अस्सलामु अलैकुम : दोस्तों इस तहरीर में सूरह फातिहा के नाम और सूरह फातिहा की फज़ीलत क्या है वह बताने वाला हूँ
सूरह फातिहा के फज़ाइल
इस सूरह फातिहा के अठ्ठाईस नाम हैं जिन में से चार लिखे जा रहे हैं।
अव्वल सूरह फातिहा का नाम 'सबअ मसानी' है। जैसा कि अल्लाह तआला इर्शाद फरमाता है:
وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ مِنَ الْمَثَانِيُّ وَالْقُرْآنِ الْعَظِيمِ
"व-लकद आतैना-क मिनल्मसानी वल्कुर आनिल अज़ीम"
यानी, ऐ हबीब अता की हमने आप को सात आयतें। और कुरआन मजीद में इस को सबअ मसानी इसलिए कहा जाता है कि यह सूरत दोबारा नाज़िल हुई है, यानी मक्का मोअज़्ज़मा और मदीना मुनव्वरा में, और मसानी इसलिए भी कहा जाता है कि नमाज़ में बार-बार, यानी हर रकअत में पढ़ी जाती हैं इस में सात आयतें हैं। हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, शबे मेअराज में मैंने देखा कि अर्शे मुअल्ला पर मरवारीद याकूत की दो तख़्तियां मुअल्लक हैं। एक पर सूरह फातिहा और एक पर कुरआन शरीफ लिखा हुआ है। मैंने अर्ज़ किया खुदावन्दा यह चीज़ें किस को अता होंगी। इर्शाद हुआ आप को और आप की उम्मत के लिए, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, एक पल्ले में सूरह फातिहा और एक पल्ले में कुरआन शरीफ रखा जाए तो दोनों मुसवी होंगे। यानी दोनों का सवाब बराबर मिलेगा। हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, "जिस ने सूरह फातिहा पढ़ी गोया उस ने तौरेत व ज़ुबूर व इंजील और कुरआन पढ़ी, ज़मीन के पहाड़ों के बराबर सोना अल्लाह की राह में खैरात किया"। और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जिस ने एक मर्तबा सूरह फातिहा पढ़ी उस के लिए दोज़ख़ के सातों दरवाज़े बन्द हो जाते हैं और जन्नत के सातों दरवाज़े खुल जाते हैं।
सातों दोज़ख़ों की आगों से निजात
जबकि मदीना मुनव्वरा में औरतों को जमाअत में शरीक हो कर नमाज़ पढ़ने की इजाज़त थी। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सुबह की नमाज़ में सूरह हजर तिलावत फरमा रहे थे, सातों दोज़ख़ का बयान इस सूरह में है। उन दोज़ख़ियों का बयान सुन कर एक औरत बेहोश होकर गिर पड़ी हुज़ूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बाद नमाज़ के मालूम हुआ तो उस औरत से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दरयाफ्त किया। उस ने अर्ज़ की। या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, वह सातों दोज़ख से हमको क्यों कर निजात मिलेंगी?” नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया के सूरह फातिहा में सात आयतें हैं जो हर नमाज़ के बाद सात मर्तबा पढ़ी जाएं तो अल्लाह तआला सातों दोज़ख़ों की आगों से निजात देगा।
सूरह फातिहा को फातिह तुलकिताब भी कहा जाता है।
फातिह-तुलकिताब इसलिए कहा जाता है कि कुरआन शरीफ का लिखना व पढ़ना इसी सूरह से शुरु होता है। यह सूरह अल्लाह तआला और बन्दा के दरमियान मे वाकि है। जैसा कि इर्शाद होता हैः- “कसम्-त बैनी व बै-न अब्दी०"।
तीसरा नाम इत्मा-मुस्-सलात इसलिए कहा जाता है कि इब्तिदा नमाज़ की इस सूरह से है। जब तक सूरह फातिहा न पढ़ी जाए, नमाज़ नहीं होती।
لا صَلوةَ إِلَّا بِفَاتِحَةِ الْكِتَاب
ला सला-त इल्ला बिफाति-ह- तिल-किताबि०
"यानी नमाज़ नहीं होती जब तक कि सूरह फातिहा न पढ़ी जाए।
