के आप अनपढ़ हैं बल्के यह कहा जा रहा है के रिवायती तौर पर पढ़ना लिखना, आपके अरबी कल्चर का हिस्सा नहीं, और हो सकता है आम इंसानों में रिवायती पढ़ाई से दूरी एक कमी हो, लेकिन आपके अन्दर यह कमाल है, यही उम्मी होना आपके दलाइले नुबुव्वत में से एक है, यही कुराने पाक की हक्कानियत की दलील है, और यही आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कमाल व एजाज़ की दलील है! क़ाज़ी अयाज़ अलैहिर्रहमह शिफा शरीफ में लिखते हैं!

كون النبي أميا آية له و كون هذا اميا نقيصة فيه وجهالة. الشفا بتعريف حقوق المصطفى فصل الوجه الخامس) ,

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए मोजज़ा है , और उस शख्स का उम्मी होना उसमें ऐब और जहालत,!

रिवायती पढ़ाई लिखाई न करना भी कमाल इसलिए है के अगर आप रिवायती तौर पर बहुत पढ़े लिखे होते तो आपका कोई न कोई उस्ताद होता तो शागिर्द उस्ताद के ज़ेर बार होता और इससे भी ख़ास बात यह के अगर आप रिवायती तौर पर लिखे पढ़े होते तो शायद बहाना बाज़ मुशरिकीने अरब को तक्ज़ीबे कुरान के लिए एक बहाना यह भी मिल जाता के आपने यह किताब अपनी तबीअत से बनाली है, इसीलिए कुराने मजीद में अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया,

وَمَا كُنْتَ تَتْلُوا مِنْ قَبْلِهِ مِنْ كِتَبٍ وَلَا تَخُطُهُ بِيَمِينِكَ إِذًا لَّارْتَابَ الْمُبْطِلُونَ. ( سوره عنکبوت ، 48)

तर्जमा : और इस (नुज़ूल ए कुरान) से पहले तुम कोई किताब न पढ़ते थे और न अपने हाथ से कुछ लिखते थे, अगर ऐसा होता तो बातिल वाले ज़रूर शक करते! 

उम्मी होने की हिकमतें !

दोस्तों अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का कोई भी काम हिकमत से खाली नहीं होता कमाल यह है के उसने एक तरफ जहां अपने हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इल्म की कुंजियाँ अता फरमाईं वहीँ रिवायती पढ़ाई लिखाई से दूर मुआशरे के बीच भेज कर उन्हें, उनसे बे पनाह मानूस भी रखा, और उनकी हर बहाना बाज़ी का भी किला कुमा कर दिया, गोया आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना ही आपका कमाल और हिकमते खुदावन्दी की दलील है ~ अहले इल्म ने इसकी बहुत तफ्सीलात बयान की हैं जिनमें से चंद हिकमतें यह हैं!

1) अभी सूरह अनकबूत की आयत में गुज़रा: अगर आप रिवायती तालीम याफ्ता होते तो यहूद आपकी ज़रूर तकज़ीब करते , क्यूंकि उनकी किताबों में आखरी नबी की एक निशानी उम्मी होना ब्यान की गई थी , मगर उन्हें शक का मौक़ा इसलिए न मिल सका के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में यह निशानी मौजूद थी !

2) एक हिकमत यह थी: आपकी रिसालत, आप पर वही के नुज़ूल और कुराने पाक के कलामुल्लाह होने पर किसी को कोई एतराज़ न रहे, इस तरह के जो पहले से रिवायती लिखना पढ़ना जानते तो दुश्मन यह कह सकते थे के, यह जिसे कुरान और वही कहते हैं वह खुद इनका अपना बनाया और लिखा कुरान है, यही वजह है के आपके बड़े बड़े दुश्मनों ने तक्ज़ीबे वही के सिलसिले में यह एतराज़ कभी नहीं किया, गोया दिल से वह भी मानते थे के यह जो कुरान पेश करते हैं वह किसी बशर का कलाम नहीं हो सकता !

