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अल्लाह की रहमत बड़ी है Allah ki Rahmat


 अस्सलामु अलैकुम 

दोस्तों इस आर्टिकल में आप तौबा के बारे में पढेंगे, इन्सान खता का पुतला है जब इन्सान से कोई गलती हो जाए या कोई गुनाह सरज़द हो जाए तो फ़ौरन अल्लाह रब्बुल से अपने गुनाहों की माफ़ी मांग लेना चाहिए , और साथ ही साथ गुनाहों को छोड़ने और दोबारा न करने का अहद भी कर लेना चाहिए, यही सच्ची तौबा कहलाती है! इन्सान से जब कोई गुनाह हो जाता है. और वोह अल्लाह की बारगाह में तौबा करता है, तो इन्सान के गुनाह थोड़े हों या ज़्यादा हों, अल्लाह तआला उसके गुनाह मुआफ फरमा देता है!

अल्लाह की रहमत बड़ी है

अहमदे मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबी हबीब बिन हारिस से फरमायाः ऐ हबीब ! जब कभी तुमसे गुनाह हो जाए तो तौबा कर लिया करो। हबीब ने अर्ज कियाः या रसूलल्लाह ! अगर मेरे गुनाह बहुत ज़्यादा हों तो मैं क्या करूँ? इस पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्फलम ने फरमाया, अल्लाह तआला की माफी तुम्हारे गुनाहों से बढ़कर है।

कबीरा और सगीरा दोनों गुनाहों से तौबा ज़रुरी है

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है. के अहमदे मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः कोई भी कबीरा (बड़ा) गुनाह तौबा व इस्तिगफार के बाद कबीरा नहीं रहता और कोई भी सगीरा (छोटा) गुनाह इसरार (बार बार करने) के बाद सगीरा नहीं रहता।

यानी कबीरा गुनाह के बाद अगर आदमी सच्चे दिल से तौबा करे तो उसका गुनाह माफ हो जाता है लेकिन अगर बन्दा लगातार सगीरा गुनाह किये जा रहा है और तौबा नहीं करता तो सगीरा गुनाहों पर इसरार (अड़े रहना) कबीरा गुनाह में बदल जाता है।

तौबा करने वाला जवान अल्लाह का महबूब है

हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है के अहमदे मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः "बेशक अल्लाह तौबा करने वाले नौजवानों को महबूब रखता है।

एक और हदीस ए रसूल है के हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः "कोई भी चीज़ अल्लाह तआला के नज़दीक तौबा करने वाले नौजवान से बढ़कर पसन्दीदा नहीं और कोई भी चीज़ अल्लाह तआला की बारगाह में इतनी ना-पसन्दीदा नहीं जितना कि वो बूढ़ा जो बुढ़ापे के बावुजूद गुनाहों पर अड़ा हुआ हो। 

तौबा करने वालों से अल्लाह मुहब्बत फरमाता है 

तौबा करने वाले तमाम लोगों से अल्लाह तआला मुहब्बत फरमाता है लेकिन नौजवानी में तौबा करने वालों को खास तौर से महबूब रखने की वजह ये है कि इस उम्र में तौबा करना हकीकत में दिल गुर्दे का काम है क्योंकि इस उम्र में उमूमन आदमी ख़्वाहिशों व लज़्ज़तों के नरगे में होता है ऐसे में ख़्वाहिशों और दुनियावी रंगीनियों को छोड़कर अल्लाह सुब्हानहू व तआला की तरफ लौटना हकीकत में बड़े नसीबे की बात है।

कन्जुल उम्माल

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