यह सूरह नमाज़ की जान है। चौथ नाम शिफा है। इसलिए कि यह आयत हर मर्ज़े जिस्मानी की शिफा और हर मर्जे रूहानी की दवा है जैसा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया किः
فَاتِحَةُ الْكِتَابِ شِفَاعٌ مِنْ كُلِّ دَاءِ الْإِسْلَامِ "फाति-ह-तुल किताबि शिफाउन्-मिन् कुल्लि दाइत्-इस्लाम ०" यानी यह सूरह फातिहा हर मर्ज़ की दवा है सिवाए मौत के।
सूरह फातिहा हर मर्ज़ की दवा
मआरिजुन्-नुबुव्वत में लिखा है कि, एक शख़्स का हाथ कट गया। हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस पर सूरह फातिहा पढ़ कर दम किया हाथ फौरन दुरुस्त हो गया। एक सहाबी एक जंग फतह करके वापस हुए। इत्तिफाकन पहाड़ से नीचे गिरे पांव टूट गया। काफिला वालों को मालूम न था वह आगे बढ़ गए। और वह रोते हुए वहीं पड़े रहे। गैब से निदा हुई कि "सूरह फातिहा पढ़ कर दम कर लिया जाए"। वह सहाबी ने सात बार पढ़ कर दम कर लिया उसी दम पैर अच्छा हो गया, वह चले गए। एक सहाबी को सांप काटा, एक और सहाबी ने सात मर्तबा सूरह फातिहा पढ़ कर दम किया, सांप का ज़हर फौरन उतर गया। और वह बिल्कुल अच्छे हो गए।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मामूल मुबारक
हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मामूल था कि जब आप को कसलमन्दी या कोई तकलीफ या दर्द सर होता तो सूरह फातिहा और चार कुल पढ़ कर दोनों दस्ते मुबारक पर दम करके अपने चेहर-ए-मुनव्वर और तमाम जिस्मे अतहर पर फेर लेते थे।
एक सहाबी ने, किसी मजनूं शख़्स के कान में ग्यारह मर्तबा सात रोज़ पढ़ कर दम करने और पानी पर दम करके पिलाने से उसका जुनून जाता रहा। हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब किसी पर मुसीबत पड़ती तो आप सूरह फातिहा पढ़ कर दुआ फरमाते, उसकी मुसीबत दूर हो जाती।
सूरह फातेहा का अमल
बाज़ मशाइखे कुब्बार के आमले तजुर्बे में मरकूम है कि जिस पर जादू या करतूत का असर हो या बहुत रोज़ का मरीज़ हो, दवा कारगर न हो तो फज्र की सुन्नत व फर्ज के दरमियान
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
"बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' की "रहीम' की 'मीम को "अल्हम्दु" के 'लाम से मिला कर इक्तालीस बार चालीस रोज़ तक बिला नागा पढ़ कर दम करके पिलाने से अल्लाह तआला सेहत अता फरमाता है। शर्त यह है कि पहली तारीख से शुरु करें। अव्वल व आखिर ग्यारह-ग्यारह बार दुरूद शरीफ पढ़ा करें। इस सूरत में जुम्ला एक सौ चौबीस (124) हुरूफ हैं जो शख्स रात दिन में इसी सूरह को चौबीस मर्तबा पड़ेगा वह शख़्स कियामत में चौबीस हज़ार पैग़म्बरों की शफाअत का मुस्तहिक होगा।
दो नूर
एक रोज़ जिब्रईल अलैहिस्सलाम हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैठे हुए थे कि ऊपर से कुछ दरवाज़े खुलने की आवाज़ सुनाई दी जिब्रईल ने सर उठा कर आसमान की तरफ देखा, कहने लगे, "आज आसमान का दरवाज़ा खुला है जो आज तक नहीं खुला था। उसके बाद एक फरिश्ता नाज़िल हुआ। जिब्रईल ने कहा, यह फरिश्ता अब तक ज़मीन पर नहीं आया। फरिश्ते ने आ कर हुज़ूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सलाम किया और अर्ज़ किया कि, "हुज़ूर आप को खुशी मुबारक हो। अल्लाह तआला ने आप को दो नूर अता किए हैं जो पहले किसी नबी को नहीं दिए गए। एक सूरह फातिहा, दूसरी सुरह बकरह की आख़िरी आयतें। यानी (आम-नर्रसूल) इन में से कोई भी एक पढ़ ली जाए तो पूरा कुरआन पढ़ने का सवाब मिलेगा। (मुस्लिम)
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