3) खुदाए तआला को अपने हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए यह मंज़ूर ही न था के दुनिया में आपका कोई उस्ताद हो और आप किसी के शागिर्द हों ~ हाँ अल्लाह तआला को बतौरे इल्म आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जो देना मंज़ूर था, वह दिया और इस शान के साथ दिया के जो जो नहीं भी जानते थे, वह सब कुछ सिखा दिया ~ ज़ाहिर के साथ बातिन, और गैब की बातें भी इस तरह से सिखाईं के आप पूरी काएनात के मुअल्लिम और अनजानी बातों के सिखाने वाले बन गए !

4) उम्मी का मतलब सिर्फ यह नहीं के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रिवायती अंदाज़ में किसी भी इंसान से लिखना पढ़ना नहीं सीखा था, बल्के इसमें एक अज़ीम हिकमत और मोजज़ा भी छुपा हुआ है, इमाम इब्ने जौज़ी और दीगर मुफस्सिरीन ने वज़ाहत की है के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना इस बात की निशानी है के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दुनियावी इल्म की ज़रुरत ही न थी क्युंके आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बराहे रास्त अल्लाह तआला से वही की सूरत में इल्म अता हुआ!

5) आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना आपकी उम्मत के लिए एक आसानी भी है इस तरह के उम्मत को दुन्यवी उलूम के बगैर भी अल्लाह की तरफ से हिदायत मिल सकती है आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना एक ऐसा पैगाम है के दीने इस्लाम का हुसूल सादह हो और इल्मे वही की तरफ रुजू करने की तरगीब दी जाए! 

  1. नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मी होने के बावजूद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात का एक नुक्ता ए कमाल यह भी था के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इंसानों को हर वह इल्म और हिदायत अता की जिसकी उन्हें दुनिया व आखिरत में ज़रुरत थी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िन्दगी के हर पहलू में एक निज़ाम पेश किया जिसमें इबादात से लेकर मुआमलात, सियासत से लेकर मुआशरत तक हर चीज़ शामिल थी, इससे आपकी शाने नुबुव्वत को तकवियत मिलती है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह शान आप पर ईमान लाने वालों के लिए बजाए खुद एक हुज्जत बनती है !

  2. नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मी होने का एक अहम पहलू अरब मुआशरती पस मंज़र से भी जुड़ा हुआ है अरब में लिखने पढ़ने की आम रिवायत नहीं थी और अक्सर लोग अनपढ़ थे कुरैश के चंद अफराद ही लिखने पढ़ने के फन से वाकिफ थे, इसलिए अल्लाह तआला ने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ऐसे मुआशरे में नबी बनाकर भेजा जहां इल्म का निज़ाम रस्मी तालीम से ज़्यादा ज़बानी रिवायात पर मबनी था, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन लोगों को वही के ज़रिये हिदायत दी, जो खुद एक अज़ीम मोजज़ा है!

  3. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीने में एक फलाही रियासत की बुनियाद रखी, जहां सबके हुकूक का तहफ्फुज़ था, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मदीना के मुआशरती कानून को तरतीब देना, इस बात का सुबूत है के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह की जानिब से ऐसी बसीरत अता हुई जो किसी इंसानी उस्ताद के बगैर थी ! 

गर्ज़ यह के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उम्मी होना ही आपका एजाज़ आपका कमाल अल्लाह की किताब के लिए उमूमी तस्दीक का सबब और क़यामत तक के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का खास्सा है, और फिर एक आशिके सादिक इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान मुहद्दिस बरेलवी अलैहिर्रहमह के मुताबिक :

ऐसा उम्मी किस लिए मिन्नत कशे उस्ताद हो 

क्या किफायत उसको इकरा रब्बुकलअकरम नहीं 

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में दुआ है के परवर दिगार आलम हम सब को अपने हबीब मुकर्रम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का वफ़ा शआर  बा अदब और आशिके सादिक बनाए और ज़बान व ब्यान की हर उस लग्ज़िश से सौ सौ बार महफूज़ रखे जिससे शाने रिसालत में अदना सी जसारत का भी शाएबा गुज़रता हो और जब तक ज़िन्दा रखे इसी वफादारी के साथ ज़िंदा रखे और इसी दौलते ईमान के साथ कल बरोज़े क़यामत उनकी शफाअत नसीब फरमाए  आमीन 

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